सद्गुरु की संगत

By: May 30th, 2026 12:15 am

बाबा हरदेव

गतांक से आगे…
सद्गुरु की कृपा से मन को ऐसी मति मिलती है कि पल-पल, छिन-छिन हरि का सुमिरन होता है। परमात्मा चेते आया तो संसार का चिंतन समाप्त हो जाता है। सद्गुरु ने जो नाम धन दिया है इससे बड़ा संसार में कोई धन नहीं है। संसार में लोग बड़े-बड़े महल बनाते हैं लेकिन वो इस बात से आगाह नहीं होते कि इतना बड़ा महल तो बना लिया लेकिन इसमें रहना कितने दिन है, इसका तो पता ही नहीं है।

तमाम राजा-महाराजा हुए वो भी महल बनाते चले गए, ख्यालों के घोड़े पर सवार हुए तो उतरे ही नहीं, घोड़े दौड़ाते ही चले गए। सद्गुरु आगाह करता है कि मन की ये दौड़, मन की ये चालाकियां काम आने वाली नहीं हैं। काम आएगा तो केवल परमात्मा का ज्ञान, इसका निरंतर सुमिरन, संतों की सेवा, संतों के साथ मिल-बैठकर किया हुआ सत्संग। सद्गुरु मानव मन की भोग वृत्ति को त्याग वृत्ति में बदल कर जीवन आसान कर देता है। लालसाओं, कामनाओं में घिरे मानव को सरलता और सहजता वाला जीवन दे देता है, फिर जीवन की चाल भी सहज बन जाती है। ज्यादा तेज दौडऩे वाला मुंह के बल औंधा गिरता है। गाड़ी तेज चलाई जाए तो संतुलन बिगड़ सकता है, गाड़ी और सवार दोनों को नुकसान पहुंच सकता है। सहजता, सरलता, विशालता देकर सद्गुरु गुरसिख का जीवन आसान कर देता है।

सद्गुरु की संगत से चेहरे पर नूर आता है। मन में दिव्यता आती है। यह दिव्यता निराली होती है, यह सांसारिक सौंदर्य की भांति नुकसान नहीं पहुंचाती,बल्कि हमेशा आनंद ही देती है इसलिए कहा गया है कि सद्गुरु को जो बोल भी आए सुनना और सुनाना है। सत्संग में सद्गुरु के बोल सुनना और अपने मन, वचन, कर्म से सुनना सद्गुरु की स्तुति है।

यह मन की भटकन को मिटाने वाला है। अगर सारी धरती भी लंबी उम्र लगाकर घूम लें, तमाम तीर्थ धाम भ्रमण कर आएं, तब भी अनेक यत्न कर लें मन को चैन, सुकून नहीं मिल पाता। संसार में आकर इनसान को निरंकार से बढक़र कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है। सद्गुरु की कृपा से ब्रह्मज्ञान प्राप्त होते ही मन की तमाम भटकनें समाप्त हो जाती हैं, संसार सागर से पार उतारा हो जाता है। भक्त दो-चार हों, दस-बीस हों, सैकड़ों हजारों हों, साधारण सत्संग कार्यक्रम हो या कोई विशाल समागम हो, उन्हें एक साथ बैठाने वाला होता है सद्गुरु। सद्गुरु ही उन्हें अनेक भिन्नताओं के बावजूद एकता के सूत्र में पिरोकर एक परिवार का रूप देता है।

घर से चलते हैं तो सभी के साथ अपनी-अपनी सांसारिक अथवा सामाजिक पहचान जुड़ी होती है। कोई अध्यापक है, तो कोई डाक्टर, कोई अधिकारी है, तो कोई कर्मचारी, कोई मालिक है, तो कोई मजदूर। इसी प्रकार कोई पिता है, तो कोई पुत्र, कोई सास है, तो कोई बहू, कोई पति है तो कोई पत्नी, कोई भाई है, तो कोई बहन। मगर जैसे ही सत्संग में कदम रखते हैं सभी को एक ही पहचान मिलती है, भक्त की जो उन्हें सद्गुरु से प्राप्त होती है। सद्गुरु जिस धागे से अनेकता को एकता प्रदान करता है उसका नाम है, ब्रह्मज्ञान।

भक्त जैसे-जैसे ब्रह्मज्ञान प्राप्त करके सत्संग में एकत्रित होते हैं, इस महान एवं विशाल परिवार का अंग बनते चले जाते हैं। उनके विचारों, उनके वचनों एवं कर्म में समानता आती चली जाती है। वे सभी अब सद्गुरु द्वारा प्रदान किए गए ब्रह्मज्ञान के आधार पर ही मन-वचन-कर्म को सजाते हैं। जहां मन करके सभी के भले की कामना करते हैं, वहीं उनकी वाणी में मिठास आ जाती है और कर्म में परोपकर। -क्रमश:


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