छिमा बडऩ को चाहिए…
सच यह है कि क्षमा करना और आत्मसम्मान खो देना दो अलग बातें हैं। हम किसी को क्षमा करके भी उससे दूरी बनाए रख सकते हैं। हम उसके प्रति दुर्भावना छोड़ सकते हैं, लेकिन विवेक नहीं। जीवन हमें केवल प्रेम करना ही नहीं सिखाता, बल्कि यह भी सिखाता है कि किससे कितनी निकटता रखनी है। इसलिए क्षमा का अर्थ भूल जाना नहीं, बल्कि सीख लेकर आगे बढ़ जाना है। क्षमा करने वाले लोग जीवन की कठिन परिस्थितियों में अधिक संतुलित रहते हैं। इसका कारण यह नहीं कि उनके जीवन में समस्याएं कम होती हैं, बल्कि यह है कि वे अपने भीतर अनावश्यक बोझ जमा नहीं होने देते। जैसे हम अपने घर का कूड़ा प्रतिदिन बाहर निकालते हैं, वैसे ही समय-समय पर मन का कूड़ा भी बाहर निकालना आवश्यक है। यदि हम वर्षों तक मन में अपमान, प्रतिशोध और कटु स्मृतियां जमा करते रहेंगे, तो वहां खुशी, सृजन और प्रेम के लिए स्थान नहीं बचेगा…
हम सबके जीवन में कोई न कोई ऐसा व्यक्ति अवश्य आता है जिसने हमें कभी गहरा दुख दिया हो। किसी ने विश्वास तोड़ा, किसी ने अपमान किया, किसी ने धोखा दिया, किसी ने हमारी मेहनत का श्रेय ले लिया, किसी ने पीठ पीछे वार किया। अक्सर उस क्षण भीतर एक संकल्प जन्म लेता है कि मैं इसे कभी माफ नहीं करूंगा। उस समय यह निर्णय हमें न्यायपूर्ण लगता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो हम सामने वाले को दंड दे रहे हों। लेकिन जरा ठहरकर देखें कि क्या सचमुच उसे दंड मिलता है, या हम उसी घटना को अपने भीतर बार-बार दोहराकर स्वयं को ही सजा देते रहते हैं? जिसने हमें दु:ख दिया, वह शायद अपनी दुनिया में आगे बढ़ चुका है, लेकिन हम वर्षों बाद भी उसी घटना को याद करके उतना ही व्यथित हो जाते हैं। तब प्रश्न उठता है कि कैदी कौन है? वह व्यक्ति या हमारा अपना मन? जिसे हम सजा देना चाहते हैं, आखिर उसका जहर हम स्वयं क्यों पीते हैं? दरअसल, क्षमा का प्रश्न दूसरे से पहले स्वयं से जुड़ा हुआ है। पहले माना जाता था कि क्रोध और प्रतिशोध स्वाभाविक प्रतिक्रियाएं हैं और समय के साथ अपने आप समाप्त हो जाती हैं। अब मनोविज्ञान मानता है कि यदि हम किसी पीड़ादायक घटना को बार-बार याद करते हैं, तो हमारा मस्तिष्क उस घटना को हर बार लगभग उसी तीव्रता से अनुभव करता है। घटना अतीत में घटी लेकिन उसका प्रभाव वर्तमान में जीवित रहता है।
हम सोचते हैं कि हमने उस व्यक्ति को अपने जीवन से निकाल दिया, जबकि सच यह है कि हमने उसे हमेशा के लिए अपने मन में जगह दे दी। अगर कभी किसी ने हमारा अपमान कर दिया तो घटना तो पांच मिनट में समाप्त हो गई, लेकिन अगर हम उसी शाम घर पहुंचकर उसे याद करते हैं, तो हम उसे दूसरी बार जीते हैं। अगले सप्ताह किसी मित्र को वह घटना सुनाते हैं, तो तीसरी बार जीते हैं। वर्षों बाद भी यदि उसी प्रसंग पर भीतर कड़वाहट उठती है, तो हम स्वयं ही उस घटना को सैकड़ों बार जी रहे हैं। जब हम क्रोध, अपमान या प्रतिशोध की भावना में बार-बार डूबते हैं तो मस्तिष्क हमें तनाव की अवस्था में ले जाता है। यदि यह स्थिति बार-बार या लंबे समय तक बनी रहे, तो उसका प्रभाव मन और शरीर, दोनों पर पड़ता है। नींद प्रभावित हो सकती है, रक्तचाप बढ़ सकता है, और धीरे-धीरे हम छोटी-छोटी बातों पर भी चिड़चिड़े हो सकते हैं। मन और शरीर अलग संसार नहीं हैं, दोनों निरंतर एक-दूसरे को प्रभावित करते रहते हैं। इस प्रकार क्षमा न करके हम खुद अपने ही शिकार बन जाते हैं। क्षमा का अर्थ भूल जाना नहीं है। क्षमा का अर्थ अन्याय को सही ठहराना भी नहीं है। किसी ने विश्वास तोड़ा है, तो भविष्य में हम अधिक सावधानी बरतेंगे। क्षमा का अर्थ यह भी नहीं कि हम हर संबंध को पहले जैसा बना लें। क्षमा का वास्तविक अर्थ यह है कि हम अपने मन को उस घटना की कैद से मुक्त कर दें। हम यह समझ लें कि जो हो चुका, उसे बदला नहीं जा सकता, लेकिन उसके कारण अपना वर्तमान और भविष्य नष्ट न करें। क्षमा दूसरे के लिए नहीं, खुद अपने लिए एक उपहार है। क्षमा पर दुनिया के अनेक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों और चिकित्सा संस्थानों ने गंभीर शोध किए हैं। इनमें स्टैनफोर्ड फॉरगिवनेस प्रोजेक्ट, मायो क्लिनिक और जॉन्स हॉपकिन्स मेडिसिन के अध्ययन विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन शोधों का सामान्य निष्कर्ष यह है कि जो लोग क्षमा कर देते हैं, उनमें तनाव कम होता है, रक्तचाप नियंत्रित रहता है, नींद बेहतर होती है, चिंता और अवसाद के लक्षण घटते हैं तथा संबंधों में सुधार आता है।
आधुनिक विज्ञान अब उसी सत्य की पुष्टि कर रहा है, जिसे संतों और दार्शनिकों ने सदियों पहले अपने अनुभव से जाना था। हां, यह कहना भी उचित नहीं है कि क्षमा करना हमेशा आसान है। कई बार इसमें वर्षों लग जाते हैं। क्षमा एक निर्णय से अधिक एक प्रक्रिया है। पहले हम घटना को स्वीकार करते हैं, फिर अपने भीतर उठने वाले क्रोध को पहचानते हैं, फिर यह समझते हैं कि यह क्रोध सबसे अधिक हमें ही जला रहा है, और अंतत: एक दिन हम उस बोझ को नीचे रख देने का साहस जुटा लेते हैं। क्षमा का अर्थ यह नहीं कि घाव कभी था ही नहीं, इसका अर्थ यह है कि अब वह घाव हमारे जीवन की दिशा तय नहीं करेगा। भारतीय दर्शन और श्रीमद्भगवद्गीता बार-बार हमें समत्व की ओर ले जाते हैं। बाहरी परिस्थितियों से अधिक महत्व इस बात का है कि भीतर क्या घट रहा है। मुक्ति का अर्थ केवल जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति नहीं, बल्कि उन मानसिक बंधनों से भी मुक्ति है जो हमें वर्तमान में जीने नहीं देते। क्षमा कायरता नहीं है। क्षमा के लिए साहस चाहिए। हमें अपने अहंकार से भी ऊपर उठना पड़ता है। कई बार हमें लगता है कि यदि हमने माफ कर दिया, तो हमारी हार हो जाएगी, जबकि हार तब होती है जब हमारा मन वर्षों तक उसी व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमता रहता है। जीत तब होती है जब हम अपने मन की बागडोर फिर से अपने हाथ में ले लेते हैं। अक्सर हमें यह भय होता है कि लोग हमारी क्षमा को हमारी कमजोरी समझेंगे।
सच यह है कि क्षमा करना और आत्मसम्मान खो देना दो अलग बातें हैं। हम किसी को क्षमा करके भी उससे दूरी बनाए रख सकते हैं। हम उसके प्रति दुर्भावना छोड़ सकते हैं, लेकिन विवेक नहीं। जीवन हमें केवल प्रेम करना ही नहीं सिखाता, बल्कि यह भी सिखाता है कि किससे कितनी निकटता रखनी है। इसलिए क्षमा का अर्थ भूल जाना नहीं, बल्कि सीख लेकर आगे बढ़ जाना है। क्षमा करने वाले लोग जीवन की कठिन परिस्थितियों में अधिक संतुलित रहते हैं। इसका कारण यह नहीं कि उनके जीवन में समस्याएं कम होती हैं, बल्कि यह है कि वे अपने भीतर अनावश्यक बोझ जमा नहीं होने देते। जैसे हम अपने घर का कूड़ा प्रतिदिन बाहर निकालते हैं, वैसे ही समय-समय पर मन का कूड़ा भी बाहर निकालना आवश्यक है। यदि हम वर्षों तक मन में अपमान, प्रतिशोध और कटु स्मृतियां जमा करते रहेंगे, तो वहां खुशी, सृजन और प्रेम के लिए स्थान नहीं बचेगा। मन रूपी घर में क्या संभालकर रखना है और क्या फेंक देना है, यह निर्णय हम ही करेंगे। क्षमा किसी दूसरे को दिया गया पुरस्कार नहीं, अपने ही मन को दिया गया उपहार है। जब हम यह उपहार स्वयं को देंगे, तभी हमारे भीतर एक नया सवेरा जन्म लेगा। तब हमें अनुभव होगा कि खुशी अपने मन में ही खिलती है, और तब हम मुस्कुराकर कह सकेंगे कि हमने प्रसिद्ध कवि अब्दुर्रहीम खानखाना के दोहे ‘छिमा बडऩ को चाहिए’ को जीवन में उतार कर बड़प्पन दिखाया है, क्योंकि जीवन का सार भी इसी में है।
स्पिरिचुअल हीलर
हैपीनेस गुरु, डा. प्रमोद निर्वाण
गिनीज विश्व रिकॉर्ड से सम्मानित लेखक
ई-मेल: indiatotal.features@gmail.com
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