ज्ञान का मौन
यह मौन जीवंत होता है क्योंकि इसमें डर नहीं होता। इसलिए जब कोई कहता है, ‘मुझे नहीं पता’ और इस स्वीकारोक्ति के बाद भी वह खुले दिल से हंस सकता है, तो समझ लेना चाहिए कि वह व्यक्ति मुक्त हो रहा है। मुक्त किसी बंधन से नहीं, बल्कि जानने के अहम से। मानव इतिहास का अधिकांश हिस्सा उत्तरों की खोज का इतिहास है। दर्शन, धर्म, विज्ञान, सबने प्रश्नों को सुलझाने का प्रयास किया है। लेकिन एक स्तर ऐसा भी है जहां प्रश्न और उत्तर दोनों ही अप्रासंगिक हो जाते हैं। जब यह बोध गहराता है कि हमारे पास कोई अंतिम उत्तर नहीं है, तब अस्तित्व का बोझ हल्का हो जाता है, क्योंकि अब हम सत्य के स्वामी नहीं, उसके सहभागी बन जाते हैं। यह अवस्था निहिलिज़्म नहीं है, यह बौद्धिक परिपक्वता है। यहां अर्थ नष्ट नहीं होता, बल्कि कृत्रिम अर्थ गिर जाता है। हम ऐसा करेंगे तो पाएंगे कि जीवन प्रश्नोत्तर की प्रतियोगिता नहीं, बल्कि अनुभव की यात्रा है…
अक्सर जीवन के शुरुआती चरण में हम उत्तर इक_ा करते हैं : किताबों से, लोगों से, अनुभवों से। फिर एक दौर आता है जब हम उन उत्तरों को दिखाने लगते हैं। हमारे आसपास के लोगों को जब कोई समस्या पेश आती है, या हमें लगता है कि वो किसी समस्या से दरपेश हैं तो हम फटाफट ज्ञान देने लग जाते हैं। वो उत्तर जो हमने कहीं से पढ़े थे, सुने थे, सीखे थे, हम उन्हें दोहराने लग जाते हैं, जैसे वह हमारे ज्ञान की पहचान वही हो। सच तो यह है कि बहुत कम लोगों के जीवन में, वह मोड़ आता है जहां यह साफ दिखने लगता है कि जिन उत्तरों को हम पकड़े हुए थे, वे प्रश्नों से ज्यादा हमारे डर को ढकने का साधन थे। हमें लगता था कि वे हमारे ज्ञान का प्रमाण हैं। जब हम किसी को वह ज्ञान बांटते थे तो हम यह महसूस करते थे कि सामने वाला हमें ज्ञानी समझ रहा है। यह हमारा ज्ञान कम, हमारे अहंकार की तुष्टि अधिक थी। इसके विपरीत जब हम कहते हैं कि मुझे यह दिखाने की कोई आवश्यकता नहीं है कि मेरे पास हर सवाल का जवाब है, तो असल में हम प्रदर्शन से मुक्त हो रहे हैं, और जब हम यह भी देख लेते हैं कि मेरे पास असल में हर सवाल का जवाब है ही नहीं, तो यह खालीपन नहीं, बल्कि ईमानदारी है। यह वही जगह है जहां से वास्तविक विनम्रता जन्म लेती है।
जीवन एक समय तक हमें यह सिखाता रहता है कि हमें उत्तर चाहिए। हर प्रश्न के सामने एक जवाब होना चाहिए, हर शंका के सामने कोई सिद्धांत, हर असहजता के सामने कोई तर्क। हम सीखते हैं, पढ़ते हैं, सुनते हैं, और धीरे-धीरे अपने भीतर उत्तरों का भंडार खड़ा कर लेते हैं। फिर एक दिन अनजाने ही हम यह मान बैठते हैं कि ये उत्तर ही हमारी पहचान हैं। यदि उत्तर छिन गए, तो हम भी छिन जाएंगे। इसी भय से हम हर समय सजग रहते हैं कि कोई प्रश्न आ जाए तो तुरंत उत्तर दिया जाए, चाहे भीतर से वह उत्तर झूठा ही क्यों न हो, पर जीवन की यात्रा में एक मोड़ ऐसा आता है जहां यह पूरा ढांचा अपने आप ढहने लगता है। वहां कोई आघात नहीं होता, कोई दुर्घटना नहीं होती, बस एक शांत-सी समझ उतरती है कि हम उत्तरों के कारण जीवित नहीं हैं। हम उत्तरों के बिना भी हो सकते हैं। जैसे ही यह समझ आती है, वैसे ही दिखाने की आवश्यकता अपने आप गिर जाती है। अब यह साबित करना जरूरी नहीं रह जाता कि हम जानते हैं। इस अवस्था में मनुष्य पहली बार हल्का होता है। अब बातचीत में तर्क नहीं, उपस्थिति होती है। अब मौन कमजोरी नहीं, विश्राम बन जाता है। पहले जहां हर प्रश्न चुनौती लगता था, अब वही प्रश्न मुस्कान बन जाता है, क्योंकि अब उत्तर देने वाला अहम पीछे हट चुका है। अब जो शेष है, वह केवल साक्षी है, देखने वाला, सुनने वाला, रहने वाला। हम ऐसा करेंगे तो जीवन में एक अद्भुत परिवर्तन घटेगा। अब हमें हर चर्चा में जीतने की आकांक्षा नहीं रहेगी। अब किसी को प्रभावित करने की बेचैनी नहीं रहेगी। अब यदि कोई पूछे और हम न जानें, तो हम सहजता से कह सकेंगे कि मुझे नहीं पता, और यह वाक्य अब अपमान नहीं लगेगा, बल्कि विश्राम लगेगा।
यही विश्राम साधना की शुरुआत है। मन हमेशा उत्तर चाहता है क्योंकि उत्तर उसे सुरक्षा देते हैं। उत्तर मतलब नक्शा, और नक्शा मतलब नियंत्रण। लेकिन जीवन नक्शे से नहीं चलता। जीवन अनियंत्रित है, और इसी कारण सुंदर है। जब हम यह समझ लेते हैं कि हमारे पास हर सवाल का जवाब नहीं है, तो इसका अर्थ यह है कि हम पहली बार जीवन को वैसे ही स्वीकार कर रहे हैं जैसा वह है, यानी, अज्ञात। मन को अज्ञात से डर लगता है, इसलिए वह दर्शन रचता है, धर्म गढ़ता है, सिद्धांत बनाता है, लेकिन जागरण उस क्षण घटता है जब हम यह देख लेते हैं कि सारे उत्तर मन की चालें हैं। वे हमें सत्य तक नहीं ले जाते, वे केवल हमें उलझाए रखते हैं। उत्तर छोड़ते ही एक अद्भुत मौन पैदा होता है। यह मौन जीवंत होता है क्योंकि इसमें डर नहीं होता। इसलिए जब कोई कहता है, ‘मुझे नहीं पता’ और इस स्वीकारोक्ति के बाद भी वह खुले दिल से हंस सकता है, तो समझ लेना चाहिए कि वह व्यक्ति मुक्त हो रहा है। मुक्त किसी बंधन से नहीं, बल्कि जानने के अहम से। मानव इतिहास का अधिकांश हिस्सा उत्तरों की खोज का इतिहास है। दर्शन, धर्म, विज्ञान, सबने प्रश्नों को सुलझाने का प्रयास किया है। लेकिन एक स्तर ऐसा भी है जहां प्रश्न और उत्तर दोनों ही अप्रासंगिक हो जाते हैं। जब यह बोध गहराता है कि हमारे पास कोई अंतिम उत्तर नहीं है, तब अस्तित्व का बोझ हल्का हो जाता है, क्योंकि अब हम सत्य के स्वामी नहीं, उसके सहभागी बन जाते हैं। यह अवस्था निहिलिज़्म नहीं है, यह बौद्धिक परिपक्वता है। यहां अर्थ नष्ट नहीं होता, बल्कि कृत्रिम अर्थ गिर जाता है। हम ऐसा करेंगे तो पाएंगे कि जीवन प्रश्नोत्तर की प्रतियोगिता नहीं, बल्कि अनुभव की यात्रा है। हर उत्तर समय-सापेक्ष होता है, सीमित होता है, लेकिन अनुभव अनंत है, इसलिए जो व्यक्ति उत्तरों से चिपका रहता है, वह सीमित में जीता है, और जो उन्हें छोड़ देता है, वह अनंत में प्रवेश करता है। मनोविज्ञान कहता है कि हर सवाल का जवाब देना अक्सर असुरक्षा का संकेत होता है। मन तब उत्तरों का सहारा लेता है जब उसे अनिश्चितता सहन नहीं होती। लेकिन आधुनिक न्यूरोसाइंस यह भी बताता है कि उच्च संज्ञानात्मक विकास के साथ व्यक्ति अनिश्चितता को स्वीकार करना सीखता है। यह हमारे प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स का लचीलापन दर्शाता है, जहां जिज्ञासा, खुलेपन और सीखने की क्षमता विकसित होती है।
वैज्ञानिक दृष्टि से, यही अवस्था रचनात्मकता और मानसिक स्वास्थ्य के लिए सबसे अनुकूल मानी जाती है। जीवन का सबसे सुंदर क्षण वह नहीं होता जब हमें उत्तर मिल जाते हैं, बल्कि वह होता है जब उत्तरों की आवश्यकता समाप्त हो जाती है, जब हम यह दिखाना छोड़ देते हैं कि हम जानते हैं। हम ऐसा करेंगे तो पाएंगे कि जीवन किसी निष्कर्ष की मांग नहीं करता, वह केवल उपस्थिति चाहता है, और जब उपस्थिति पूर्ण हो जाती है, तब प्रश्न अपने आप मौन हो जाते हैं। यही वह बिंदु है जहां जीवन बोझ नहीं, साधना बनता है और अंतत: वरदान बन जाता है। बहस में शामिल होना हमारे मन के लिए ऐसा ही है मानो हम ऐसी जगह खड़े हों जहां चारों तरफ से अलग-अलग किस्म का शोर हो रहा है और सब कुछ इतना गड्डमड्ड हो गया है कि समझ में कुछ भी नहीं आ रहा। बहस के समय भी इत्मीनान से देखना, चुपचाप सुनना, साक्षी भाव को जगाता है। यह साक्षी भाव ही श्रीमद्भगवद्गीता का असली संदेश है।
स्पिरिचुअल हीलर
सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक
ई-मेल: indiatotal.features@gmail.com
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