सियासी नेतृत्व का पिछड़ापन

By: Jun 29th, 2026 12:02 am

कांगड़ा के राजनीतिक नेतृत्व के पिछड़ेपन के लिए यहां के नेताओं का भोलापन, पहचान का संकट, आपसी मेलभाव तथा स्वीकार्यता की कमी मानी जा सकती है। कांग्रेस के नजरिए से कांगड़ा को सत्ता प्राप्ति का हक मिलता रहा। पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने तो बाकायदा कांगड़ा की शून्यता के दरवाजे खोलकर झांकने की कोशिश में सत्ता के कई संस्थान स्थापित किए। हालांकि सरकारों की सियासी बाध्यताओं ने कांगड़ा के उच्चारण तो बढ़ाए, लेकिन यहां कोई भी नेता महफूज न हुआ। अधिकतर सत्ता के दरबान बने या कांगड़ा की सियासी प्रतिभा के खिलाफ षड्यंत्रकारी बन गए। वीरभद्र हों, धूमल हों या जयराम ठाकुर, सभी ने अपना पंथ बनाने की कोशिश की, लिहाजा दरबारी होने का रुतबा मौजूदा सरकार के तहत स्थानीय निकाय चुनावों तक देखा गया। पालमपुर नगर निगम पर कांग्रेस के कब्जे ने भाजपा के नेतृत्व में कांगड़ा का शौर्य पस्त किया, तो धर्मशाला में भाजपा का अग्रणी चेहरा, कांग्रेस से भाजपा में आए सुधीर शर्मा की संगत में आगे बढ़ता देखा गया। यहां कांग्रेस की परीक्षा में कांगड़ा को सफल करने का कोई नायाब हीरा नहीं मिला, तो पड़ताल अगले चुनाव को सालती रहेगी। बेशक प्रतीकों में कांगड़ा का नाम हुआ। सबसे अधिक व सत्ता के नजदीक पहुंचाने में वीरभद्र की डॉक्ट्रिन श्रेष्ठ रही, लेकिन अपने-अपने सियासी अनुपात साधने की कोशिश में हर मुख्यमंत्री ने डमरू जरूर बजाए। वीरभद्र सिंह ने मुख्यमंत्री का शीतकालीन प्रवास, मंत्रिमंडलीय बैठकें, विधानसभा का शीतकालीन सत्र और धर्मशाला को शीतकालीन राजधानी का दर्जा दिया, तो प्रेम कुमार धूमल ने सचिवालय से खेल राजधानी के रुतबे से मुख्यालय को नवाजा।

जयराम ने राज्य के चिंतन मनन में धर्मशाला में इन्वेस्टर मीट, जी-ट्वंटी सम्मेलन के अलावा कई राष्ट्रीय पर्व और पहचान के इवेंट यहां आयोजित किए। वीरभद्र सिंह की रिवायतों से प्रभावित सुखविंद्र सुक्खू ने धर्मशाला तक कई विभागों, निगमों और बोर्डों के मुख्यालय पहुंचाए, तो संपूर्ण कांगड़ा घाटी को पर्यटन राजधानी घोषित करके, गगल एयरपोर्ट विस्तार को यकीनी बनाया। प्रस्तावित एयरोसिटी के जरिए एक अंतरराष्ट्रीय मुकाम की तलाशी शुरू हुई है। वनखंडी में अंतरराष्ट्रीय स्तर का चिडिय़ाघर और विभिन्न पर्यटन परियोजनाओं की दिशा में कदम उठाकर प्रतीक सुदृढ़ किए हैं। लिफाफों में चिट्ठियां बंटती रही, लेकिन किसी के नाम खत न हुए। कांगड़ा को लेकर नित नए प्रयोग जरूर हुए, लेकिन यहां के नेताओं में प्रयोगधर्मिता के बजाय एक-दूसरे की टांग खींचने की प्रतियोगिताएं चलती रहीं। राष्ट्रीय स्तर पर नेताओं ने अपने कद और पद के लिए प्रतीक सुदृढ़ किए, जातियों और समूहों के नेता बने या मुद्दों की फिराक में स्थायित्व हासिल किया। देश में भाजपा की राजनीति ने जिस तरह धर्मस्थलों को कब्जे में लिया, इससे कुछ नेता ऊंचे उठे। ऐसे में कांगड़ा के मंदिर स्थलों मसलन ज्वालाजी, कांगड़ा, चामुंडा और बैजनाथ की परिक्रमा में भाजपा नेता कम से कम अपने लिए बहुत कुछ हासिल कर सकते थे, लेकिन ऐसा करने में कांगड़ा के नेता असमर्थ रहे। चिंतपूर्णी, दियोटसिद्ध, नयनादेवी व बाला सुंदरी मंदिरों पर केंद्रित आस्था ने कुछ नेताओं का वर्चस्व आजमाया है। दियोटसिद्ध में आय-व्यय का हिसाब राजनीतिक चाकरी करता है, लेकिन यही मानदंड कांगड़ा में लागू नहीं हो पाए। कांगड़ा के नगर निकायों में नेतागिरी का आलम यह कि कांगड़ा की छत पवन काजल को नहीं मिली, तो पालमपुर की सियासत ने शांता कुमार के बयान भी धराशायी किए। ऐसे में कांगड़ा के नेताओं के बीच भले ही मंडलियां सजती रहें, लेकिन कायदे की वह तस्वीर ही नहीं बनी, जहां नेताओं के पीछे जनता खड़ी हो।


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