इथेनॉल : भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आगे

सोशल मीडिया और कुछ अनुभवों के कारण, कुछ लोगों को यह लगने लगा है कि ई-20 पेट्रोल की जबरदस्ती बिक्री सही नहीं है। बाजार में विभिन्न प्रकार के विकल्प होने में कोई हर्ज भी नहीं है। सरकार का मानना है, इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल के कई फायदे हैं…

नीट परीक्षा लीक के बाद आज मीडिया में सबसे बड़ा मुद्दा ई-20 यानी इथेनॉल ब्लैंडिंग पेट्रोल बना हुआ है। सरकार को इस बात पर घेरा जा रहा है कि वो लोगों पर इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल थोप रही है, जिससे उनकी माईलेज भी घट रही है और गाडिय़ों के इंजन भी खराब हो रहे हैं। भारत में इथेनॉल ब्लेंडिंग का सफर 2001 में शुरू हुआ। इससे पहले, गहन चर्चा हो रही थी कि भारत अपने जैव संसाधनों का इस्तेमाल करके भले ही पूरी तरह से नहीं, तो कम से कम आंशिक रूप से, ऊर्जा सुरक्षा कैसे हासिल कर सकता है। इसमें सिर्फ इथेनॉल ही नहीं, बल्कि बंजर भूमि पर उगाए जाने वाले जेट्रोफा, पोंगामिया (करंज) जैसी फसलों से बनने वाले दूसरे बायो-ईंधन भी शामिल थे, जिनका इस्तेमाल विकल्प के तौर पर किया जा सकता था। हालांकि, इन बायो-ईंधन का कुछ हद तक इस्तेमाल 2001 से पहले ही शुरू हो गया था, लेकिन पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग की पहली आधिकारिक घोषणा तत्कालीन पेट्रोलियम मंत्री राम नाइक द्वारा 2001 में स्वदेशी जागरण मंच के थिंक टैंक सीबीएमडी द्वारा आयोजित एक सम्मेलन में की गई थी। यह कहा गया कि इससे आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी और सफल पायलट प्रोजेक्ट के बाद कीमती विदेशी मुद्रा की भारी बचत होगी।

तत्कालीन यूपीए सरकार के कार्यकाल में 2006 में पेट्रोल में 5 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण (ई-5) का कार्यक्रम 20 राज्यों और 4 केंद्रशासित प्रदेशों तक विस्तारित किया गया। इसका अर्थ यह नहीं था कि इथेनॉल मिश्रण की अधिकतम सीमा 5 प्रतिशत पर स्थायी रूप से तय कर दी गई थी। यह कई सालों तक ऐसे ही चलता रहा, जब तक कि इस ब्लेंडिंग में इथेनॉल का अनुपात बढ़ाने का फैसला नहीं किया गया। भारत में पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण की यात्रा धीरे-धीरे आगे बढ़ी। शुरुआती दौर में 5 प्रतिशत मिश्रण का लक्ष्य रखा गया। 2018 में 10 प्रतिशत ब्लैंडिंग का लक्ष्य 2022 तक हासिल करने का निर्धारण किया गया, जिसे सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों ने जून 2022 में निर्धारित समय से पांच महीने पहले ही प्राप्त कर लिया। इसके बाद यह ब्लैंडिंग बढक़र 2022-23 में 12.06 प्रतिशत और 2023-24 में 14.60 प्रतिशत हो गई। 2024-25 में यह लगभग 19 प्रतिशत तक पहुंच गई। अंतत: 2025-26 में भारत ने 20 प्रतिशत इथेनॉल ब्लैंडिंग का लक्ष्य हासिल कर लिया, मूल 2030 के लक्ष्य से पांच वर्ष पहले। शायद इथेनॉल ब्लेंडिंग का अनुपात जल्दी से 20 प्रतिशत तक बढ़ाने की मुख्य वजह कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और अमरीका-ईरान युद्ध तथा उसके बाद होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी के कारण सप्लाई में रुकावट थी।

कार्बन उत्सर्जन : 2001 में जब पहली बार इथेनॉल ब्लेंडिंग के बारे में सोचा गया था, तो मुख्य जोर ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भरता पर था, कार्बन उत्सर्जन कम करने पर उतना जोर नहीं था। लेकिन, नीति निर्माताओं के मन में यह बात जरूर थी कि इथेनॉल ब्लेंडिंग से पेट्रोलियम उत्पादों के कारण होने वाले कार्बन उत्सर्जन को कम करने में भी मदद मिल सकती है। लेकिन, जैसे-जैसे समय बीतता गया, ग्लोबल वार्मिंग और कार्बन उत्सर्जन को लेकर चिंता बढ़ती गई। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में लगातार बढ़ता तापमान निश्चित रूप से जीवाश्म ईंधन को जलाने और दूसरी औद्योगिक गतिविधियों से जुड़ा है। हाल के समय में, पर्यावरण और ग्लोबल वार्मिंग को ध्यान में रखते हुए जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल कम करने के लिए कई कोशिशें हुई हैं। जानकारों का मानना है कि इथेनॉल ब्लेंडिंग के कारण भी जीवश्म ईंधन का उपयोग कम होगा और इसे कार्बन उत्सर्जन भी घटेगा। हाल ही में, सरकार के पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिलाकर बेचने के फैसले पर काफी विवाद हुआ है। सबसे पहले, सरकार पर आरोप लग रहा है कि वह बिना ठीक से जांच-पड़ताल किए मिलावटी पेट्रोल इस्तेमाल करने के लिए मजबूर कर रही है जिससे वाहनों को नुकसान पहुंच रहा है और आम जनता के वाहन खराब होने का खतरा बढ़ रहा है। एक और आपत्ति यह है कि चूंकि इथेनॉल एक सस्ता घटक है और इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल बनाने की लागत कम आती है, फिर भी सरकार कंपनियों से यह नहीं कह रही है कि वे इसका फायदा ग्राहकों तक पहुंचाएं। इथेनॉल मिलाने के खिलाफ तीसरी आपत्ति यह है कि इससे गाडिय़ों का माइलेज कम हो जाता है, हालांकि अधिकारी मानते हैं कि माइलेज 2 से 6 प्रतिशत तक कम हो सकता है, लेकिन आलोचकों का मानना है कि माइलेज में कम से कम 10 से 15 प्रतिशत की कमी आती है।

अंतरराष्ट्रीय अनुभव : अंतरराष्ट्रीय अनुभव से पता चलता है कि कई देश पहले से ही इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिनमें ब्राजील जैसे पेट्रोलियम भंडार वाले देश भी शामिल हैं। ब्राजील में लंबे समय से अलग-अलग तरह के इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल का इस्तेमाल हो रहा है। ब्राजील ने गाडिय़ों में जरूरी बदलाव करके 100 प्रतिशत इथेनॉल वाले ईंधन की भी शुरुआत की है। आलोचकों का तर्क है कि पहले बनी भारतीय गाडिय़ां इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल के इस्तेमाल के लिए उपयुक्त नहीं हैं, और इसलिए 20 प्रतिशत इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल से गाडिय़ों को नुकसान पहुंचेगा। ई-20 को लेकर मुख्य चिंता पुराने पेट्रोल वाहनों की तकनीकी उपयुक्तता को लेकर है। 2008 के बाद के अधिकांश वाहन ई-10 के अनुरूप ही बनाए गए थे, जबकि ई-20 के लिए मटीरियल उपयुक्तता और इंजन कैलिब्रेशन की आवश्यकताएं अधिक हैं। इसलिए पुराने वाहनों में ई-20 से ईंधन क्षमता में कुछ कमी तथा लंबे समय में कुछ ईंधन से जुड़े कलपुर्जों पर अतिरिक्त प्रभाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि, उपलब्ध तकनीकी परीक्षणों से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि ई-20 सामान्य रूप से पुराने वाहनों को व्यापक या तत्काल नुकसान पहुंचाता है। नए वाहनों को ई-20 के अनुरूप बनाना इस संक्रमण का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

प्रश्न कीमत का : आलोचकों का कहना है कि चूंकि ई-20 पेट्रोल लागू करने का मूल तर्क इथेनॉल के सस्ते दाम पर उपलब्ध होना है तो सरकार को सस्ते इथेनॉल का लाभ उपभोक्ताओं को भी देना चाहिए। लेकिन सरकार ने एक तरफ शुद्ध पेट्रोल की उपलब्धता समाप्त कर दी और सभी को इथेनॉल ब्लैंडिड पेट्रोल को उसी कीमत पर खरीदने के लिए अब बाध्य कर रही है। आलोचकों का यह भी कहना है कि चूंकि ई-20 पेट्रोल से माईलेज भी कम हो जाती है, उसकी भरपाई भी ई-20 पेट्रोल को सस्ता कर की जा सकती है। पेट्रोल में इथेनॉल ब्लैंडिंग का अनुपात बढऩे के कारण अब इथेनॉल की कीमत भी बढऩे लगी है। अब तो यह भी कहा जा रहा है कि वो कच्चे तेल की कीमत से भी ज्यादा हो गई है। इसलिए इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की कीमत घटाने की संभावना तो नहीं लगती।

इस विवाद का क्या है समाधान : सोशल मीडिया और कुछ अनुभवों के कारण, कुछ लोगों को यह लगने लगा है कि ई-20 पेट्रोल की जबरदस्ती बिक्री सही नहीं है। बाजार में विभिन्न प्रकार के विकल्प होने में कोई हर्ज भी नहीं है। लेकिन सरकार का मानना है कि इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल के कारण कई फायदे हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पहला फायदा यह है कि इससे ऊर्जा में आत्मनिर्भरता बढ़ती है। तेल की उपलब्धता कम होने पर भी दशीय संसाधनों का उपयोग कर पेट्रोल उपलब्ध कराया जा सकता है। इसके साथ ई-20 पेट्रोल के इस्तेमाल से बहुमूल्य विदेशी मुद्रा भी बचती है। दूसरा फायदा यह है कि इथेनॉल का इस्तेमाल होने से इसका लाभ किसान को मिलता है, क्योंकि इससे उनको अपनी उपज का सही मूल्य मिलता है।

डा. अश्वनी महाजन

पूर्व प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय


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