गीता रहस्य
स्वामी रामस्वरूप
अथर्ववेद मंत्र 4/11/7 ने स्वयं ‘रूपेण इंद्र:’ अर्थात ईश्वर के समान कह दिया है। परंतु जो केवल पढ़, सुन, रट कर ही समझता है वह आध्यात्मिक पथ पर है, तो वह अविद्याग्रस्त है और केवल पढ़, सुन, रट कर प्रवचन आदि करने वाले (वेदोक्त यज्ञ, योग साधना न करने वाले) उनका तो वेद शास्त्र, भगवद्गीता में कोई महत्त्व नहीं है…
गतांक से आगे…
इस प्रकार श्लोक 12, 11, 13 में उपदेश करते हुए श्रीकृष्ण महाराज ने अंत में गीता श£ोक 12/13 से 19 तक वेद एवं योग साधना करने वाले योगी के अंदर स्वत: उत्पन्न दिव्य गुणों का वर्णन किया है और प्रस्तुत श£ोक 12/20 में श्रीकृष्ण महाराज कह रहे हैं कि यदि ईश्वर के आश्रित रहते हुए कोई साधक ऊपर कहे हुए दिव्य गुण और अमृत वचन का पालन करेगा, तो वह परमेश्वर को सबसे अधिक प्रिय है।
वेदोक्त अमृत वचन को सुनकर उसमें कही शिक्षा, यज्ञ, योगाभ्यास आदि की कठोर साधना करके अर्थात (पर्युपासते) समाधि प्राप्त योगी जब ऊपर कहे दिव्य गुणों को धारण करता है तब बह ईश्वर को विश्व में सबसे अधिक प्यारा लगता है क्योंकि ऐसे योगी को तो अथर्ववेद मंत्र 4/11/7 ने स्वयं ‘रूपेण इंद्र:’ अर्थात ईश्वर के समान कह दिया है। परंतु जो केवल पढ़, सुन, रट कर ही समझता है, वह आध्यात्मिक पथ पर है, तो वह अविद्याग्रस्त है और केवल पढ़, सुन, रट कर प्रवचन आदि करने वाले (वेदोक्त यज्ञ, योग साधना न करने वाले) उनका तो वेद शास्त्र, भगवद्गीता में कोई महत्त्व नहीं है। प्रस्तुत श्लोक में ‘श्रद्-दधाना:’ पद पुन: विचारणीय है। ‘श्रद्धाम्’ पद ऋग्वेद मंडल 10 सूक्त 151 में ईश्वर ने विस्तार से समझाया है। इसके मंत्र 1 में कहा
(श्रद्धया अग्रि: समिध्यते) श्रद्धा से अग्रि अर्थात विद्वान दीप्त होता है।
श्रत्+धा=श्रद्धा। यह श्रद्धा शब्द की उत्पत्ति है। अर्थात ‘श्रत्’ धातु से श्रद्धा शब्द निष्पन्न होता है। श्रत्+धा का अर्थ है सत्य को धारण करना। भगवद्गीता श£ोक 2/16 में ही कहा है कि ‘नाभावो विद्या सत:’ अर्थात सत्य वह है जो न कभी बनता है और न नष्ट होता है। अत: सत्य का कभी अभाव नहीं होता।
-क्रमश:
Keep watching our YouTube Channel ‘Divya Himachal TV’. Also, Download our Android App or iOS App
