सच्चे मन से सेवा करना

By: Aug 29th, 2026 12:15 am

स्वामी विवेकानंद
गतांक से आगे…
नरेंद्र ने पागलों की भांति नाव में सवार होकर महर्षि से एकदम पूछा, महाश्य क्या आपने ईश्वर को देखा है? महर्षि उस समय इस सवाल का जवाब देने के मूड में नहीं थे, कुछ देर बाद बोले, तुम्हारी आंखें बिलकुल योगी की तरह हैं। तुम्हारे शरीर में भी योगियों जैसी निशानियां हैं। सच्चे मन से सेवा करोगे, तो तुम्हें सत्य की प्राप्ति होगी। महर्षि की बात का नरेंद्र के मन पर काफी असर हुआ। यही नहीं, उन्होंने निरामिष और परिमित भोजन, भूमि पर सोना, सफेद धोती और चादर की वेशभूषा आदि बाह्य शारीरिक कठोरता का भी अवलंबन किया। वो अपने मकान के पास मातामयी के किराये के एक कमरे में रहने लगे। यहां पर एकांत में उनके साधन भजन में सुविधा होती थी। घरवाले समझते थे कि भीड़-भाड़ में पढ़ाई में परेशानी होती है, इसलिए नरेंद्र घर पर नहीं रहना चाहते। पुत्र की आजादी में हस्तक्षेप करने के अनिइच्छुक विश्वनाथ जी ने भी इसके लिए कभी नहीं टोका था। इसलिए नरेंद्र एकांत में अध्ययन, संगीत की चर्चा आदि करने के बाद शेष समय साधन भजन में गुजारते थे। इस तरह दिन पर दिन बीतते गए, लेकिन सत्य की तलाश और सत्य को जानने की नरेंद्र की इच्छा तृप्त तो नहीं हुई, अपितु अधिकारिक बढऩे लगी। धीरे-धीरे उन्होंने समझ लिया कि अतींद्रिय सत्य को प्रत्यक्ष करने के लिए एक ऐसे व्यक्ति के चरणों के पास बैठकर शिक्षा लाभ करना आवश्यक है। जिसने खुद सच का साक्षात्कार किया हो। उन्होंने अपने मन प्राण से यह तो निश्चय कर लिया कि इसी जीवन में सत्य को हासिल करना होगा। उन्होंने सोचा अगर ऐसा न हो सका तो इसी की शिखा में वह अपने प्राण दे देंगे।

ऐसे अशांतिपूर्ण जीवन को जीने से क्या लाभ? अपने चारों तरफ के माहौल के बीच डूबे हुए पाश्चात्य दार्शनिकों की विचारधारा से क्षुब्ध, सद्गुरु की प्राप्ति के लिए बेचैन हो गए। एक बार कलकत्ता के शिमला मोहल्ले में सुरेंद्रनाथ बंद्योपाध्याय अपने घर श्री रामकृष्ण देव को ले आए। सुरेंद्र ने कालेज के अध्यापक हेस्टी साहब के मुख से श्री रामकृष्ण देव का नाम सुन रखा था और उन्हें केश्वचंद सेन के शास्त्र एवं उनके द्वारा संचालित पत्रिका आदि से श्री रामकृष्ण के संबंध में कई बातें ज्ञात हुई। इस जानकारी के फलस्वरूप नरेंद्र श्री रामकृष्ण से मिलने के लिए तैयार रहते थे। उनके सामने एक नई मुसीबत आन खड़ी हुई। परीक्षा खत्म होते ही उनके पिता उनसे विवाह की जिद करने लगे। उन्होंने किसी संपन्न परिवार की कन्या से उनका विवाह तय कर दिया। लडक़ी थोड़ी सांवली थी,इसलिए उन्होंने दहेज में 20 हजार रुपए देने का वादा किया, सुनते ही नरेंद्र ने उनका विरोध किया। उन्होंने दृढ़तापूर्वक स्पष्ट उत्तर दिया। मैं किसी भी हालत में शादी नहीं करूंगा। किसी की व्यक्तिगत स्वाधीनता में हस्तक्षेप करना विश्वनाथ बाबू की प्रकृति के विरुद्ध था। उन्होंने स्वयं तो पुत्र से अनुरोध नहीं किया, लेकिन दूसरे स्वजन के द्वारा नरेंद्र की सम्मति लेने का प्रयत्न किया।

श्रीरामकृष्ण देव के गृही भक्तों में अत्यंत प्रसिद्ध भक्त डाक्टर रामचंद्र दत्त विश्वनाथ बाबू के घर में ही लालित पालित हुए थे। वो दूर के रिश्ते से इनके संबंधी थे। एक बार इन्होंने विवाह की आलोचना करते हुए उनके सामने यह बात रख दी, तब वे नरेंद्र की युक्तियों को सुनकर बोले, भाई अगर यथार्थ धर्म लाभ करना और सत्य की प्राप्ति ही तुम्हारा उद्देश्य है, तो ब्रह्मसमाज आदि स्थानों में न जाकर दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्ण देव के पास चले जाओ। सन् 1881 के दिसंबर के महीने में नरेंद्र ने दक्षिणेश्वर जाने की बात सोची। तब उनके पड़ोसी सुरेंद्र ने अपनी गाड़ी में उनको चलने के लिए कहा। नरेंद्र अपने कुछ दोस्तों के साथ दक्षिणेश्वर पहुंच गए और गंगा की तरफ खुलने वाले दरवाजे से उन्होंने अपने साथियों के साथ ही रामकृष्ण के कक्ष में प्रवेश किया। उन्हें देखते ही श्रीरामकृष्ण ने फर्श पर बिछी चटाई पर बैठने को कहा। -क्रमश:


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