Himachal Syul ke Laddu: मौसम और स्वाद का संगम, सर्दियों में कांगड़ा के यह लड्डू नहीं खाए तो क्या खाया?
पंकज ओबरॉय—कांगड़ा
हिमाचल में परंपरा और संस्कृति की झलक हर 10 किलोमीटर बाद देखने को मिल जाती है। हिमाचल जहां धार्मिक आस्था के लिए सदियों से दुनिया भर में छाया हुआ है, वहीं यहां का खानपान भी एक अलहदा स्वाद छोड़ता है। गर्मियों से लेकर सर्दियों तक हिमाचल के हर जिला में खानपान मौसम के हिसाब से बदलता है और अपनी अलग खुशबू बिखेरता है।
जब भी खानपान की बात आती है, तो कांगड़ा का जिक्र जरूर होता है, क्योंकि यहां हर मौसम के पकवान मौजूद हैं। चूंकि अब सर्दियां हैं, तो इस मौसम की एक मिठाई बेहद मशहूर और खास है, वह है स्यूल के लड्डू। सर्दियों शुरू होते ही कांगड़ा में पारंपरिक स्यूल के लड्डुओं की खुशबू बाजारों में फैलने लगी है। दशकों पुरानी यह मिठाई न सिर्फ स्थानीय संस्कृति की पहचान है, बल्कि आज के आधुनिक दौर में भी इसका स्वाद लोगों को अपनी ओर खींच रहा है। बताते चलें कि कांगड़ा में स्यूल के लड्डू बनाने का यह व्यवसाय वर्षों पहले शुरू हुआ था और समय बदलने के बावजूद इसकी लोकप्रियता और मांग लगातार बढ़ रही है।
कैस बनता है लड्डू
पुरानी परंपरा और विधि के अनुसार पहले गुड़ को बड़े कड़ाहों में अच्छी तरह गर्म किया जाता है। जब गुड़ पूरी तरह पिघलकर गाढ़ा हो जाता है, तब उसमें साफ की हुई स्यूल डालकर उसे अच्छी तरह मिला जाता है। इसके बाद इसे हाथों से छोटे-छोटे गोल लड्डू का आकार दिया जाता है।
शरीर को रखते हैं गर्म
सर्दियों की ठंड में तैयार यह लड्डू शरीर को गर्म रखने और ऊर्जा प्रदान करने के लिए उत्तम माने जाते हैं। इस व्यवसाय से जुड़े सुनील कुमार और उनके कारीगर बताते हैं कि उनका परिवार कई वर्षों से इस परंपरागत व्यापार से जुड़ा हुआ है। जैसे ही सर्दी का मौसम शुरू होता है, उनका काम भी तेज़ हो जाता है, जो कि शिवरात्रि तक लगातार चलता रहता है। सुनील कुमार का कहना है कि न सिर्फ स्थानीय लोग बल्कि दूर-दराज़ के दुकानदार भी उनके पास विशेष रूप से स्यूल के लड्डू लेने आते हैं।
कमाई और परंपरा का संगम
सुनील कुमार ने बताया कि उनके बुज़ुर्गों द्वारा शुरू की गई यह विरासत आज भी वह पूरे मनोयोग से आगे बढ़ा रहे हैं। इस व्यवसाय को जारी रख पाना उनके लिए सिर्फ कमाई का साधन ही नहीं, बल्कि एक भावनात्मक जुड़ाव भी है। उन्हें इस बात की खुशी और सुकून है कि वह अपने पुरखों की परंपरा को आज के समय में भी जीवित रख पाए हैं। कुल मिलाकर, सर्दियों के मौसम में कांगड़ा के स्यूल के लड्डू न सिर्फ स्वाद का आनंद देते हैं, बल्कि स्थानीय संस्कृति, परंपरा और वर्षों पुरानी विरासत की भी याद दिलाते हैं।
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