यह शिमला की आफत है
शिमला तेरे बाजुओं में कितना सुकून बचा, हम चल के बताएं या तेरे जख्म देखें। वकील सडक़ पर हों, तो अदालत न्याय कैसे देगी और कानून व्यवस्था सडक़ पर हो, तो शिकायत किससे करें। सोमवार के दिन हाई कोर्ट परिसर सडक़ पर बिफर गया, तो आवाजाही का तकाजा कांटों से भर गया। प्रदेश को अंदाजा ही नहीं कि हाई कोर्ट में कितने वकील हर दिन अपनी हाजिरी का सुकून सडक़ पर हारते हैं या मारामारी के आलम में पार्किंग में अपने वाहन की वजह ढूंढते हंै। पार्किंग की गुंजाइश में यह बावेला सरकार बनाम वकील नहीं होना चाहिए था, लेकिन शिल्ली चौक-छोटा शिमला की प्रतिबंधित सडक़ पर आकर सारा माहौल कुर्बान हो गया। दोनों पक्ष अपनी कत्र्तव्यपरायणता के परिचय में ड्यूटी का अमृत्व पीना चाहते हैं, लेकिन असंतुलित राजधानी का कवच टूट गया। पुलिस को प्रतिबंधित जमीन पर पार्क हुए वाहन हटाने थे, लेकिन इस बार वकील समुदाय ने विकल्प पूछ लिया या यह बता दिया कि यह आम नागरिक का भी हक है कि शिमला की बाहों में अपना अधिकार-अपनी सुविधा पूछे। जाहिर है एक ही शहर में दो मानदंड नहीं हो सकते। एक से परमिट पूछा जाए और दूसरा सरे राह गुजर जाए। यह शिमला की आफत है कि यहां वीआईपी होना एक शौक है या विशेषाधिकार प्राप्त लोगों की जमात हर क्षण आम नागरिक को छोटा दिखाती है। वकीलों की जरूरत और जिद्द में फर्क ढूंढा जा सकता है। जरूरत यह कि हाई कोर्ट परिसर में पैरवी के सबूत जब कारगर होंगे, तो वकील मशगूल होंगे। अब शिमला का आचरण बदला और बदल गई है दिनचर्या की गति। अब अगर वीआईपी फुर्सत में हों, तो वाहनों की आजमाइश में माल रोड भी सिसक उठेगा। आखिरकार शिमला के वकील हैं तो शहर के ही पैरोकार।
ये सफल हैं तो गाडिय़ां भर-भर के अदालतों के बाहर तक आएंगी। सरकार को केवल यह करना है कि वकीलों के वाहनों को चैन से ठहरने की जगह दे दी जाए। इसके लिए प्रतिबंधित मार्गों के विकल्प चाहिएं और यह दिक्कत जिला स्तर के अदालती परिसरों में भी है। विडंबना यह भी है कि अदालतों को खुदा मानने वाले फरियादियों के पक्ष में कोई नहीं सोचता। हर अदालत परिसर में वकील और जज साहेबान महानुभाव हैं, लेकिन जो कानून की शरण में आते हैं, उनकी सुविधाओं की वकालत कभी नहीं होती। अगर हाई कोर्ट की अपीलों, सुनवाई चक्रों और कानूनी राहत की उम्मीदों से आए फरियादियों की गाडिय़ों को भी पनाह देनी हो, तो सारा माहौल ही अव्यवस्थित हो जाएगा। अदालत परिसरों को भीड़ या शहरों के भीतर रखने के बजाय बाहर ले जाना होगा। पिछले चालीस सालों से हाई कोर्ट की स्थायी बेंच की मांग धर्मशाला के लिए हो रही है। अगर यह मांग पूरी हो जाए तो बहुत सारे मामले और पैरवी करते वकील भी छंट जाएंगे। इतना ही नहीं शिमला को अपने पुराने नूर में बरकरार रखने के लिए समीपवर्ती वाकनाघाट में एक प्रशासनिक-कर्मचारी शहर के रूप में विकसित करना चाहिए ताकि बड़े कार्यालय, अदालतें तथा सरकारी आवास वहां स्थानांतरित किए जा सकें। यहां मसला वकील बनाम सरकार नहीं है, बल्कि शहरी विकास की जरूरतों व सुविधाओं का है। हम पहले भी कहते रहे हैं कि शिमला और आसपास के क्षेत्रों को ‘स्टेट कैपिटल रीजन’ के तहत विकसित करने की जरूरत है। समूचे हिमाचल को भी ‘कलस्टर सिटी प्लानिंग’ के तहत विकसित करें ताकि दो या तीन शहर मिलकर सुविधाओं का विकास उपलब्ध जमीन को देख कर करें। हर शहर के लिए ट्रैफिक प्लान बनाते हुए यह सुनिश्चित किया जाए कि बढ़ते वाहनों का बोझ सडक़ों को ही संकरा न कर दे।
Keep watching our YouTube Channel ‘Divya Himachal TV’. Also, Download our Android App or iOS App
