सीनियर का डांटना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं, SC का बड़ा फैसला, सुसाइड की मंशा साबित करना जरूरी
दिव्य हिमाचल ब्यूरो — नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी वरिष्ठ अधिकारी की ओर से अधीनस्थ कर्मचारी को फटकार लगाना, प्रशासनिक निर्देश देना, कारण बताओ नोटिस जारी करना या अनुशासनात्मक कार्रवाई करना अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं बनता। इसके लिए यह साबित करना जरूरी है कि आरोपी की मंशा अधीनस्थ को आत्महत्या के लिए प्रेरित करने की थी और उसने ऐसा करने के लिए कोई ठोस कदम उठाया था। जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिस्वर सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी 2021 में हरिसाल वन क्षेत्र की रेंज फॉरेस्ट ऑफिसर दीपाली चव्हाण की आत्महत्या से जुड़े मामले में की। पीठ ने पूर्व डिप्टी कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट्स विनोद शिवकुमार की अपील मंजूर करते हुए उनके खिलाफ चल रहे आपराधिक मामले को खत्म कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के 24 सितंबर, 2025 के आदेश और अचलपुर सत्र न्यायालय के 24 अक्तूबर, 2024 के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने शिवकुमार को मामले से बरी कर दिया है। बता दें कि दीपाली चव्हाण ने 25 मार्च, 2021 को हरिसाल स्थित अपने सरकारी आवास में अपनी सर्विस पिस्टल से गोली मारकर आत्महत्या कर ली थी। अभियोजन पक्ष ने शिवकुमार पर उन्हें प्रताडि़त करने के आरोप लगाए थे। इनमें आधिकारिक फटकार, कारण बताओ नोटिस, अतिक्रमण हटाने और गांव के पुनर्वास से जुड़े काम देना, एससी-एसटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज कराने में कथित भूमिका और जंगल में ट्रेक करने के लिए मजबूर करना शामिल था।
चव्हाण ने आरोप लगाया था कि जंगल में ट्रेक करने के कारण उनका गर्भपात हुआ था। यह घटना अक्तूबर, 2020 की थी, जबकि उन्होंने मार्च, 2021 में आत्महत्या की। अदालत ने माना कि यह घटना आत्महत्या से पांच महीने से अधिक पहले की थी और अन्य आरोप भी काफी पुराने थे। इन नोट्स में उन्होंने शिवकुमार को कथित उत्पीडऩ के लिए जिम्मेदार ठहराया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सुसाइड नोट में लगाए गए आरोप अपने आप में तत्काल उकसावे की घटना या आपराधिक मंशा साबित नहीं करते।
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