छिलकों की छाबड़ी : दूल्हे की तलवार
कोई आज तक नहीं बता पाया कि दूल्हे की सजावट में तलवार का क्या काम, फिर भी साहसी दूल्हा किसी फतह के मुगालते में शादी में तलवार को अपना प्रतीक मान लेता है। शादी सफल होने की गारंटी, पति के कर्मों, समर्पण, निरंतर हार और प्रायश्चित में है। खैर शादी के ठीक पहले ही दूल्हे की तलवार गुम हो गई थी। जिस तलवार के सहारे दूल्हे के पिता, चाचा, दादा और पुरखों ने शादियां रचाई थीं, आखिर वो खो कैसे सकती, लिहाजा घर के सदस्य परेशान हो गए। परिवार की शान के लिए एक अदद तलवार चाहिए थी। किसी तरह किराये पर तलवार का बंदोबस्त हुआ, लेकिन उसके ऊपर पहले से ही कई दूल्हों के नाम खुदे हुए थे। गिनती में वह सौवां दूल्हा था जो इसी तलवार के सहारे शादी रचाने जा रहा था। एक दिल किया कि वह इससे पूर्व बने दूल्हों से पूछे कि तलवार लटकाने से क्या मिला, ‘क्यों न चाकू या छुरी लटका लूं।’ दिक्कत यह भी थी कि तलवार लटका कर उसे शादी का रात-दिन एक करना था। बाजार से सोना खरीदना फिर भी आसान है, लेकिन दूल्हा होने की योग्यता कठिन है। अब शक्ल से नहीं, टिकाऊपन से दूल्हे तय होते हैं। वह तय कर चुका था कि एक बार शादी हो जाए, वह जिंदगी भर टिका रहेगा।
खैर दूल्हे को तलवार की चिंता थी कि कहीं फिर से खो न जाए। वह राजनीतिक गारंटियों की तरह तलवार की गारंटी पर शक कर रहा था। तलवार टांगे-टांगे उसने शादी की तमाम शर्तें मान लीं, जो उसके पुरखों ने भी कभी मानी थीं। अब वह उत्तीर्ण दू्ल्हा था, लिहाजा तलवार हटा दी गई। उसकी पगड़ी उतर चुकी थी और साधारण कपड़ों में पति जैसा दिखाई दे रहा था। आश्चर्य यह कि आदर्श पति की कोई भी निशानी नहीं होती। वह घर और दफ्तर के बीच, मां-बाप और रिश्तों के बीच बस एक कारिंदा है। वह दफ्तर में घर के बुरे सपने देखता, लेकिन घर में उसे सपने ही नहीं आते। वह हर बुरे संयोग, कार्य, कठिनाइयों और हानियों का जिम्मेदार है, इसलिए उसने तय किया कि घर लौटने के लिए हाथ में तलवार रखेगा। वह अपनी ख्वाहिश को पूरा करने के लिए लुहार के पास पहुंच गया। लुहार ने बताया कि दूल्हा तलवार उठाते ही अभिशप्त हो जाता है, इसलिए उसे पति के रूप में शक्ति नहीं मिलती। ‘आप चाहें तो दरांती, छुरी या चाकू ले जाएं। इन्हें चलाना सीखें और सीख गए तो सफल पति बन जाओगे।’ तभी वहां लुहार की पत्नी कहीं से आ टपकी। लुहार पर आई आफत से विचलित दूल्हा देख रहा था कि पत्नियां हर जगह एक जैसी ही हैं। बीवी ने आर्डर दिया कि घर आते वक्त यह राख ले आना। लुहार बता रहा था, ‘लोहा जब पुलिंग से स्त्रीलिंग में तलवार, छुरी या दरांती बन जाता है, तो राख भी पछताती है। जब घर के बर्तन अधिक गंदे होते हैं, राख काम आती है। लोहा पिघल कर अपना पौरुष खो देता है, इसलिए मैंने शादी के वक्त तलवार की जगह बेलन लटकाया था। लकड़ी स्त्रीलिंग होकर भी बेलन को ताउम्र पुलिंग बनाए रखती है।’
निर्मल असो
स्वतंत्र लेखक
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