श्री कृष्ण मंदिर उडुपी

By: Aug 29th, 2026 12:15 am

भारत में भगवान श्रीकृष्ण के कई अद्भुत और रहस्यमयी मंदिर हैं, जिनके बारे में अलग-अलग मान्यताएं भी हैं। भगवान श्रीकृष्ण का ऐसा ही एक मंदिर कर्नाटक के उडुपी में स्थित है, जहां कृष्ण भक्त बाल-गोपाल के दर्शन खिडक़ी से करते हैं।

मंदिर भी मठ भी-उडुपी का श्री कृष्ण मंदिर मात्र एक पूजा स्थल ही नहीं वरन एक मठ की तरह है, जो भक्तों के रहने के लिए बने एक आश्रम जैसा है। श्री कृष्ण मठ के आसपास कई मंदिर बने हैं। इनमें सबसे अधिक प्राचीन मंदिर 1500 वर्ष पुराना लकड़ी और पत्थर से बना हुआ है। कहते हैं कि कृष्ण मठ को 13वीं सदी में वैष्णव संत श्री माधवाचार्य द्वारा स्थापित किया गया था। वे द्वैतवेदांत संप्रदाय के संस्थापक भी माने जाते थे।

जुड़ी है अनोखी कथा-मंदिर से एक अनोखी कहानी जुड़ी हुई है, कहा जाता है कि एक बार भगवान कृष्ण के अन्नय भक्त कनकदास को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई थी। इस बात से वे बहुत दुखी हुए और मंदिर के पिछवाड़े में जा कर अश्रु पूरित नेत्रों के साथ तन्मयता से भगवान की प्रार्थना करने लगे। भगवान उनकी पीड़ा से अत्यंत दुखी हुए और उनकी भक्ति से इतने प्रसन्न हुए कि उन्हें दर्शन देने के लिए उन्होंने मठ में स्थित मंदिर के पीछे एक छोटी सी खिडक़ी बना दी। आजतक भक्त उसी खिडक़ी के माध्यम से भगवान कृष्ण की पूजा करते हैं।

मंदिर में विशेष पूजा- इस मंदिर की खासियत है कि यहां भगवान की पूजा खिडक़ी के नौ छिद्रों में से ही की जाती है। यहां हर साल पर्यटकों की भीड़ लगी रहती है, लेकिन जन्माष्टमी के दिन यहां की शोभा देखते ही बनती है। उस दिन पूरे मंदिर को फूलों और रंग- बिरंगी रोशनियों से सजाया जाता है। उस दिन भगवान के दर्शन करने के लिए भक्तों का अपार जनसमूह उमड़ता है और इस वजह से लोगों को उनकी एक झलक के लिए 3 से 4 घंटे तक इंतजार करना पड़ता है। इस स्थान को दक्षिण की मथुरा भी कहा जाता है।

उडुपी का वर्णन-इस स्थान का जिक्र महाभारत से जुड़ी पौराणिक कथाओं में भी आता है। इन कथाओं के अनुसार महाभारत के युद्ध में उडुपी के राजा ने निरपेक्ष रहने का फैसला किया था। वे न तो पांडवों की तरफ से थे और न ही कौरवों की तरफ से। अपनी रक्षा के लिए राजा ने कृष्ण की आज्ञा से कहा कि कौरवों और पांडवों की इतनी बड़ी सेना को भोजन की जरूरत होगी, इसलिए वे दोनों तरफ की सेनाओं को भोजन बनाकर खिलाएंगें। 18 दिन तक चलने वाले इस युद्ध में कभी भी खाना कम नहीं पड़ा। युद्घ के अंत में जब उनसे इसका रहस्य पूछा गया, तो उडुपी नरेश ने इसका श्रेय श्री कृष्ण को दिया। उन्होंने बताया कि जब कृष्ण भोजन करते थे, तो उनके आहार से उन्हें पता चल जाता था कि कल कितने लोग काल का ग्रास बनने वाले हैं और वे खाना इसी हिसाब से तैयार करवाते थे।


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