चमत्कार का विज्ञान
जब मशीन चुप हो जाती है, तब चमत्कार घटता है। प्रार्थना कोई मांग नहीं है। प्रार्थना समर्पण है। यही कारण है कि एक शांत क्षण, हजार बेचैन प्रयासों से ज्यादा प्रभावी होता है। सच तो यह है कि बेचैनी में किया गया कर्म या तो भ्रम से जन्मता है, या अहंकार से, और मौन से जन्मा कर्म साधना बन जाता है। जब कर्म मौन से निकलता है, तब परिणाम की जल्दी नहीं रहती। जीवन बीज की तरह है, उसे समय चाहिए, धैर्य चाहिए, भरोसा चाहिए। हम चमत्कार को पहचान नहीं पाते, क्योंकि हम शोर की उम्मीद करते हैं। चमत्कार दरअसल बहुत शांत चीज है। इतना शांत कि अक्सर लोग उसे पहचान ही नहीं पाते। क्योंकि आदमी को शोर पसंद है- टीवी तेज चले, मोबाइल बजे, दिमाग दौड़े। चमत्कार चुपचाप आता है, और हम चुप रहना ही भूल चुके हैं…
चमत्कार कोई ऐसा तमाशा नहीं है कि अचानक बिजली गिरे, बादल गरजें और लोग कहें – ‘लो, हो गया चमत्कार!’ अगर ऐसा होता, तो बिजली विभाग सबसे बड़ा संत होता। चमत्कार को हमने बहुत हल्के में समझ लिया है। हमने उसे बाहरी घटना मान लिया है, कभी किसी रोग का अचानक मिट जाना, कभी किसी परिस्थिति का पलट जाना। चमत्कार कोई घटना नहीं है। घटना तो अखबार में छपती है। चमत्कार भीतर घटता है, और भीतर घटा हुआ कभी खबर नहीं बनता, वह रूपांतरण बनता है। समस्या यह है कि मनुष्य ने चमत्कार को हमेशा बाहर खोजा है, क्योंकि बाहर देखना आसान है। भीतर देखना साहस मांगता है। बाहर देखने में आंखें लगती हैं, भीतर देखने में आत्मा। आत्मा से सामना करना मन को डराता है, क्योंकि आत्मा के सामने मन टिक नहीं पाता। मन को अपनी दुकान बंद करनी पड़ती है। मनुष्य जिस क्षण कहता है- ‘यह असंभव है’, उसी क्षण वह अपने ही अनुभव को जेल में बंद कर देता है। असंभव कुछ भी नहीं है, सिवाय उस चीज के, जिसे हमने पहले ही नकार दिया हो।
जीवन की सारी सीमाएं हमारी अपनी धारणाएं हैं। ब्रह्मांड के पास कोई सीमा नहीं है। ब्रह्मांड तो खुला आकाश है, सीमा हम हैं। मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है कि उसके पास समस्याएं हैं। समस्या यह है कि वह हर समस्या को हथौड़े से पीटने लगता है। और फिर हैरान होता है कि चोट क्यों लग रही है। कुछ समस्याएं हल करने से नहीं, देखने से सुलझती हैं। लेकिन देखने के लिए धैर्य चाहिए, और धैर्य आजकल महंगाई से भी ज्यादा दुर्लभ है। मन बड़ा जालसाज है। वह कहता है- ‘सोचो, समझो, योजना बनाओ।’ लेकिन वह यह नहीं बताता कि सोचते-सोचते हम जीना भूल रहे हैं। मनुष्य समाधान खोजने में इतना व्यस्त हो गया है कि वह समस्या को जीना ही भूल गया है। जो समस्या को जी लेता है, उसके लिए समाधान अप्रासंगिक हो जाता है। क्योंकि समस्या तब समस्या रहती है, जब हम उससे लड़ते हैं। जिस दिन हम उसे देख लेते हैं, बिना घृणा, बिना डर, उसी दिन वह ढीली पडऩे लगती है। जीवन कोई युद्ध नहीं है, लेकिन अहंकार जीवन को युद्ध बना देता है, क्योंकि अहंकार हर हाल में जीतना चाहता है। जो जीतना चाहता है, वह अक्सर हार जाता है। कई बार तो उसकी जीत में भी हार होती है, लेकिन जो समस्या को जी लेता है, वह जीत-हार से मुक्त हो जाता है। जब मन दस दिशाओं में दौड़ रहा होता है, तब समाधान पास खड़ा होकर भी कहता है- ‘भाई, फुर्सत मिले तो देख लेना।’ लेकिन मन कहता है- ‘अभी टाइम नहीं है, मैं परेशान हूं।’ यही परेशानी आदमी को महान लगती है। हम सोचते हैं कि हम बहुत गंभीर व्यक्ति हैं, हमेशा तनाव में रहते हैं। हमें कौन समझाए कि तनाव कोई योग्यता नहीं है। चमत्कार बाहर की परिस्थितियों के बदलने से नहीं होता। अगर ऐसा होता, तो अमीर सबसे ज्यादा चमत्कारी होते, शक्तिशाली सबसे ज्यादा आनंदित होते। लेकिन सच्चाई उलटी है। जिनके पास सब कुछ है, उनके भीतर सबसे ज्यादा खालीपन है।
क्योंकि उन्होंने सब कुछ बाहर इक_ा किया, भीतर कुछ नहीं बचा। चमत्कार भीतर की दृष्टि के बदलने से होता है। दृष्टि बदली नहीं कि संसार बदल गया। एक ही परिस्थिति किसी को नरक लगती है, किसी को पाठशाला। फर्क परिस्थिति में नहीं है, फर्क देखने वाले में है। मन भय में हो तो हर रास्ता बंद लगता है। मन भरोसे में हो तो बंद दरवाजा भी निमंत्रण बन जाता है। हम समझते हैं कि हमारे पास ऊर्जा नहीं बची। यह भी मन का बहाना है। ऊर्जा कभी कम नहीं होती। ऊर्जा केवल बिखरी होती है। हम एक साथ भविष्य में भी हैं, अतीत में भी, और वर्तमान को पकडऩे की कोशिश में भी। हम कहीं भी पूरे नहीं हैं, इसलिए शक्ति टुकड़ों में बंट जाती है। यह ऐसा ही है जैसे सौ दिशाओं में बहती नदी, ऐसे में गहराई कहीं नहीं होगी। जब हमारी चेतना एक दिशा में ठहर जाती है, तो ऊर्जा सघन हो जाती है, और जहां सघनता है, वहीं संभावना है। हम अक्सर ठहराव को आलस्य समझ लेते हैं, मौन को लोग निष्क्रियता समझ लेते हैं, लेकिन मौन सबसे सक्रिय अवस्था है। मौन कोई शब्दों का अभाव नहीं है, मौन अहंकार का अभाव है। मौन तो ध्यान की पहली सीढ़ी है। ध्यान का अर्थ है, जीवन में हस्तक्षेप न करना। बस देखना, सुनना और सिर्फ होना, बस होना। जब तुम सिर्फ ‘हो जाते’ हैं, तब जीवन बोलने लगता है। यहां हम अक्सर एक बड़ी भूल करते हैं। हम कहते हैं कि हमने बहुत कोशिश की, पर कुछ नहीं हुआ। जबकि सच्चाई यह है कि इसलिए नहीं हुआ, क्योंकि हमने बहुत कोशिश की। जीवन को धक्का देकर नहीं खोला जा सकता। जीवन दरवाजा नहीं है, वह नदी है। नदी से लड़ेंगे तो डूबोगे। यही समर्पण है, पर हम इससे डरते हैं। हमें लगता है कि समर्पण मतलब हार। नहीं, समर्पण मतलब बुद्धि। समर्पण का अर्थ यह स्वीकार कर लेना कि यह ब्रह्मांड हमसे ज्यादा बुद्धिमान है। यह कोई धार्मिक वक्तव्य नहीं है, यह गहरा वैज्ञानिक तथ्य है। हमारा मन एक छोटी मशीन है, ब्रह्मांड एक विराट चेतना है।
जब छोटी मशीन बड़ी चेतना को निर्देश देने लगती है, तब दुख पैदा होता है। जब मशीन चुप हो जाती है, तब चमत्कार घटता है। प्रार्थना कोई मांग नहीं है। प्रार्थना समर्पण है। यही कारण है कि एक शांत क्षण, हजार बेचैन प्रयासों से ज्यादा प्रभावी होता है। सच तो यह है कि बेचैनी में किया गया कर्म या तो भ्रम से जन्मता है, या अहंकार से, और मौन से जन्मा कर्म साधना बन जाता है। जब कर्म मौन से निकलता है, तब परिणाम की जल्दी नहीं रहती। जीवन बीज की तरह है, उसे समय चाहिए, धैर्य चाहिए, भरोसा चाहिए। हम चमत्कार को पहचान नहीं पाते, क्योंकि हम शोर की उम्मीद करते हैं। चमत्कार दरअसल बहुत शांत चीज है। इतना शांत कि अक्सर लोग उसे पहचान ही नहीं पाते। क्योंकि आदमी को शोर पसंद है- टीवी तेज चले, मोबाइल बजे, दिमाग दौड़े। चमत्कार चुपचाप आता है, और हम चुप रहना ही भूल चुके हैं। चमत्कार हमेशा खामोशी में आता है, बिल्कुल भोर की तरह, जब अंधेरा बिना शोर के विदा हो जाता है। एक शांत क्षण कई दवाओं से ज्यादा असर करता है। लेकिन शांति मुफ्त में मिलती है, इसलिए उस पर भरोसा कम किया जाता है। प्रार्थना का भी यही हाल है। लोग उसे शब्दों में बांध देते हैं। असल प्रार्थना शब्दों के बाद शुरू होती है- जब मन थककर कहता है, ‘अब मैं नहीं जानता।’ यह ‘न जानना’ ही सबसे बड़ी बुद्धि है। चमत्कार की शुरुआत यहीं से होती है, बस हमें इस पर भरोसा करना है। भरोसा हुआ तो जीवन बदल जाता है। यही तो करना है, बस, फिर आनंद ही आनंद है।
स्पिरिचुअल हीलर
सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक
ई-मेल: indiatotal.features@gmail.com
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