सुजानपुर की 200 साल पुरानी धरोहर को सहारे की दरकार

By: Jul 28th, 2026 12:02 am

ऐतिहासिक नागेश्वर महादेव मंदिर सुजानपुर की चित्रकला खोती जा रही अपना अस्तित्व, धुंधले पड़े चित्र, कांगड़ा चित्र शैली की 200 साल पुरानी भित्ति चित्रकला संरक्षण के इंतजार में

सिटी रिपोर्टर – सुजानपुर
ऐतिहासिक नगर सुजानपुर टीहरा अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, ऐतिहासिक चौगान, प्राचीन किले और पुराने मंदिरों के लिए पूरे प्रदेश में प्रसिद्ध है। इन्हीं धरोहरों में श्री नागेश्वर महादेव मंदिर का विशेष स्थान है, लेकिन श्री नागेश्वर महादेव मंदिर की प्राचीन विरासत अब संरक्षण की राह देख रही है। भगवान शिव की आराधना के इस प्रमुख केंद्र का धार्मिक महत्व जितना गहरा है, उतना ही इसका ऐतिहासिक और कलात्मक महत्व भी है। कांगड़ा रियासत के महान शासक महाराजा संसार चंद कटोच के शासनकाल से जुड़े इस मंदिर को करीब 200 वर्ष से अधिक पुरानी धरोहर माना जाता है। अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में उन्होंने सुजानपुर को अपनी राजधानी बनाया और यहां अनेक मंदिरों, महलों तथा ऐतिहासिक भवनों का निर्माण करवाया। इतिहासकारों के अनुसार उसी दौर में यहां कला, संस्कृति और धार्मिक गतिविधियों का भी अभूतपूर्व विकास हुआ। नागेश्वर महादेव मंदिर को भी उसी ऐतिहासिक काल की महत्वपूर्ण धरोहर माना जाता है।

वर्षों से श्रद्धालु यहां पहुंचकर भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना करते हैं। विशेषकर सावन माह में मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है और पूरा वातावरण शिवमय हो जाता है। नागेश्वर महादेव मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसकी दीवारों पर बनी कांगड़ा चित्र शैली की भित्ति चित्रकला रही है। यह चित्रकला कभी इस मंदिर की सबसे बड़ी पहचान मानी जाती थी। मंदिर की दीवारों पर भगवान शिव, देवी-देवताओं और धार्मिक प्रसंगों से जुड़े सुंदर चित्र बनाए गए थे, जो कांगड़ा कला की उत्कृष्ट परंपरा को दर्शाते थे। इन चित्रों को देखने के लिए कला प्रेमी और श्रद्धालु दूर-दूर से यहां पहुंचते थे, लेकिन समय के साथ यह ऐतिहासिक चित्रकला धीरे-धीरे अपना अस्तित्व खोती जा रही है। वर्ष 2026 तक पहुंचते-पहुंचते कई चित्र धुंधले पड़ चुके हैं। कुछ स्थानों पर रंग पूरी तरह मिट चुके हैं, जबकि कई जगह नमी, मौसम और समय के प्रभाव से चित्रों को नुकसान पहुंचा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि मंदिर के ऐतिहासिक महत्व की इस चित्रकला को बचाने के लिए अभी तक अपेक्षित स्तर पर संरक्षण कार्य नहीं हुआ है।

धरोहर बचाने को वैज्ञानिक संरक्षण की मांग

लोगों का मानना है कि इस प्रकार की प्राचीन धरोहरों का वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण किया जाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढिय़ां भी इस ऐतिहासिक विरासत को देख और समझ सकें। उनका कहना है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) तथा अन्य संबंधित संस्थाओं द्वारा विशेषज्ञों की सहायता से मंदिर की ऐतिहासिक चित्रकला और भवन का विस्तृत सर्वे किया जाना चाहिए। यदि आवश्यक संरक्षण और मरम्मत का कार्य समय पर शुरू किया जाए, तो इस विरासत को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं का कहना है कि धार्मिक आस्था के साथ-साथ इस ऐतिहासिक धरोहर की सुंदरता भी बनी रहनी चाहिए। मंदिर परिसर में इसके इतिहास और कांगड़ा चित्र शैली की जानकारी देने वाले सूचना बोर्ड लगाए जाएं, साथ ही बेहतर प्रकाश व्यवस्था, साफ-सफाई, पार्किंग और विरासत संरक्षण से जुड़ी सुविधाएं भी विकसित की जाएं, ताकि देश-विदेश से आने वाले पर्यटक इस धरोहर को बेहतर ढंग से देख और समझ सकें।


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