आखिर पहाड़ क्यों उगल रहे हैं मलबा, क्या चेतावनी समझने में हो गई है बड़ी भूल
इन दिनों पहाड़ सबको डरा रहे हैं, ये देखने में जितने खूबसूरत लगते हैं, उतने ही संवेदनशील भी होते है। ये वहीं पहाड़ है जहां आज से कुछ समय पहले तक कोने कोने से लोग सुकून की तलाश में पहुंच रहे थे। लेकिन मानसून में यही पहाड़ डर का कारण बन गए हैं। वजह है यहां हो रहा लैंडस्लाइड- इन दिनों चाहे हिमाचल हो या उत्तराखंड या कश्मीर- हर जगह तबाही बरस रही है। पहाड़ गिर रहे हैं और लोग डर के साए में जी रहे हैं।
एक रिपोर्ट के अनुसार भारत उन चार प्रमुख देशों में शामिल है जहां भूस्खलन का खतरा सबसे ज़्यादा है। यहाँ हर साल भूस्खलन की वजह से जान-माल का नुकसान होता ही है। भारत में ज़्यादातर भूस्खलन मॉनसून के जून से सितंबर के बीच में होते हैं। दुनिया भर में होने वाले बारिश से जुड़े भूस्खलन की घटनाओं में भारत की हिस्सेदारी 16% है। देश में कुल भूमि का करीब 12 फीसदी हिस्सा भूस्खलन के लिहाज से काफी संवेदनशील है, इसमें उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के अलावा देश के पश्चिमी घाट में नीलगिरि की पहाड़ियां, कोंकण क्षेत्र में महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक और गोवा, आंध्र प्रदेश का पूर्वी क्षेत्र, पूर्वी हिमालय क्षेत्रों में दार्जिलिंग, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश, पश्चिमी हिमालय क्षेत्र में हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड के कई इलाके भूस्खलन के लिहाज से बेहद संवेदनशील हैं, जहां हर साल करोड़ों की संपत्ति और जान माल का नुकसान होता है।
हिमाचल में ही मानसून के दौरान सैकड़ों स्थानों पर भूस्खलन होता है, जिससे जनजीवन और अर्थव्यवस्था दोनों प्रभावित होते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि आखिर पिछले कुछ सालों से लैंडस्लाइड क्यों इतना बढ गए हैं, चलिए आज इसी पर बात करते हैं। दरअसल भूस्खलन तब होता है जब पहाड़ की मिट्टी, चट्टानें या मलबा गुरुत्वाकर्षण के कारण नीचे की ओर खिसकने लगता है। इसके साथ ही हिमालयी क्षेत्रों में होने वाली बर्फबारी और बारिश चट्टानों व मिट्टी को मुलायम बना देती है। जो बाद में लैंडस्लाइड का कारण बनता है। हालांकि लैंडस्लाइड के पीछे केवल प्राकृतिक ही नहीं मानवीय कारण भी होते हैं, और आज के समय में प्राकृतिक से ज्यादा मानवीय कारण लैंडस्लाइड के लिए जिम्मेंदार हैं, कैसे… चलिए आपको बताते हैं।
इन दिनों आप जिस ओर नजर डालेंगे वहां एक चीज बहुत कॉमन पाएंगे और वो ये हैं कि पहाड़ों को बेतरतीब तरीके से काटा जा रहा है। पहाड़ों के काट कर सड़कें, होटल और इमारतें बनाने से प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है। वैज्ञानिक तरीके से ढलानों को सुरक्षित नहीं करने से भूस्खलन का खतरा बढ़ रहा है। कई पहाड़ी इलाकों में जल निकासी की व्यवस्था बेहद खराब है, ऐसे में जब बारिश का पानी सही तरीके से बाहर नहीं निकलता, और लंबे समय तक तेज बारिश होती रहती है, तो मिट्टी में पानी भर जाता है। जिससे मिट्टी अपनी पकड़ खो देती है और ढलान कमजोर होकर नीचे खिसक जाती है। यहीं नहीं आज हम अपनी जरूरतों और सुख सुविधाओं के लिए बुरी तरह से जंगलों को काट रहे हैं। नए पेड़ लगाते हैं तो लेकिन कभी पीछे मुड़कर ये नहीं देखतें की चंद महीनों बाद वो पेड़ जीवित है भी या नहीं। पेड़ों की जड़ें मिट्टी को मजबूती से पकड़कर रखती हैं। जब जंगल काटे जाते हैं, तो मिट्टी ढीली हो जाती है और बारिश के दौरान आसानी से बह जाती है। वहीं दूसरी ओर बादल फटने और भूकंप जैसी घटनाएं भी भूस्खलन का कारण बन रहीं हैं। हिमाचल भूकंपीय दृष्टि से बहुत संवेदनशील क्षेत्र है, भूकंप के झटके पहाड़ों की चट्टानों को कमजोर कर देते हैं, जिससे भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है।
देखिए इस बात में कोई दो राय नहीं कि हिमाचल प्रदेश युवा और नाजुक पर्वतों वाला राज्य है। यहां की कई पहाड़ियां अभी भी भू-वैज्ञानिक रूप से स्थिर नहीं हैं। दूसरी ओर तेजी से बढ़ते सड़क निर्माण, सुरंग परियोजनाएं, पर्यटन, होटल निर्माण और बदलते मौसम का असर इस खतरे को और बढ़ा रहा है। कुल्लू, मंडी, कांगड़ा, शिमला, किन्नौर, चंबा, सिरमौर और लाहौल-स्पीति जैसे जिले मानसून के दौरान सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। यही नहीं विशेषज्ञ मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन भी इन आपदाओं को बढ़ानें अहम भूमिका निभा रहा है, जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। पहले जहां कई दिनों तक सामान्य बारिश होती थी, वहीं अब कम समय में अत्यधिक वर्षा हो रही है। यही कारण है कि अचानक बाढ़, बादल फटना और भूस्खलन जैसी घटनाएं बढ़ती दिखाई दे रही हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार भूस्खलन को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन सही योजना और वैज्ञानिक उपायों से इसके खतरे और नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। जंगलों का संरक्षण, ढलानों की सुरक्षा, नियमित भू-वैज्ञानिक निगरानी, आधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम और जागरूकता के साथ ही हम इस आपदा को कम कर सकते हैं। हमें समझना होगा कि अगर आज हमने विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन नहीं बनाया तो यही खूबसूरत पहाड़ बार-बार आपदा का कारण बनते रहेंगे, और हम हर बरसात में यू ही डरते रहेंगे।
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