शहर में तिरपाल ही तिरपाल, बरसात शुरू होते ही लैंडस्लाइड रोकने, घरों को बचाने की मुहिम तेज

By: Jul 14th, 2026 12:02 am

स्टाफ रिपोर्टर-शिमला
मानसून की एंट्री के साथ ही राजधानी शिमला एक बार फिर तिरपाल सिटी में तब्दील हो गई है। शहर की पहाडिय़ों, ढलानों और भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों में रंग-बिरंगे तिरपाल दूर से ही नजर आने लगे हैं। हालात ऐसे हैं कि राजधानी का सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक क्षेत्र सचिवालय के आसपास की ढलानें भी तिरपाल से ढकी हुई हैं। लगातार हो रही बारिश के बीच प्रशासन ने फिलहाल पहाडिय़ों को और अधिक खिसकने से रोकने के लिए तिरपाल बिछाने का सहारा लिया है, लेकिन स्थायी सुरक्षा कार्य मानसून खत्म होने तक अधर में लटके हुए हैं। राजधानी के लगभग हर वार्ड में जहां भी भूस्खलन का खतरा है, वहां तिरपाल बिछाकर पहाडिय़ों को ढका गया है। प्रशासन का तर्क है कि बारिश के मौसम में बड़े स्तर पर खुदाई या डंगे लगाने का कार्य करना जोखिम भरा है। ऐसे में फिलहाल अस्थायी सुरक्षा के तौर पर तिरपाल लगाए गए हैं, ताकि बारिश का पानी सीधे पहाडिय़ों में न समाए और मिट्टी का कटाव कुछ हद तक कम किया जा सके। हालांकि विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों का कहना है कि यह केवल अस्थायी व्यवस्था है और इससे बड़े भूस्खलन को पूरी तरह रोक पाना संभव नहीं है।

शहर का कृष्णानगर क्षेत्र आज भी चार वर्ष पहले हुई भीषण त्रासदी की याद दिलाता है। यहां भारी भूस्खलन से नगर निगम का बूचडख़ाना मलबे में दब गया था और दो लोगों की जान चली गई थी। घटना के वर्षों बाद भी करीब 20 से अधिक मकानों पर खतरा बना हुआ है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि स्थायी सुरक्षा कार्यों की बजाय हर मानसून में केवल तिरपाल बिछाकर औपचारिकता पूरी कर दी जाती है। कृष्णानगर के नालों और ढलानों के समीप स्थित कई भवनों के ऊपर इस समय भी तिरपाल बिछे हुए हैं। केवल कृष्णानगर ही नहीं, बल्कि समरहिल, भट्टाकुफर, भराड़ी, रझाणा, विकासनगर, छोटा शिमला, संजौली, चलौंठी, कैथू सहित अनेक वार्डों में भी यही स्थिति देखने को मिल रही है। जहां-जहां पहले भूस्खलन हुआ था या खतरे की आशंका बनी हुई है, वहां प्रशासन ने तिरपाल लगाकर पहाडिय़ों को ढक दिया है। इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की चिंता यह है कि यदि लगातार तेज बारिश जारी रही तो केवल तिरपाल के भरोसे खतरे को टालना मुश्किल होगा।


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