आर. आई. पी. या एल. आई. पी.

By: Nov 20th, 2025 12:05 am

जीवन में लगातार की भागदौड़ और झूठे अंहकार की वजह से परिवार टूट रहे हैं और शांति सचमुच मृत्यु के बाद ही नसीब हो पाती है। काश, हम आर. आई. पी., यानी, रेस्ट इन पीस को एल. आई. पी., यानी, लिव इन पीस में बदल पाते। काश, जीवन इतना आसान होता कि हम शांति से जी पाते। सच तो यह है कि थोड़ी सी समझ से और थोड़े से संयम से ही हम शांति और खुशी पा सकते हैं। समझ और संयम के संगम से ही हम आर. आई. पी. को एल. आई. पी. में बदल सकते हैं। तब सिर्फ रेस्ट इन पीस ही नहीं होगा, बल्कि लिविंग इन पीस, शांति से जीवन जी सकना भी संभव हो जाएगा…

आर. आई. पी., रेस्ट इन पीस, शांति, शांति, शांति। किसी दिवंगत आत्मा के प्रति शोक संदेश में हम लोग इसी तरह से अपने भाव प्रकट करते हैं। रेस्ट इन पीस, यानी, आपकी आत्मा को शांति मिले। मतलब साफ है। जिसे जीवन भर हमने शांति से जीने नहीं दिया, अब दिवंगत हो जाने पर हम दुआ कर रहे हैं कि कम से कम अब तो शांति मिल ही जाए, परमात्मा शांति बख्श ही दें! अशांत जीवन का एक दूसरा पहलू यह भी है कि हमने खुद ही अपना जीवन अशांत बना लिया है। हमारी पूरी शिक्षा, हमारे परिवारों से मिली सीख और सामाजिक ढांचा हमें दौडऩे और दौड़ते ही रहने की सीख देता है। जीवन में श्रम को, मेहनत को, मशक्कत को हमने हीनता का पर्याय मान लिया है। मान लिया है कि शिक्षित होने का मतलब है कि हमें मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। शिक्षित होने का मतलब है कि हम दूसरों से काम करवा सकेंगे। शिक्षित होने का मतलब है कि हुक्म चला सकेंगे। इस विचार के कारण हमारा सामाजिक ढांचा ही बिगडऩे की कगार पर पहुंच गया है और परिवारों के बिखरने की घटनाएं बढ़ती ही चली जा रही हैं। सफलता, उपलब्धियों और सुख को ही खुशी मान लेने की गलती का ही परिणाम है कि लोग खाने और स्वादिष्ट भोजन, पार्टियों में शिरकत करने, शराब पीने या कोई और नशा करने, लगातार शापिंग करने, या अवैध संबंधों से मिलने वाली क्षणिक उत्तेजना को खुशी मान लेते हैं, लेकिन इतने सब के बावजूद संतुष्ट नहीं हो पाते, खालीपन और अधूरेपन से परेशान रहते हैं, जीवन में कुछ कमी महसूस करते हैं और अंतत: हाथ मलते रह जाते हैं। जब सब कुछ कर चुकने के बाद भी संतोष नहीं होता तो अलग-अलग आध्यात्मिक गुरुओं के चक्कर काटते हैं या फिर कोई ऐसा कदम उठा लेते हैं जिससे उनका जीवन ही बर्बाद हो जाता है।

जीवन में आराम नहीं, भागदौड़ इतनी कि खुद अपने ही लिए समय नहीं। हमने सफलता को खुशी का पर्याय मान लिया है, उपलब्धियों को खुशी का पर्याय मान लिया है, हमने सुख को खुशी का पर्याय मान लिया है, बिना यह सोचे कि एक आलीशान बंगले में नरम गद्देदार सोफे पर बैठा व्यक्ति भी अपने हालात से इतना मजबूर, इतना परेशान और इतना दुखी हो सकता है कि वह व्यक्ति आत्महत्या करने के बारे में सोच रहा हो सकता है। अगर सुख-सुविधा से ही शांति मिलती, खुशी मिलती तो प्रिंसेस डायना का तलाक न होता, एक जमाने के दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति बिल गेट्स अपनी पत्नी मेलिंडा गेट्स से अलगाव न होता। अमेजन के संस्थापक और दुनिया के सर्वाधिक अमीर व्यक्ति रह चुके जेफ बेजोस का तलाक लंबे समय तक अखबारों की सुर्खियों में छाया रहा। टेस्ला और स्पेस-एक्स के संस्थापक और फिलहाल दुनिया के सर्वाधिक अमीर व्यक्ति एलॉन मस्क का मामला तो और भी रोचक है। उन्होंने सन 2000 में जस्टीन मस्क से शादी की जो आठ साल में ही टूट गई, फिर उन्होंने 2010 में फिल्मी अदाकारा टालुलाह रिले से शादी की जो दो साल के बाद टूट गई, एक साल के बाद वे दोबारा साथ आ गए, लेकिन चार साल बाद ही यह शादी फिर से टूट गई और अब एलॉन मस्क अकेले हैं जबकि टालूलाह ने पिछले वर्ष टामस ब्रोडी सैंग्स्टर से शादी कर ली है। जो हमारे साथ है, हमारे आसपास है, हमारे लिए बहुत कुछ करता है, हम उसे महसूस नहीं करते, उसका सम्मान नहीं करते, उसके कामों में गलतियां निकालते रहते हैं और जो अभी पास नहीं है उसके लिए तरसते रहते हैं। अभी कुछ साल पुरानी ही बात है जब एक पति-पत्नी अपनी शादी से असंतुष्ट होकर एक-दूसरे को बताए बिना एक डेटिंग साइट पर अपने लिए पार्टनर ढूंढने लगे। दोनों को ही एक ऐसा साथी मिला जिसके बारे में उन्हें लगा कि यह उन्हें सम्मान देता है, उन्हें समझता है, उनकी भावनाओं का आदर करता है। कुछ महीनों तक ये चैटिंग चलती रही, फिर आकर्षण इतना बढ़ा कि उन्होंने अपने-अपने पार्टनर से मिलने की योजना बनाई।

तारीख तय हो गई, समय तय हो गया और दोनों ने अपने-अपने पार्टनर को बताया कि हम फलां-फलां कपड़े पहने होंगे ताकि एक-दूसरे को पहचानना आसान हो जाए। और जब मुलाकात हुई तो दोनों के पार्टनर वे खुद पति-पत्नी ही थे। यानी, डेटिंग वेबसाइट पर अनजाने में दोनों पति-पत्नी एक-दूसरे को ही लुभाने की कोशिश कर रहे थे और जब वे निर्धारित स्थान और समय पर पहुंचे तो एक-दूसरे को देख कर हैरान भी हुए और शर्मिंदा भी। तकनीक ने हमारे सामने कई विकल्प खोले हैं लेकिन तकनीक ने ही हमें नकारा भी बनाया है, तकनीक ने हमें बेपर्दा भी किया है और तकनीक ने हमें बर्बाद भी किया है। डेटिंग साइट जैसे डिजिटल प्लेटफार्म पर हमारे साथ क्या होगा, उसकी भविष्यवाणी असंभव है। यहां ‘या बाबू रेल में, या बाबू जेल में’ वाली कहावत पूरी तरह से लागू होती है। यह घटना हमारी आंखें खोलने के लिए काफी है। हमें समझना चाहिए कि हमारी भावनात्मक आवश्यकताएं अगर पूरी न हो पायें तो हम राह भटक सकते हैं, इसलिए यह आवश्यक है कि हम एक-दूसरे की भावनाओं को समझकर आपसी रिश्ते सींचते रहें, और रिश्तों में तर्क से ही नहीं, दिमाग से ही नहीं, बल्कि दिल से भी काम लें, भावनाओं का सम्मान करें।

छोटी-छोटी बातों पर नाराज हो जाना, नाराज हो जाने पर यह उम्मीद करना कि सामने वाला ही माफी मांगे, माफी मांगे जाने पर भी नखरे में रहना आदि के कारण परिवार टूटे हैं। पहले जहां हम चट मंगनी, पट ब्याह की कहावतें सुनते थे, वहीं अब हम चट शादी, पट तलाक की स्थिति झेल रहे हैं। हम अगर अपने रिश्तों को देखें तो उनका बनावटीपन साफ नजर आता है। बूढ़े मां-बाप को अनाथाश्रम भेज देना, या उनकी संपत्ति हड़पने के लिए उनके देहावसान की कामना करना, पति-पत्नी के संबंधों में दरार आदि घटनाएं अब इतनी आम हैं कि उनकी खबर से हमें जरा भी परेशानी नहीं होती। रिश्तों का खोखलापन आदमी को तोड़ देता है, पर जब तक आंखें खुलती हैं, संभलने का वक्त निकल चुका होता है। जीवन में लगातार की भागदौड़ और झूठे अंहकार की वजह से परिवार टूट रहे हैं और शांति सचमुच मृत्यु के बाद ही नसीब हो पाती है। काश, हम आर. आई. पी., यानी, रेस्ट इन पीस को एल. आई. पी., यानी, लिव इन पीस में बदल पाते। काश, जीवन इतना आसान होता कि हम शांति से जी पाते। सच तो यह है कि थोड़ी सी समझ से और थोड़े से संयम से ही हम शांति और खुशी पा सकते हैं। समझ और संयम के संगम से ही हम आर. आई. पी. को एल. आई. पी. में बदल सकते हैं। तब सिर्फ रेस्ट इन पीस ही नहीं होगा, बल्कि लिविंग इन पीस, शांति से जीवन जी सकना भी संभव हो जाएगा।

स्पिरिचुअल हीलर

सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक

ई-मेल: indiatotal.features@gmail.com


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