पत्थर, पुल और हम

By: Sep 25th, 2025 12:06 am

हमें याद रखना चाहिए कि सफल होने से पहले हर व्यक्ति संघर्ष कर रहा होता है। संघर्ष का वह समय कितना लंबा होगा, यह हर व्यक्ति के साधनों, संपर्कों, योग्यताओं और किस्मत पर निर्भर करता है। दुनिया किसी व्यक्ति को तब जानना शुरू करती है जब वह कुछ नया कर दिखाता है। तालियां तब बजती हैं, मैडल तब मिलते हैं जब कोई विजयी हो जाता है। जीत से पहले मेहनत है, अनुशासन है, संघर्ष है, उपेक्षा है, यहां तक कि अपमान भी है। यह परिवार और मां-बाप का सामूहिक उत्तरदायित्व है कि संघर्षरत बच्चे का मार्गदर्शन करें, उत्साह बढ़ाएं और आवश्यक सुविधाएं प्रदान करें…

मानव संबंधों पर, इनसानी आदतों पर, हम सबके व्यवहार पर शोध होते ही रहते हैं। मानव मस्तिष्क एक जटिल मशीन है और हमारे दिमाग पर, हमारे विचारों पर और हमारे व्यवहार पर होने वाले शोध हर बार किसी ऐसे नये सत्य का उद्घाटन करते हैं जिसे यदि हम समझ लें तो जीवन जीने का हमारा तरीका ही बदल जाए। दुनिया भर की रिसर्च में ये पाया गया है कि सबसे ज्यादा गिनती उन लोगों की है जो दूसरों के कामों में गलतियां निकालते रहते हैं। ऐसे लोगों की निगाह बड़ी तीखी होती है और वे छोटी से छोटी गलती को भी पकड़ लेते हैं और उसकी आलोचना शुरू कर देते हैं। किसी की गलती ढूंढना, किसी की बुराई करना, किसी की कमियां गिनाना, उनका शौक है, उनका शगल है। इससे उन्हें कुछ मिलता नहीं, बस उनके अपने दिल को एक नकारात्मक संतुष्टि मिलती है, क्योंकि वे किसी की गलती इसलिए नहीं निकालते कि वे उसे सुधारने में मदद कर सकें, बल्कि उनका उद्देश्य तो सिर्फ इतना सा होता है कि गलती के बहाने उन्हें आलोचना करने का, चटपटी गपशप का एक सिलसिला मिल जाए। गलती समझ कर मार्गदर्शन करना या सहायता का हाथ बढ़ाना एक बात है और गलती समझ कर उसे गपशप का माध्यम बना देना एक बिलकुल अलग ही नशा है जो सबके लिए हानिकारक है। ऐसे ही लोगों की एक दूसरी किस्म भी है। अफवाहें फैलाने वाले और गपशप में रस लेने वाले इन लोगों को खबरची कहा जाता है। ऐसे लोग पड़ोसियों के घर में हर आने-जाने वाले पर निगाह रखते हैं, हर किसी के मामले में दखल देते हैं, हर एक व्यक्ति से उनके व्यक्तिगत जीवन के बारे में भी असुविधाजनक सवाल पूछते हैं, खोद-खोद कर सवाल पूछते हैं और फिर प्राप्त जानकारी का ढिंढोरा पीटते हैं। ये हर किसी से प्रेम से मिलते हैं पर किसी के सगे नहीं हैं। ये किसी के मुंह पर कोई बात नहीं कहते और पीठ पीछे चुप नहीं होते। ये गप्पें मारने वाले और अफवाहें फैलाने वाले लोग हैं। तीसरे नंबर पर बहुत कम लोग हैं जो किसी के सुख-दुख में शामिल रहते हैं। वे बातूनी हों या न हों, पर सहायक अवश्य होते हैं, आगे बढक़र साथ देते हैं, बिना कहे भी जिम्मेदारियां संभालते हैं और अकसर एहसान नहीं जताते।

चौथे नंबर पर इनसे एक और कदम आगे वाले वे लोग हैं जो किसी की कमी देखते हैं, महसूस करते हैं और ये समझकर कि ये कमी उस व्यक्ति के विकास में बाधा बन सकती है, उसका मार्गदर्शन करते हैं, हौसला बढ़ाते हैं। ऐसा वे किसी स्वार्थवश करें या निस्वार्थ होकर करें पर ऐसे लोग कइयों का बेड़ा पार लगाने में सहायक हो जाते हैं। ये विरले लोग मन से ही दयालु होते हैं, समझदार होते हैं। ऐसे लोग अकसर वे हैं जो खुद भी सफल हैं और दूसरों की सफलता में भी सहायक होते हैं। पांचवें नंबर पर आने वाले लोग लाखों में एक होते हैं, जो मार्गदर्शन करते हैं, हौसला बढ़ाते हैं, पर यहीं रुकते नहीं, बल्कि आगे बढ़ कर सहायता भी करते हैं, सुख-दुख में सहारा भी बनते हैं। ऐसे लोग रास्ते का रोड़ा नहीं हैं, ये हम पर पत्थर नहीं फेंकते, बल्कि हमें औरों द्वारा फेंके गए पत्थरों से पुल बनाना सिखाकर हमारे जीवन का ढर्रा ही बदल देते हैं। ये सिर्फ मार्गदर्शन ही नहीं करते, हौसला ही नहीं बढ़ाते, बल्कि जरूरत होने पर किसी मित्र के पास हमारी सिफारिश करने से भी नहीं हिचकते और कई बार तो आर्थिक सहायता से भी नहीं चूकते। आज हमारे समाज की समस्या यह है कि बहुत से परिवार भी इन्हीं पांच किस्मों के हैं। ऐसे मां-बाप की कमी नहीं है जो अपने बच्चों की कमियां ही गिनाते रहते हैं, उन्हें हतोत्साहित करते रहते हैं। कभी अज्ञानवश और कभी अपने स्वभाव के कारण। वे अपने बच्चों का ही जीना दूभर कर देते हैं। अगर किसी घर में मां सौतेली हो और उसे अपने सौतेले बच्चों से प्यार न हो तो घर का पूरा वातावरण ही दूषित हो जाता है। हमें याद रखना चाहिए कि सफल होने से पहले हर व्यक्ति संघर्ष कर रहा होता है। संघर्ष का वह समय कितना लंबा होगा, यह हर व्यक्ति के साधनों, संपर्कों, योग्यताओं और किस्मत पर निर्भर करता है। दुनिया किसी व्यक्ति को तब जानना शुरू करती है जब वह कुछ नया कर दिखाता है। तालियां तब बजती हैं, मैडल तब मिलते हैं जब कोई विजयी हो जाता है। जीत से पहले मेहनत है, अनुशासन है, संघर्ष है, उपेक्षा है, यहां तक कि अपमान भी है। यह परिवार और मां-बाप का सामूहिक उत्तरदायित्व है कि संघर्षरत बच्चे का मार्गदर्शन करें, उत्साह बढ़ाएं और आवश्यक सुविधाएं प्रदान करें। सफलता और असफलता समाज द्वारा गढ़े गए दो वयस्क शब्द हैं जो कई बार कई प्रतिभाशाली व्यक्तियों के जीवन में जहर घोल देते हैं। हम सब के साथ यही गड़बड़ है। असफलता को लेकर एक शिशु और एक वयस्क की प्रतिक्रियाओं में जमीन-आसमान का अंतर होता है। एक शिशु को असफलता से लज्जा नहीं आती, आत्मग्लानि नहीं होती, अपराध का बोध नहीं होता। चलना सीखने वाले बच्चे बार-बार गिरते भी हैं। साइकिल चलाना सीखते समय बच्चे कई बार लुढक़ते और चोट खाते हैं।

चलते समय या साइकिल चलाना सीखते समय बच्चे सफलता या असफलता के बारे में भी नहीं सोचते, परंतु जब वयस्कों को खुश करना महत्त्वपूर्ण बन जाता है तो सफलता और असफलता के बीच गहरी रेखा खिंच जाती है। हम बच्चों को स्कूल का काम न करने पर धमकाते हैं, नाराज हो जाने की धमकी देते हैं, असफल हो जाने का भय पैदा करते हैं। मां-बाप और अध्यापक मिलकर बच्चों में इस हद तक भय पैदा कर देते हैं कि भय से ग्रस्त बच्चा अपने मस्तिष्क की शक्तियों का विकास करने के बजाय उनका विनाश करता चलता है। भय, बुद्धि का दुश्मन है। वह हमारे दृष्टिकोण को, जीवन के प्रति उसकी सोच को प्रभावित करता है। इस सोच को दूसरा पहलू यह है कि जब तक कोई व्यक्ति सफल न हो जाए, हम उसकी लगन, मेहनत, संघर्ष आदि की कद्र नहीं करते और उसे सफल होने का वातावरण नहीं देते। खेती और बागबानी के उदाहरण से इसे समझा जा सकता है। यदि कोई पौधा किसी खास तरह के वातावरण में पनपता है तो हम उसे वैसा वातावरण देते हैं। बच्चों को फलने-फूलने और सफल होने के लिए जो सहिष्णु, सहयोगी और प्रेरणादायक वातावरण चाहिए वह वातावरण उपलब्ध करवाना परिवार, समाज और सरकार की सामूहिक जिम्मेदारी है। आशय यही है कि संघर्ष की महत्ता स्वीकारें, सफलता से पहले के संघर्ष का भी आदर करें और संघर्षरत लोगों पर पत्थर न फेंके बल्कि यदि किसी ने अज्ञानवश या ईष्र्यावश पत्थर फेंके भी हों तो उनसे पुल बनाएं या पुल बनाना सिखाएं, इसी में हमारी, हमारे समाज की और हमारे देश की भलाई है।

स्पिरिचुअल हीलर

सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक

ई-मेल: indiatotal.features@gmail.com


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