आध्यात्मिक शक्तियां

By: Jun 27th, 2026 12:15 am

स्वामी विवेकानंद

गतांक से आगे…

कई सदियों से तुम नाना प्रकार के सुधार, आदर्श आदि की बातें कर रहे हो और जब काम करने का समय आता है तब तुम्हारा पता ही नहीं मिलता। अत: तुम्हारे आचरणों से सारा संसार क्रमश: हताश हो रहा है और समाज सुधार का नाम तक समस्त संसार के उपहास की वस्तु हो गई है। इसका कारण क्या है?

क्या तुम जानते नहीं हो? तुम अच्छी तरह जानते हो। ज्ञान की कमी तो तुम में है ही नहीं। सब अनर्थों का मूल कारण यही है कि तुम दुर्बल हो,अत्यंत दुर्बल हो, तुम्हारा शरीर दुर्बल है, मन दुर्बल है और अपने आप पर आत्मश्रद्धा भी बिलकुल नहीं है। मेरी इच्छा है तुम लोगों के भीतर इसी श्रद्धा का आविर्भाव हो, तुममें से हर एक आदमी खड़ा होकर इशारे से संसार को हिला देने वाला प्रतिभा संपन्न महापुरुष हो, हर प्रकार से अनंत ईश्वरतुल्य हो। मैं तुम लोगों को ऐसा ही देखना चाहता हूं। भारतीय पुनर्जागरण की सुदीर्घ परंपरा के अपूर्व संवाहक स्वामी विवेकानंद की ये पंक्तियां उनके सामाजिक परिवर्तन विषयक चिंतन और उसकी गहनता का सुंदर निदर्शन कराती हैं। जब कभी भारतीय समाज जीवन को करवट लेने की जरूरत हुई, तब कोई न कोई परिवर्तनकामी व्यक्तित्व उठ खड़ा हुआ। ऐसे महनीय व्यक्तित्वों की असमाप्त श्रृंखला के मध्य स्वामी विवेकानंद अपने ढंग के अनन्य व्यक्तित्व ठहरते हैं।

उन्होंने सामाजिक परिवर्तन को महज सतही तौर पर नहीं लिया था और न उसे इकहरा माना। वे किसी भी परिवर्तन को समग्रता में लेने के आग्रही थे। इसीलिए जब उनकी निगाहें अपने पूर्ववर्ती या समकालीन सुधारकों के कार्यों पर गईं, तब वे उन सुधारों की एकांगिता या अधूरेपन को लक्षित करने से नहीं चूके। उन्होंने अपने ढंग से सामाजिक पुनर्रचना का आह्वान किया और उसे साकार करने के लिए आजीवन सचेष्ट रहे। वे इस बात को भलीभांति जानते थे कि मानवीय सभ्यता से जुड़े किसी भी अंग की निर्मित अचानक नहीं हुई है, उसके पीछे लंबी प्रक्रिया रही है। जब कभी उसे बदलने की चेष्टा हो भी तो पहले गहराई से विचार हो, फिर हमारी दृष्टि मूल पर भी रहे। इसीलिए वे कहते हैं,मैं मनुष्य जाति से यह मान लेने का अनुरोध करता हूं कि कुछ नष्ट न करो।

विनाशक सुधारक लोग संसार का कुछ भी उपकार नहीं कर सकते। किसी वस्तु को भी तोडक़र धूल में मत मिलाओ, वरन उसका गठन करो। यदि हो सके तो सहायता करो, नहीं तो चुपचाप हाथ उठाकर खड़े हो जाओ और देखो, मामला कहां तक जाता है। यदि सहायता न कर सको तो अनिष्ट मत करो। स्पष्ट है स्वामी विवेकानंद विनाशक नहीं, रचनात्मक समाज सुधार के पक्षधर हैं, जो उन्हें अपने दौर के समाज सुधारकों से विलक्षण बनाता है। स्वामी विवेकानंद को भारत की मूल शक्ति आध्यात्मिकता पर गहरा विश्वास था। उनकी यह आध्यात्मिकता कोई संकीर्ण अर्थ लिए आध्यात्मिकता नहीं है, वरन उसमें धार्मिक अंध नियमों से मुक्ति की अभिलाषा है, संपूर्ण और सर्वव्यापी आत्मा का बोध है। वह नानात्व में अंतर्निहित एकता का अधिष्ठान है। इसीलिए जब वे सामाजिक परिवर्तन का आदर्श प्रस्तुत करते हैं, तब उनकी दृष्टि आध्यात्मिक बोध पर भी टिकी रहती है। वे कहते हैं, समस्त स्वस्थ सामाजिक परिवर्तन अपने भीतर काम करने वाली आध्यात्मिक शक्तियों के व्यक्त रूप होते हैं और यदि ये बलशाली और सुव्यवस्थित हों,तो समाज अपने आपको इस तरह से ढाल लेता है।


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