हरियाणा राजी, पर पंजाब को दिक्कत, BBMB एरियर पर सुप्रीम कोर्ट में आज क्या हुआ, जानिए
दिव्य हिमाचल ब्यूरो—शिमला
भाखड़ा-ब्यास प्रबंधन बोर्ड यानी बीबीएमबी परियोजनाओं से हिमाचल को मिलने वाले करीब 4200 करोड़ एरियर के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को फैसला सुरक्षित रख लिया। हालांकि इस केस में पड़ोसी राज्य पंजाब ने आखिरी सुनवाई में भी एरियर भुगतान की दरों पर आपत्ति जताई है, जबकि हरियाणा ने हिमाचल से सहमति जता दी थी। इस पूरे मामले में हिमाचल की पैरवी बेहतर ढंग से हुई है। हालांकि भारत सरकार ने एरियर की जो गणना सुप्रीम कोर्ट में जमा करवाई है, वह हिमाचल की गणना से भिन्न है।
हिमाचल इस केस में एरियर के बदले बिजली देने पर सहमत है और दरों को भी कम कर दिया था। मामला हिमाचल के 13,066 मिलियन यूनिट बिजली के पुराने बकाये से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2011 में हिमाचल प्रदेश का बीबीएमबी परियोजनाओं में 7.19 प्रतिशत हिस्सा तय किया था। इसके तहत भाखड़ा परियोजना में हिस्सा 1 नवंबर 1966 से, डैहर परियोजना में नवंबर 1977 से और पौंग डैम परियोजना में जनवरी 1978 से देय माना गया। पहली नवंबर, 2011 के बाद हिमाचल को उसका 7.19 प्रतिशत बिजली हिस्सा मिल रहा है, लेकिन उससे पहले की अवधि का एरियर अब तक लंबित है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कैशलेस सेटलमेंट का फार्मूला रखा है। इसके तहत पंजाब और हरियाणा द्वारा हिमाचल को बकाये की राशि नकद देने के बजाय बिजली के रूप में भुगतान किया जाएगा। प्रस्ताव में 13,066 मिलियन यूनिट के कुल बकाये में से 12,000 मिलियन यूनिट से अधिक का निपटारा ऊर्जा के रूप में करने की बात है। इसके अलावा हिमाचल पर पंजाब और हरियाणा की करीब 420 करोड़ रुपए की पूंजीगत लागत की देनदारी को भी बकाया बिजली में समायोजित करने का प्रस्ताव है।
30 जुलाई की सुनवाई में हिमाचल और हरियाणा ने केंद्र के प्रस्ताव पर सैद्धांतिक सहमति जताई थी, लेकिन पंजाब ने आपत्ति दर्ज की थी। पंजाब की ओर से कहा गया था कि 2.50 रुपए प्रति यूनिट की दर उसके लिए अधिक है और इससे राज्य को करीब 2,000 करोड़ रुपए का नुकसान हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने तब पंजाब को अपना स्पष्ट रुख बताने के लिए दो सप्ताह का समय दिया था। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि यदि आपसी समझौता नहीं होता है, तो वह मामले का गुण-दोष के आधार पर फैसला करेगी। हिमाचल सरकार का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के 2011 के फैसले के बावजूद राज्य को लंबे समय से उसके हिस्से के बिजली लाभ से वंचित रखा गया। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के अनुसार लंबित देनदारी करीब 4,200 करोड़ है। राज्य सरकार इसे हासिल करने के लिए कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर प्रयास कर रही है। राज्य सरकार ने वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल को इस केस में पैरवी के लिए लिया था।
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