सरकारी नौकरी का जाल : हक की मानसिकता छोड़ उद्यमिता क्यों चुने भारत

By: Aug 25th, 2026 9:29 pm

अरुण सिंह धूमल (कमिश्नर, आईपीएल)

‘जो शिक्षा बच्चों को रोजगार, स्वरोजगार, कारोबार या अविष्कार के काबिल न बना पाए, उसके कोई मायनेनहीं हैं।’

यह एक पंक्ति भारत की युवा बेरोजगारी बहस के केंद्र में छिपे संकट को उजागर करती है। हम बार-बार पूछते हैं कि युवाओं को नौकरी क्यों नहीं मिल रही। शायद असली सवाल यह होना चाहिए, वे नौकरी के लायक क्यों नहीं बन पा रहे?

यह रोजगार का संकट नहीं, तैयारी का संकट है

जेन-ज़ी में जो निराशा दिख रही है, वह वास्तविक है, लेकिन उसका निदान अकसर गलत होता है। समस्या केवल नौकरियों की कमी नहीं है, यह इस बात का बेमेल है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था क्या बन रही है और आधुनिक अर्थव्यवस्था को क्या चाहिए। उद्योग जगत बार-बार ही यही कहता है: वे नौकरी देने को तैयार हैं, लेकिन जो स्नातक उनके दरवाजे तक पहुंचते हैं, उनके पास नौकरी के लायक कौशल नहीं होता। असली अड़चन रोजगार नहीं, रोजगार के काबिल होना है।

सरकारी नौकरी की राजनीति

पिछले कई वर्षों से विपक्षी दल-जिनमें राहुल गांधी और कांग्रेस प्रमुख हैं-सरकारी नौकरी के वादे के इर्द-गिर्द एक राजनीतिक कथानक गढ़ते रहे हैं, हर रिक्ति को युवाओं का सरकार पर हक बताते हुए। यह कोई नया विचार नहीं है। यह उसी समाजवादी, राज्य-नियंत्रित आर्थिक मॉडल की अगली कड़ी है, जिसे नेहरू-गांधी परिवार ने सत्ता में रहते दशकों तक अपनाया-एक ऐसा मॉडल जिसने आजादी के बाद 50 से अधिक वर्षों तक भारत को गरीबी में रखा, जबकि जिन देशों ने बाजार और निजी पंूजी के लिए द्वार खोले, वे आगे निकल गए। चिंता यह है कि कहीं मोदी सरकार और भाजपा इस कथानक से इसी की शर्तों पर लडऩे के लालच में न आ जाएं-यानी इसके आधार को चुनौती देने के बजाय और अधिक सरकारी नौकरियों का वादा करने लगें। यह एक भूल होगी। सरकारी-नौकरी के कथानाक का जवाब सरकारी वेतन-सूची को बड़ा करना नहीं है। जवाब है-एक बड़ी, अधिक गतिशील निजी अर्थव्यवस्था।
दो क्षेत्र, जो यह साबित करते हैं

दूरसंचार और रक्षा-ये दोनों हाल के सबसे स्पष्ट उदाहरण हैं कि जब निजी पूंजी और प्रतिस्पर्धा को खुली छूट मिलती है, तो क्या होता है। दूरसंचार क्षेत्र में, निजी खिलाडिय़ों के लिए द्वार खोलने से वास्तविक परिवर्तन आया – रिलायंस जियो और भारती एयरटेल ने 5जी नेटवर्क बनाने की होड़ लगाई, जो आज भारत के अधिकांश जिलों को कवर करता है, जबकि निजी ऑपरेटर 6जी अनुसंधान और स्टारलिंक जैसी सेटेलाइट ब्रॉडबैंड साझेदारियां भी तलाश रहे हैं। सरकारी कंपनी बीएसएनएल की कहानी कहीं अधिक निराशाजनक है: वह अभी भी सरकार द्वारा वित्तपोषित एक बहु-वर्षीय प्रयास के जरिए अपने स्वदेशी 4जी नेटवर्क को पूरी देश में पहुंचाने में जुटी है और 5जी अभी काफी हद तक पायलट और रोलआउट-योजना के चरण में ही है, जबकि निजी खिलाड़ी वर्षों आगे निकल चुके हैं। राज्य ने भारी पंूजी झोंकी है-770 अरब रुपए का प्रस्ताविक निवेश योजना और बार-बार इक्विटी डालना -केवल बीएसएनएल को प्रतिस्पर्धी बनाए रखने के लिए, जबकि जियो और एयरटेल ने निजी पंूजी और बाजार अनुशासन के दम पर 5जी का विस्तार किया।
रक्षा क्षेत्र की कहानी भी मिलती-जुलती है: दशकों तक बंद, सार्वजनिक-क्षेत्र -प्रधान मॉडल जिसने क्षमता और नवाचार दोनों को सीमित रखा, अब निजी निर्माताओं और स्टार्टअप्स के लिए रास्ता बना रहा है-ड्रोन से लेकर मिसाइल कल-पुर्जांे तक, जहां निवेश और स्वदेशी क्षमता पुराने मॉडल से कहीं तेजी से बढ़ रही है।

पैटर्न स्पष्ट है: निजी पंूजी, प्रतिस्पर्धा और बाजार के प्रति जवाबदेही, राज्य के एकाधिकार से कहीं तेजी से आगे बढ़ती है और अधिक मूल्य बनाती है।
इसका रोजगार के लिए क्या मतलब है अगर भारत बड़े पैमाने पर रोजगार और संपत्ति बनाना चाहता है, तो रास्ता निजी निवेश और उद्यमिता से होकर गुजरता है, जिसमें राज्य को व्यवसाय चलाने के हर पहलू में हस्तक्षेप से पीछे हटना होगा। रोजगार बजट की घोषणाओं से नहीं आता – वह तब आता है, जब पूंजी काम पर लगती है, जोखिम उठाया जात है और उद्यम बड़े होते हैं। सरकारी रोजागर कभी भी भारत की जनसांख्यिकीय जरूरत जितनी संख्या को समेट नहीं सकता; निजी निवेश यह कर सकता है, अगर उसे मौका दिया जाए।

मानसिकता बदलने की जरूरत

इसका एक हिस्सा सांस्कृतिक भी है। बहुत सारे युवा भारतीय और उनके परिवार, अब भी सरकारी नौकरी को सोने का मानक मानते हैं — सुरक्षित, सम्मानजनक, पेंशन वाली, लेकिन यह सुरक्षा अब ज्यादा से ज्यादा काल्पनिक होती जा रही है। कई राज्य सरकारें पहले ही अपने बजट के बोझ तले वेतन देने और पेंशन दायित्व निभाने में संघर्ष कर रही हैं। ‘सुरक्षित’ सरकारी नौकरी उतनी सुरक्षित नहीं है, जितनी उसकी छवि बताती है। इसी बीच, निजी क्षेत्र के पास ऐसे लोगों की कमी है, जिन्हें वाकई नौकरी पर रख सकेे। यहीं शिक्षा और उद्योग को कदम से कदम मिलाकर चलना होगा — ऐसे पाठ्यक्रम और प्रशिक्षण की राहें बनानी होंगी जो सिर्फ डिग्रीधारी नहीं, बल्कि एआई-युग की अर्थव्यवस्था के लिए तैयार कामगार बनाएं। कौशल विकास, अप्रेंटिसशिप और उद्योग संरेखित शिक्षा – इस वक्त सरकारी भर्ती अभियानों के एक और दौर के वादों से कहीं ज्यादा मायने रखते हैं। भारत के सामने चुनाव नौकरी बनाम कोई नौकरी नहीं है। यह एक ऐसी अर्थव्यवस्था के बीच है जो राज्य पर निर्भरता गढ़ती है और एक ऐसी अर्थव्यवस्था के बीच जो उद्यमिता के जरिए अवसर गढ़ती है।


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