गैर-संग्रहणीय प्लास्टिक होलोग्राम टेंडर मामले में सरकार-विभागों को नोटिस
विधि संवाददाता — शिमला
हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने प्रधानमंत्री के प्लास्टिक फ्री इंडिया अभियान, प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2016 एवं पर्यावरणीय कानूनों के कथित उल्लंघन से जुड़े 75 करोड़ गैर-संग्रहणीय प्लास्टिक होलोग्राम टेंडर मामले में केंद्र एवं राज्य सरकार सहित संबंधित विभागों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। पर्यावरण संरक्षण एवं भारत के प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन से जुड़े एक महत्त्वपूर्ण मामले में हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने देहरादून निवासी अधिवक्ता अभिनव थापर द्वारा दायर जनहित याचिका पर संज्ञान लेते हुए केंद्र एवं राज्य सरकार सहित संबंधित विभागों को नोटिस जारी किया है।
याचिका में हिमाचल प्रदेश आबकारी विभाग द्वारा लगभग 75 करोड़ गैर-संग्रहणीय एवं गैर-पुनर्चक्रणीय 36 माइक्रोन प्लास्टिक एक्साइज होलोग्राम लेबल की खरीद प्रक्रिया को चुनौती दी गई है। याचिका में कहा गया है कि यह टेंडर प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय प्लास्टिक फ्री इंडिया अभियान तथा सर्वोच्च न्यायालय एवं राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा प्रतिपादित पर्यावरणीय सिद्धांतों का उल्लंघन कर दिया गया है।
गगरेट में अवैध कटान पर कोर्ट का संज्ञान
शिमला। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने ऊना जिले के गगरेट में बड़ी संख्या में अवैध पेड़ कटान पर स्वत: संज्ञान लिया है। कोर्ट ने जिला कानूनी सहायता सर्विस प्राधिकरण सचिव ऊना को आदेश दिया है कि वह संबंधित चैक पोस्ट का समय-समय पर दौरा करें और स्वतंत्र रूप से स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करें। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बी सी नेगी की खंडपीठ ने सचिव को आदेश दिए कि वह पत्र लिखने वाले शिकायतकर्ता से संपर्क करने की भी कोशिश करें। मामले के अनुसार 8 मार्च, 2026 को ऊना जिले की गगरेट तहसील से बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई और तस्करी के बारे में एक सूचना मिली थी। इसके साथ ही, प्रदेश के जंगलों से काटे गए पेड़ों से लदे छोटे और बड़े ट्रकों की जीपीएस-टैग वाली तस्वीरें भी थीं।
सरकारी आवास आबंटन व्यवस्था पर कोर्ट ने जताई चिंता
शिमला। प्रदेश उच्च न्यायालय ने सरकारी आवास के आबंटन की मौजूदा व्यवस्था में पारदर्शिता की कमी के चलते चिंता जताई है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल ने हिमाचल प्रदेश सरकार के उप सचिव सामान्य प्रशासन विभाग से प्राप्त निर्देशों का अवलोकन करने के पश्चात पाया कि इन निर्देशों में ऐसी कोई बात नहीं है, जो कोर्ट को पहले से पता न हो। कोर्ट को यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि सामान्य प्रशासन विभाग की इस मोनोपॉली (एकाधिकार) व सरकारी आवास के अलॉटमेंट के अपारदर्शी सिस्टम की वजह से ही ऐसी स्थिति बन गई है कि किसी अधिकारी को सरकारी घर मिलना किसी लॉटरी से कम नहीं माना जाता। अगर सरकारी आवास के अलॉटमेंट में पारदर्शिता लानी है और अपारदर्शिता को खत्म करना है, तो शायद हर साल सरकारी आवास के लिए आवेदन करने का जो दिखावटी सिस्टम अभी चल रहा है, उसे खत्म करना होगा। इसके बजाय, सरकारी आवास चाहने वाले कर्मचारियों की हमेशा के लिए एक ही लिस्ट होनी चाहिए।
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