किशाऊ बांध परियोजना के खिलाफ सीमांत क्षेत्र में तेज हुआ विरोध
एक सप्ताह में दूसरी संघर्ष समिति गठित; ग्रामीणों ने विस्थापन, पुनर्वास और रोजगार की स्पष्ट नीति की उठाई मांग
निजी संवाददाता-शिलाई
एशिया की दूसरी सबसे बड़ी बहुउद्देश्यीय राष्ट्रीय किशाऊ बांध परियोजना को लेकर सीमांत क्षेत्र में विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। एक सप्ताह के भीतर परियोजना प्रभावित क्षेत्र में दूसरी संघर्ष समिति गठित कर ग्रामीणों ने अपने अधिकारों की लड़ाई तेज करने का ऐलान किया है। मेलोथ-शंबर क्षेत्र के विस्थापितों के बाद अब कोटा और मझगांव के ग्रामीणों ने भी संघर्ष समिति का गठन किया है। ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से सूर्यप्रताप सिंह चौहान (राजा) को समिति का अध्यक्ष चुना। इससे पहले मेलोथ-शंबर संघर्ष समिति की कमान श्याम सिंह तोमर को सौंपी गई थी। राष्ट्रीय किशाऊ बांध परियोजना का उद्देश्य छह राज्यों को सिंचाई और पेयजल उपलब्ध करवाने के साथ 660 मेगावाट बिजली का उत्पादन करना है।
हालांकि, परियोजना से प्रभावित हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के करीब 39 राजस्व एवं उप-गांवों के हजारों लोगों के भविष्य को लेकर अभी भी स्थिति स्पष्ट नहीं है। ग्रामीणों का कहना है कि परियोजना के कारण करीब तीन हजार हेक्टेयर उपजाऊ भूमि, जल, जंगल, संस्कृति और पुश्तैनी आशियाने जलमग्न हो जाएंगे। इसके बावजूद विस्थापन, पुनर्वास, मुआवजा, रोजगार और अन्य अधिकारों को लेकर सरकार की ओर से ठोस नीति सामने नहीं आई है। जानकारी के अनुसार जलभराव से कुंवानु, मोहराड़, सियासू सहित एशियार्ड जिंजर वैली क्षेत्र प्रभावित होगा। मोहराड़-शंबर से त्यूणी तक करीब 30 किलोमीटर लंबी झील बनने का अनुमान है। संघर्ष समितियों ने मांग की है कि बांध निर्माण से पहले प्रभावित परिवारों के पुनर्वास, मुआवजे, रोजगार और स्थायी आजीविका को लेकर स्पष्ट नीति घोषित की जाए। ग्रामीणों ने कहा कि विकास के नाम पर प्रभावित परिवारों के अधिकारों और सम्मान से समझौता नहीं किया जा सकता।
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