प्रदेश के स्कूलों में फिटनेस के लिए समय कब?

By: Jul 24th, 2026 12:06 am

आज के विद्यार्थी को अगर कल का अच्छा नागरिक बनाना है तो हमें स्कूली पाठ्यक्रम में पढ़ाई के साथ-साथ ही उसके लिए सही फिटनेस कार्यक्रम भी देना होगा। तभी हम सही अर्थों में अपनी अगली पीढ़ी को संपूर्ण शिक्षित कर सकते हैं, जो शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ रहकर निर्धारित समय तक अपनी व अपने देश की सेवा कर सके…

हिमाचल के डेढ़ सौ स्कूल सीबीएसई से संबद्धता तो ले चुके हैं, देर बाद ही सही स्टाफ भी मिल जाएगा, मगर क्या अब भी ड्रिल के पीरियड में खेल मैदान में व्यायाम व खेल न होकर कक्षा के कमरे में नैतिक शिक्षा पढ़ाकर खानापूर्ति की जाएगी? वर्षों से स्कूली स्तर पर फिटनेस कार्यक्रम शुरू करने की बात इस कॉलम के माध्यम से हो रही है तथा हमने भी व्यक्तिगत तौर पर प्रदेश के बड़े निजी स्कूलों के प्रबंधकों से भी कई बार बात की है, मगर हिमाचल प्रदेश का कोई भी सरकारी या निजी स्कूल अपने यहां फिटनेस कार्यक्रम लागू करने में सफल नहीं रहा है। कई बार नए शिक्षा सत्र शुरू होकर खत्म हो गए, मगर फिटनेस कार्यक्रम कहीं भी शुरू नहीं हो पाया है। पिछले वर्ष हिमाचल प्रदेश सरकार ने राज्य के विद्यालयों में विद्यार्थियों की सामान्य फिटनेस के लिए पहले की तरह अनिवार्य रूप से ड्रिल के पीरियड का प्रावधान किया है, मगर राज्य में फिटनेस संस्कृति के अभाव में धरातल पर कुछ भी सकारात्मक नजर नहीं आ रहा है। शिक्षा विभाग के स्कूलों में अब मैदान की जगह कक्षा के कमरे में खेल व व्यायाम की जगह नैतिक शिक्षा को पढ़ाया जा रहा है।

शिक्षा का मतलब शरीर व मन दोनों का विकास करना है, तो शिक्षण विषयों के रिपोर्ट कार्ड की तरह स्वास्थ्य के मानकों का रिपोर्ट कार्ड भी प्रत्येक विद्यार्थी का हर स्कूल में अनिवार्य रूप से हो। क्योंकि भाषा व अन्य शिक्षण विषयों की तरह ही स्वास्थ्य के मूल स्तंभ स्पीड, सट्रेंथ, इडोरैंस व लचक आदि का प्रायोगिक प्रशिक्षण भी उसी उम्र में शुरू करना होता है। शिक्षण विषयों के लिए तो स्कूलों के पास शिक्षक सहित पूरा प्रबंध है, मगर स्वास्थ्य के घटकों को विकसित करके उनका मूल्यांकन करने की कोई भी सुविधा आज तक उपलब्ध नहीं हो पा रही है। इस विषय पर स्कूलों व अभिभावकों को कई बार चेताया जा चुका है, मगर कोई भी समझने के लिए तैयार नहीं है। किसी भी देश को इतनी क्षति युद्ध या महामारी से नहीं होती है जितनी तबाही नशे के कारण हो सकती है। आज जब देश के अन्य राज्यों सहित हिमाचल प्रदेश में भी नशा युवा वर्ग पर ही नहीं किशोरों तक चरस, अफीम, स्मैक, नशीली दवाओं तथा दूरसंचार के माध्यमों के दुरुपयोग से शिकंजा कस रहा है, इसलिए सरकार, स्कूल प्रबंधन व अभिभावकों को इस विषय पर जरूरी कदम जल्दी ही उठा लेने चाहिएं। यदि विद्यार्थी किशोरावस्था में नशे से बच जाता है तो वह फिर युवावस्था आते आते समझदार हो गया होता है। माध्यमिक से वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय स्तर पर विद्यार्थियों को विभिन्न विधाओं में व्यस्त रखने के साथ-साथ शारीरिक फिटनेस की तरफ मोडऩा बेहद जरूरी हो जाता है। मानव का सर्वांगीण विकास शिक्षा के बिना अधूरा है। शिक्षा की परिभाषा में साफ-साफ लिखा है कि यहां शारीरिक व मानसिक दोनों तरह से बराबर विद्यार्थियों का विकास करना है जिससे वे आगे चलकर जीवन को सफलतापूर्वक खुशहाल जी सकें। शारीरिक विकास के लिए खेलों के माध्यम से फिटनेस कार्यक्रम बहुत जरूरी हो जाता है। खेल ही वह माध्यम है जिसके द्वारा विद्यार्थी को नशे से दूर रखा जा सकता है। पिछले कुछ दशकों से हिमाचल प्रदेश के नागरिकों की फिटनेस में बहुत कमी आई है।

इसका प्रमुख कारण है विद्यालय स्तर पर विद्यार्थियों के लिए किसी भी प्रकार के फिटनेस कार्यक्रम का न होना। रट्टे वाली पढ़ाई की होड़ में हम विद्यार्थियों की फिटनेस को ही भूल गए हैं। हिमाचल प्रदेश की अधिकांश आबादी गांव में रहती थी। वहां पर सवेरे-शाम वर्षों पहले विद्यार्थी अपने अभिभावकों के साथ कृषि व अन्य घरेलू कार्यों में सहायता करता था। विद्यालय आने-जाने के लिए कई किलोमीटर दिन में पैदल चलता था। इसलिए उस समय के विद्यार्थी को किसी भी प्रकार के फिटनेस कार्यक्रम की कोई जरूरत नहीं थी। आज का विद्यार्थी घर के आंगन में बस पर सवार होकर विद्यालय के प्रांगण में उतरता है। पढ़ाई के नाम पर ज्यादा समय खर्च करने के कारण फिटनेस के लिए कोई समय नहीं बचता है। अधिकांश स्कूलों के पास फिटनेस के लिए न तो आधारभूत ढांचा है और न ही कोई कार्यक्रम है। आज का विद्यार्थी फिटनेस व मनोरंजन के नाम पर दूरसंचार माध्यमों का कमरे में बैठ कर खूब दुरुपयोग कर रहा है। ऐसे में विद्यार्थी के सर्वांगीण विकास की बात मजाक लगती है। आज के विद्यार्थी के लिए विद्यालय या घर पर आधे घंटे के फिटनेस कार्यक्रम की सख्त जरूरत है। इसमें 15 से 20 मिनट धीरे धीरे दौडऩा तथा विभिन्न कोणों पर शरीर के जोड़ों की विभिन्न क्रियाओं को पूरा करने के बाद शरीर को कूलडाऊन करना होगा। कम से कम बीस मिनटों तक तेज चलने, दौडऩे व शारीरिक क्रियाओं के करने से रक्त वाहिकाओं में रक्त संचार तेज हो जाता है। उससे हर मसल को उपयुक्त मात्रा में प्राणवायु मिलने से उसका समुचित विकास होता है।

आज के विद्यार्थी को अगर कल का अच्छा नागरिक बनाना है तो हमें स्कूली पाठ्यक्रम में पढ़ाई के साथ-साथ ही उसके लिए सही फिटनेस कार्यक्रम भी देना होगा। तभी हम सही अर्थों में अपनी अगली पीढ़ी को संपूर्ण शिक्षित कर सकते हैं, जो शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ रहकर निर्धारित समय तक अपनी व अपने देश की सेवा कर सके। इस सबके लिए सरकार को अधिक से अधिक शारीरिक शिक्षकों व खेल प्रशिक्षकों को स्कूलों के साथ जोडऩे का प्रबंध करना होगा, जैसा केंद्रीय विद्यालय कर रहे हैं। वे खेल सुविधा व प्रतिभा के हिसाब से विभिन्न खेलों के लिए पार्ट टाइम पूर्व खिलाडिय़ों व प्रशिक्षकों की नियुक्ति कर रहे हैं। हिमाचल के शिक्षा विभाग को चाहिए कि वह ड्रिल के पीरियड में नैतिक शिक्षा पढ़ाने के स्थान पर व्यायाम करवाए, तभी हम खेल-खेल में आसानी से फिटनेस हर विद्यार्थी को दे सकते हैं। अगर हर विद्यार्थी फिट होगा, तो उनमें से खिलाड़ी मिल ही जाएंगे और फिट नागरिक भी।

भूपिंद्र सिंह

अंतरराष्ट्रीय एथलेटिक्स प्रशिक्षक

ईमेल: bhupindersinghhmr@gmail.com


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