पुस्तक समीक्षा : जणेत लेकर काव्य यात्रा पर निकले सुरेंद्र मिन्हास

By: Jun 28th, 2026 12:05 am

पहाड़ी कविता संग्रह ‘जणेत’ सुरेंद्र मिन्हास कहलूरी की 15वीं पुस्तक है। जणेत का माहौल बनाते हुए कवि के भाव देखिए, ‘हारी-फारी पुज्जी जणेत कुड़मा रे गांवा/होई गौरी थी सन्ज धारा पर पड्छांवा/स्कूले रे मैदाने च मेच कुरसियां थी रखूरी/तड़ोई कुसियां जणेत थी बड़ी थकुरी/ल्याये कुडिय़ा वाले गर्म चाह कने मठयाई/पुक्ख थी लगुरी सारेयां जिक्की-जिक्की खाई/चले सारे पंडिता सौगी करने जो मिलणी/बापू, मामा, भाई, ताऊ री हुई छैल मिलणी।’ वोटर का कत्र्तव्य बताते हुए कवि ‘बोट जरूर पाओ लोको’ नामक कविता में कहता है, ‘वोट पाणे जरूर जायों मेरे पैण-पाई/घरे नी रवे कोई बी दादी-ताई/मना री वाजा ते सारे वोट पायो/जेड़ा खरा लगदा तिस्सा ई जतायो।’ इस संग्रह में 108 कविताएं संकलित हैं। काव्य संग्रह लेखन में कवि की गहराई एवं चिंतन के साथ-साथ मातृभाषा एवं स्थानीय बोली के प्रति प्रेम व सम्मान को भी दर्शाता है। कवि ने समसामयिक विषयों और रोजमर्रा के जीवन में जो अनुभव किया, उसी विषय पर कविताएं लिखी गई हैं, जैसे कि जणेत, फोरलेना रा फेरा, करसाणा री जिन्द, मुआ स्याला, बोट मींजो पायों आदि।

इस संग्रह में कवि की परिपक्वता, प्रतीक, बिम्ब, काव्य सौंदर्य, सरल भाषा, चित्रात्मकता व मौलिकता की संपन्नता परिलक्षित होती है। बेटियों के प्रति संवेदनशीलता को प्रकट करते हुए इनकी कविता ‘मुनियां नी मारा लोको’ में बेटी बचाओ व बेटी पढ़ाओ का संदेश दिया गया है। इसी तरह ‘बंदले री कवाली’ में जिला बिलासपुर की बंदला धार में आवागमन की कठिनाइयों को दर्शाया गया है। कवि की सभी कविताएं पाठकों के मन में जिज्ञासा व उत्सुकता पैदा करने का सामथ्र्य रखती हैं। कवि ने अपनी संवेदनाओं को विभिन्न विषयों के माध्यम से बड़ी खूबसूरती के साथ पाठकों तक पहुंचाया है। वहीं दूसरी ओर लोकभाषा के अनेकों शब्दों को अपनी रचनाओं में संजो कर अनुकरणीय एवं ऐतिहासिक कार्य किया है। स्वयं प्रकाशित इस काव्य संग्रह की कीमत 401 रुपए है। यह संग्रह पाठकों को जरूर पसंद आएगा।

-फीचर डेस्क


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