राहुल गांधी का नया रास्ता
डीएमके इतना नाराज हुई कि उसने लोकसभा के अध्यक्ष को लिखा कि आगे से उसके सांसद कांग्रेस के सदस्यों के नजदीक भी नहीं बैठेंगे। उनके बैठने की अलग व्यवस्था हो…
राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश में एक सभा में सार्वजनिक रूप से नरेंद्र मोदी, अमित शाह और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर एक गंभीर आरोप लगाया है। राहुल गांधी ने कहा कि ये तीनों राष्ट्र के गद्दार हैं। इसका सबूत के रूप में उन्होंने कहा कि ये बाबा साहिब अंबेडकर के बनाए संविधान को नष्ट कर रहे हैं। इस पर चर्चा करने से पहले यह विचार करना लाजिमी है कि आखिर राहुल गांधी के इस आरोप पर चर्चा करना जरूरी क्यों है? क्या कोई कुछ भी बोलेगा तो जरूरी है कि उसका उत्तर दिया जाए? राहुल गांधी क्या ‘कोई भी’ की कैटेगरी में आते हैं? इसका उत्तर सकारात्मक व नकारात्मक दोनों हो सकता है। यदि कोई अनर्गल प्रलाप करता है तो कई बार डाक्टर भी कह देते हैं कि इसकी बात को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है। इसकी स्थिति ठीक नहीं है। लेकिन दिक्कत यह है कि जो अनर्गल प्रलाप कर रहा है, वह भारत की लोक सभा में विपक्षी नेता भी है। यानी वह भारत के विपक्ष का प्रतिनिधित्व करता है। दूसरे वह उस राज परिवार का चिराग है जिसने लंबे अर्से तक भारत पर राज किया है। इसलिए उसकी बात का जवाब देना जरूरी हो जाता है। सबसे पहले संघ पर राष्ट्रद्रोही होने की बात, इसमें नरेंद्र मोदी और अमित शाह भी शुमार हैं क्योंकि वे भी संघ के स्वयंसेवक ही हैं। भारत एक प्राचीन राष्ट्र है, उतना सभी मानते हैं। लेकिन इस अवधारणा से ह्रदय से जुडऩा पड़ता है। तभी राष्ट्र व्यक्ति के ह्रदय के भीतर से स्पंदित होता है। तभी भारत केवल भारत न रह कर भारत माता बनता है। पंडित जवाहर लाल नेहरू राष्ट्र के इस भाव को स्वीकारते थे।
यह उनकी लिखी किताबों से जाहिर है। वे इस प्रकार की बातें अपनी बेटी इंदिरा गांधी को भी लिखा करते थे। लेकिन एटीएम (अरब, तुर्क, मुगल) मूल के मुसलमान भारत को एक राष्ट्र नहीं मानते थे। उनके लिए भारत, भारत माता नहीं थी, बल्कि भारत ऐसा देश था जिसे उनके पूर्वजों ने जीता था। लेकिन वे यह भी बखूबी जानते थे कि मुगलों से सत्ता अंग्रेजों ने छीन ली थी और अब उन्हें वापस मिलने वाली नहीं थी। लेकिन एटीएम के सात सौ साल के राज में भारत के बहुत से लोग भी सत्ता के जोर से इस्लाम में शामिल कर लिए गए थे। इसलिए उनकी नई रणनीति थी कि मुसलमानों का एक नया संगठन बनाया जाए और एटीएम और देसी मुसलमानों के लिए भारत के एक हिस्से को तोड़ कर एक नया देश बनाया जाए जिस पर एटीएम मूल के मुसलमानों का राज हो। एटीएम ने इस काम के लिए 1905 में मुस्लिम लीग की स्थापना कर ली। मुस्लिम लीग भारत माता को खंडित करने के लिए डट गई। लेकिन कांग्रेस ने इसका विरोध किया। क्योंकि कांग्रेस भारत को भारत माता मानती थी, इसलिए उसको खंडित करने का तो सोच ही नहीं सकती थी। लेकिन फिर आया 1947 का समय। ब्रिटेन इस बात पर आमादा था कि वे भारत को तभी छोड़ेंगे जब कांग्रेस भी भारत को खंडित करने के लिए सहमत हो जाएगी। यदि कांग्रेस सहमत नहीं होती तो शायद स्वतंत्रता संग्राम और लंबा चलता। कांग्रेस इतिहास के उस मोड़ पर पहुंच गई थी जहां या तो उसे राष्ट्र से द्रोह कर भारत माता के दो टुकड़े करने की सहमति देनी थी या फिर स्वतंत्रता के लिए संघर्ष जारी रखना था ताकि राष्ट्र खंडित न हो। कांग्रेस ने पहला रास्ता चुना। राष्ट्र द्रोह का। उसने बाकायदा प्रस्ताव पारित किया कि वह भारत को दो टुकड़ों में विभाजित करने के लिए सहमत है। बाबा साहिब अंबेडकर ने कांग्रेस की इस फितरत का बहुत पहले अनुमान लगा लिया था। यही कारण था कि उन्होंने बहुत पहले ही कह दिया था कि मुझे शक है कि कांग्रेस देश की आजादी के लिए नहीं लड़ रही बल्कि वह सत्ता के लिए लड़ रही है।
यही कारण है कि जब राष्ट्र और सत्ता में से एक चुनने का वक्त आया तो कांग्रेस ने राष्ट्र से द्रोह किया और सत्ता को चुना। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने भारत विभाजन का अंत तक विरोध किया। अंबेडकर ने भी शायद अंदाजा लगा लिया था कि कुछ साल बाद कम से कम भारत के देसी मुसलमान समझ जाएंगे कि एटीएम ने ब्रिटेन से मिल कर उन्हें भारत विभाजन के अपने जाल में फंसा लिया था और उसके बाद वे भारत के साथ पुन: विलय की बात करेंगे। यही कारण है कि उन्होंने लिखा था कि हमें कम से कम दस साल तक ऐसी व्यवस्था कर लेनी चाहिए जिससे यदि पाकिस्तान चाहे तो पुन: वापस आ सके। लेकिन कांग्रेस को यह स्वीकार नहीं था। अलबत्ता इतना जरूर रहा कि कांग्रेस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और बाबा साहिब अंबेडकर दोनों को ही अंग्रेजों के एजेंट कहने लगी। अंबेडकर के साथ कांग्रेस और खासकर पंडित जवाहर लाल नेहरू ने जो दुव्र्यवहार किया उसे राजनीति विज्ञान और इतिहास के सभी विद्यार्थी जानते हैं। अंबेडकर को लोकसभा चुनाव में पराजित करने के लिए जो हथकंडे अपनाए, उससे अंबेडकर को जितनी पीड़ा हुई थी, इसका जिक्र अनेक जगह मिलता है। नेहरू के दुव्र्यवहार के कारण तो अंबेडकर को विधि मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा। यहां तक कि नेहरू ने अंबेडकर को अपने इस्तीफे पर लोक सभा में वक्तव्य तक देने की अनुमति नहीं दी। तब बाबा साहिब को इस्तीफे के कारणों पर बाहर सार्वजनिक रूप से अपना पत्र छपवाना पड़ा। उस पत्र से ही साफ हो जाता है कि अंबेडकर की जिस नाव पर सवार होकर राहुल गांधी एक बार फिर सत्ता के जहाज तक पहुंचना चाहते हैं, किसी वक्त उस नाव को तोडऩे में जवाहर लाल नेहरू कितने मशगूल रहते थे। अब राष्ट्र द्रोह की अगली कड़ी। 1991 में भारत की लोक सभा के लिए चुनाव होने वाले थे। लंका के प्रभाकरण की पार्टी को लगता था कि राजीव गांधी की पार्टी जीत सकती है।
प्रभाकरण की अपनी रणनीति के लिए भारत के प्रधानमंत्री रह चुके राजीव गांधी का जीत जाना अनुकूल नहीं था। इसलिए उसने राजीव गांधी को मारने के लिए अपने कुछ चुने हुए चेलों को नियुक्त कर दिया। उन चेलों ने सचमुच तमिलनाडु में राजीव गांधी की हत्या कर दी। उनमें से कुछ पकड़े भी गए। जो पकड़े गए उनका केस कचहरी में चला और उनको सजा भी हुई। लेकिन असली कथा उसके बाद शुरू हुई। राजीव गांधी के परिवार के कुछ सदस्य जेल में चुपचाप उन हत्यारों से मिलते रहे। बाद में इसका पर्दाफाश हो गया। उसके बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से उन हत्यारों को जेल से छुड़ाने के प्रयास करने शुरू कर दिए। राजीव गांधी अपने परिवार के मुखिया थे, यह उनका पारिवारिक जीवन था। लेकिन वे भारत के प्रधानमंत्री भी रह चुके थे। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री के हत्यारों को छुड़वाने के लिए कुछ लोग प्रयास कर रहे थे, यह राष्ट्र द्रोह की श्रेणी में आता है या नहीं?
यदि वे लोग राजीव गांधी के परिवार के ही सदस्य हों तो राष्ट्र द्रोह के गहरे कारण भी ढूंढने की जरूरत बढ़ती है या नहीं? मुझे इल्म नहीं है कि राहुल गांधी की ब्रिटिश नागरिकता का मामला कचहरी में किस स्टेज पर है। अभी हाल ही में तमिलनाडु की विधान सभा के लिए चुनाव हुए थे। राहुल गांधी की पार्टी दशकों से डीएमके की सहयोगी पार्टी है। राहुल गांधी की पार्टी ने तमिलनाडु की विधान सभा में डीएमके के सहयोग से पांच सीटें जीत लीं। मैदान में एक दूसरी पार्टी भी थी। वह तमिलनाडु के एक अभिनेता जोसेफ विजय की है। उसकी पार्टी ने 107 सीटें जीतीं। लेकिन सरकार बनाने के लिए उसे कुछ और विधायकों की जरूरत थी। बिना एक भी क्षण गंवाए राहुल गांधी ने सार्वजनिक घोषणा कर दी कि उसके पांचों विधायक जोसेफ विजय के साथ हैं। डीएमके इतना नाराज हुई कि उसने लोकसभा के अध्यक्ष को लिखा कि आगे से उसके सांसद कांग्रेस के सदस्यों के नजदीक भी नहीं बैठेंगे। उनके सदस्यों के बैठने की अलग व्यवस्था की जाए। खैर जोसेफ विजय ने राहुल गांधी के पांच सदस्यों के अलावा कुछ कम्युनिस्ट सदस्यों को लेकर तमिलनाडु में सरकार बना ली। वह तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बन गए। इसके बाद के घटनाक्रम बताते हैं कि राहुल गांधी तुुष्टिकरण की राजनीति कर रहे हैं, पर ऐसा करना घातक होगा।
कुलदीप चंद अग्निहोत्री
वरिष्ठ स्तंभकार
ईमेल:kuldeepagnihotri@gmail.com
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