सडक़ पर पैदल चलना : अब मौलिक अधिकार
सडक़ पर चलना कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि हर व्यक्ति का बुनियादी अधिकार है। यदि भारत को वास्तव में मानव-केंद्रित विकास की दिशा में आगे बढऩा है, तो पैदल यात्रियों की सुरक्षा तय करनी होगी…
भारत में विकास की पहचान अक्सर चौड़ी सडक़ों, फ्लाईओवरों और एक्सप्रेसवे से की जाती है। लेकिन विकास का वास्तविक अर्थ केवल तेज गति से दौड़ते वाहनों की सुविधा नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की सुरक्षा और गरिमा भी है। दुर्भाग्य से हमारे देश में सडक़ पर पैदल चलने वाले व्यक्ति को आज भी सबसे कमजोर और उपेक्षित सडक़ उपयोगकर्ता माना जाता है। यही कारण है कि सडक़ दुर्घटनाओं में सबसे अधिक नुकसान अक्सर उन्हीं लोगों को उठाना पड़ता है जिनके पास कोई वाहन नहीं होता। हाल ही में एक अत्यंत दुखद मामले की सुनवाई के दौरान देश के सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की। एक पिता अपने पांच वर्षीय पुत्र को स्कूल छोडऩे जा रहा था, तभी एक सडक़ दुर्घटना में मासूम बच्चे की जान चली गई। मुआवजे की सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि पैदल चलने का अधिकार संविधान के तहत मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए तथा सडक़ों पर पैदल यात्रियों के अधिकारों को मोटर वाहनों से ऊपर रखा जाना चाहिए। यह टिप्पणी केवल एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की सडक़ सुरक्षा व्यवस्था और विकास की सोच पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (1)-डी में देश के पूरे क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से घूमने का अधिकार है और अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। सर्वोच्च न्यायालय भी समय-समय पर इन अनुच्छेदों की व्यापक व्याख्या करते हुए गरिमामय जीवन, स्वच्छ पर्यावरण और सुरक्षित जीवन को भी इसका हिस्सा मान चुका है।
ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या सडक़ पर सुरक्षित रूप से चलना भी नागरिक के जीवन के अधिकार का हिस्सा नहीं होना चाहिए? यदि कोई व्यक्ति घर से निकलकर सडक़ पार करने में ही अपनी जान गंवा दे, तो उसके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का दावा कितना सार्थक रह जाता है? भारत में सडक़ दुर्घटनाएं एक गंभीर सार्वजनिक संकट बन चुकी हैं। सडक़ परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि हर वर्ष लाखों सडक़ दुर्घटनाएं होती हैं और डेढ़ लाख से अधिक लोगों की मृत्यु हो जाती है। औसतन प्रति वर्ष 30500 से अधिक पैदल यात्रियों की जान चली जाती है। कुल पैदल यात्रियों में से लगभग 31 प्रतिशत राष्ट्रीय मार्गों पर काल का ग्रास बन जाते हैं। ये आंकड़े पूरे विश्व में सबसे अधिक हैं। इनमें बड़ी संख्या पैदल यात्रियों, साइकिल चालकों और अन्य कमजोर सडक़ उपयोगकर्ताओं की होती है। तेज रफ्तार, लापरवाही से वाहन चलाना, शराब पीकर ड्राइविंग करना और सडक़ सुरक्षा नियमों की अनदेखी इसके प्रमुख कारण हैं। विडंबना यह है कि मोटर वाहन अधिनियम 1988 में वाहनों, चालकों और यातायात नियमों से संबंधित विस्तृत प्रावधान हैं। वाहन पंजीकरण, ड्राइविंग लाइसेंस, बीमा, प्रदूषण नियंत्रण और दंडात्मक प्रावधानों को विस्तार से परिभाषित किया गया है। लेकिन पैदल यात्रियों के अधिकारों, उनकी सुरक्षा और उनके लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे को लेकर कोई समग्र कानूनी ढांचा दिखाई नहीं देता। कानून यह तो बताता है कि वाहन कैसे चलाया जाए, लेकिन यह पर्याप्त रूप से सुनिश्चित नहीं करता कि सडक़ पर चलने वाला व्यक्ति सुरक्षित कैसे रहेगा। देश के अधिकांश शहरों में फुटपाथ या तो हैं ही नहीं, और जहां हैं, वहां अतिक्रमण का कब्जा है। कई स्थानों पर जेब्रा क्रॉसिंग केवल सफेद धारियों तक सीमित हैं, जिनका वाहन चालक सम्मान नहीं करते। स्कूलों, अस्पतालों और बाजारों के आसपास भी पैदल यात्रियों की सुरक्षा के पर्याप्त प्रबंध नहीं मिलते। परिणामस्वरूप सडक़ें नागरिकों के बजाय वाहनों के लिए अधिक अनुकूल दिखाई देती हैं। अब समय आ गया है कि सरकार इस विषय पर गंभीरता से विचार करे। जिस प्रकार बच्चों, महिलाओं और वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों के लिए विशेष कानून बनाए गए हैं, उसी प्रकार पैदल यात्रियों की सुरक्षा के लिए भी एक व्यापक राष्ट्रीय नीति या स्वतंत्र कानून बनाया जाना चाहिए। सडक़ों के निर्माण और यातायात प्रबंधन में पैदल यात्री प्रथम की अवधारणा को अपनाया जाना चाहिए। सरकार को प्रत्येक सडक़ परियोजना में सुरक्षित फुटपाथ, जेब्रा क्रॉसिंग, अंडरपास और पैदल पुल अनिवार्य करने चाहिए।
स्कूलों और अस्पतालों के आसपास विशेष सुरक्षा क्षेत्र विकसित किए जाने चाहिए। सडक़ निर्माण से पहले पैदल यात्री सुरक्षा ऑडिट अनिवार्य होना चाहिए। साथ ही तेज रफ्तार या लापरवाही से वाहन चलाकर पैदल यात्रियों को नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ कठोर दंड सुनिश्चित किया जाना चाहिए। विकसित देशों ने सडक़ को केवल वाहनों के लिए नहीं, बल्कि नागरिकों के लिए साझा सार्वजनिक स्थान माना है। इसलिए वहां पैदल चलना केवल एक सुविधा नहीं, बल्कि एक संरक्षित नागरिक अधिकार के रूप में देखा जाता है। अमरीका, ब्रिटेन और जापान जैसे देशों में पैदल चलने वालों को सडक़ की उल्टी दिशा में चलने की हिदायत दी जाती है ताकि सामने से आने वाली गाड़ी को देखा जा सके। यद्यपि पैदल यात्रियों के लिए कोई अलग अंतरराष्ट्रीय संधि नहीं है, फिर भी संयुक्त राष्ट्र और विश्व स्वास्थ्य संगठन की विभिन्न घोषणाएं सुरक्षित और सुलभ पैदल परिवहन को एक महत्वपूर्ण मानव और शहरी अधिकार के रूप में स्वीकार करती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनाइटेड नेशन द्वारा 2021-2030 को सडक़ सुरक्षा दशक घोषित किया गया है। इसका उद्देश्य सडक़ दुर्घटनाओं से होने वाली मौतों और चोटों को कम करना है जिसमें पैदल यात्रियों की सुरक्षा एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है। क्योंकि किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसकी सडक़ों पर दौड़ती महंगी गाडिय़ों से नहीं, बल्कि उन सडक़ों पर सुरक्षित चल रहे सामान्य नागरिकों से होती है। सडक़ पर चलना कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि हर व्यक्ति का बुनियादी अधिकार है। यदि भारत को वास्तव में मानव-केंद्रित विकास की दिशा में आगे बढऩा है, तो पैदल यात्रियों की सुरक्षा और सम्मान को नीति निर्माण के केंद्र में रखना होगा। न्यायालय की टिप्पणी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत है। अब आवश्यकता है कि सरकार इसे कानूनी और संवैधानिक रूप देकर सडक़ों को वाहनों के साथ-साथ इनसानों के लिए भी सुरक्षित बनाए।
डा. निधि शर्मा
शिक्षाविद
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