बाबा नीब करौरी का हिमाचल से गहरा नाता, यहां के जंगल में किया था तप, आज मौजूद है संकटमोचन मंदिर
इन दिनों थिएटर से लेकर सोशल मीडिया तक एक फिल्म के चर्चे खूब हो रहे हैं। ये फिल्म है ‘हनुमान अंश’, जिसे बाबा नीब करौरी की बायोपिक के तौर पर देखा जा रहा है। जिन्हे बहुत से लोग नीम करौली नाम से भी जानते हैं। महज करीब 2 करोड़ रुपये के बजट में बनी इस फिल्म की कमाई 55 करोड़ रुपये के आसपास पहुंचने की बात कही जा रही है, नीब करौरी बाबा को साधारण संत नहीं बल्कि हनुमान जी के अवतार के रूप में देखा जाता है। यूं तो बाबा नीब करौरी के लाखों भक्त न सिर्फ भारत बल्कि विदेशों में भी हैं, जो बाबा को श्रद्धा से मानते हैं और उनके बताए रास्ते पर चलते हैं। Steve Jobs और Mark Zuckerberg जैसे नामों का भी उनके जीवन और विचारों से जुड़ाव बताया जाता है। इनके अलावा विराट कोहली समेत कई खिलाड़ी, राजनेता, फिल्मी हस्तियां भी उनके अनन्य भक्त हैं, लेकिन फिल्म ‘हनुमान अंश’ के बाद बाबा के जीवन और उनकी साधना को जानने की लोगों की उत्सुकता और बढ़ गई है। यही वजह है कि अब बड़ी संख्या में लोग बाबा से जुड़े धामों और उनकी तपोस्थलियों के बारे में जानना चाहते हैं।
बाबा नीब करौरी का सबसे प्रसिद्ध धाम उत्तराखंड के नैनीताल जिले में स्थित कैंची धाम है, हालांकि बरसात के मौसम में यहां पहुंचना थोड़ा मुश्किल हो जाता है। बारिश के दौरान लैंडस्लाइड, नदी-नालों का जलस्तर बढ़ने, ट्रैफिक जाम और सड़क से जुड़ी दूसरी परेशानियों का सामना श्रद्धालुओं को करना पड़ सकता है। लेकिन आपको ये जानकर हैरानी होगी कि बाबा नीब करौरी का नाता सिर्फ उत्तराखंड से नहीं, बल्कि हिमाचल की धरती से भी बेहद खास रहा है। हिमाचल में भी एक ऐसी जगह मौजूद है, जहां बाबा ने साधना की थी और भगवान हनुमान का मंदिर बनाने का संकल्प लिया था। आज यही स्थान शिमला के प्रसिद्ध संकटमोचन मंदिर के रूप में हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है।
शिमला से करीब पांच किलोमीटर दूर तारादेवी के पास पहाड़ी पर बना संकटमोचन मंदिर आज भले ही भव्य रूप में नजर आता है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस जगह की कहानी करीब सात दशक पुरानी है। बताया जाता है कि करीब 1950 के आसपास बाबा नीब करौरी इस शांत और एकांत स्थान पर पहुंचे थे। उस समय यहां मंदिर नहीं, बल्कि घना जंगल हुआ करता था। बाबा ने यहां कुछ दिनों तक साधना और ध्यान किया। इस जगह की प्राकृतिक शांति और आध्यात्मिक वातावरण ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि उन्होंने अपने भक्तों के सामने इसी स्थान पर भगवान हनुमान का मंदिर बनाने की इच्छा जाहिर की। यही इच्छा आगे चलकर संकल्प बनी और फिर इस संकल्प ने मंदिर का रूप लिया।
बताया जाता है कि वर्ष 1962 में तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर राजा बजरंग बहादुर सिंह, बाबा के भक्त भगवान सहाय और अन्य लोगों ने मंदिर निर्माण की दिशा में कदम बढ़ाया। इसके बाद आखिरकार 21 जून 1966 को मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा हुई और जंगल के बीच बाबा की कल्पना किया गया हनुमान धाम श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बन गया। मंदिर परिसर में भगवान हनुमान के अलावा श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण और भगवान शंकर के मंदिर भी मौजूद हैं। इतना ही नहीं, मंदिर परिसर में 90 के दशक में बाबा नीब करौरी को समर्पित एक छोटा मंदिर भी बनाया गया। यानी शिमला का संकटमोचन मंदिर सिर्फ भगवान हनुमान की भक्ति का केंद्र नहीं, बल्कि बाबा नीब करौरी की साधना और उनके संकल्प की कहानी को भी अपने भीतर समेटे हुए है। बाबा नीब करौरी का जीवन भगवान हनुमान की भक्ति और सेवा से गहराई से जुड़ा रहा।
उन्होंने देश के अलग-अलग हिस्सों में साधना की और हनुमान भक्ति को जन-जन तक पहुंचाया। कहा जाता है उन्होनें देश भर में कैंची धाम के अलावा 108 हनुमान मंदिरों का निर्माण करवाया था, उनके जीवन से जुड़ी कई चमत्कारिक कथाएं आज भी उनके भक्तों के बीच प्रचलित हैं यही वजह है कि आज भी वो स्थान जहां जहां बाबा ने तपस्या की थी वहां पहुंचने वाले श्रद्धालु सिर्फ दर्शन ही नहीं करते, बल्कि वहां एक अलग तरह की शांति और आध्यात्मिक अनुभूति महसूस करने की बात भी कहते हैं। शिमला की वादियों में मौजूद संकटमोचन मंदिर भी बाबा की इसी आस्था और साधना की एक ऐसी कहानी है, जिसके बारे में शायद बहुत कम लोग जानते हैं। यहां की पहाड़ियों में बाबा नीम करौली की साधना और उनके संकल्प की कहानी भी छिपी है। खैर आप हमें कमेंट करके जरूर बताइए कि क्या आप शिमला के इस ऐतिहासिक संकटमोचन मंदिर में गए हैं और अगर आपने ‘हनुमान अंश’ फिल्म देखी है तो बाबा नीब करौरी पर बनी इस फिल्म के बारे में आपकी क्या राय है।
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