ये दुनिया उसी की, जमाना उसी का
कुछ छोटे-छोटे अभ्यास हमारा जीवन बदल सकते हैं। प्रतिदिन खुलकर हंसें। प्रकृति का आनंद लेने के लिए समय निकालें। जीवन के सभी उपहारों के लिए हर रोज शुक्रिया अदा करें। हर रोज कुछ न कुछ अच्छा होता ही है, उसके लिए शुक्रगुजार हों। तुलना को थोड़ा कम करें। कुछ नया सीखते रहें, कुछ नया करते रहें। कभी किसी की निस्वार्थ सहायता कर दें। सबसे बड़ी बात, परिवार के साथ बिना किसी स्क्रीन के बैठें और मोबाइल की स्क्रीन से अधिक जीवन के दृश्य देखें। धीरे-धीरे हम खुद-ब-खुद जान जाएंगे और अनुभव कर लेंगे कि आनंद खरीदा नहीं जाता, वह विकसित किया जाता है…
हम सब जीवन में कुछ न कुछ पाने की दौड़ में लगे हैं। कोई धन चाहता है, कोई पद, कोई प्रतिष्ठा, कोई सुरक्षा, तो कोई अमर होने जैसा नाम। लेकिन इस दौड़ में एक विचित्र विडंबना यह है कि हम में से अधिकांश लोग जीने की तैयारी करते-करते पूरा जीवन बिता देते हैं। हम घर बना लेते हैं, पर उसमें रहने का समय नहीं निकाल पाते। हम साधन जुटा लेते हैं, पर उनका आनंद नहीं ले पाते। हम भविष्य को सुरक्षित करने में इतने व्यस्त रहते हैं कि वर्तमान हमारी मु_ी में से रेत की तरह फिसल जाता है। शायद इसी कारण संसार में सुविधाएं बढ़ी हैं, लेकिन संतुष्टि नहीं। प्रश्न यह नहीं कि हमारे पास धन कितना, सोना कितना है, भवन कितने हैं, नौकर-चाकर कितने हैं, सुविधाएं कितनी हैं, प्रश्न यह है कि हम जो जीवन जी रहे हैं, इस जीवन में जो कुछ भी कर रहे हैं, उसे कितनी गहराई से जी पा रहे हैं। सच तो यह है कि संसार उस व्यक्ति का नहीं जिसके पास सबसे अधिक है, बल्कि उसका है जो जीवन का सबसे अधिक रस ले पाता है। इसीलिए यह आवश्यक है कि हम ‘आनंद’ शब्द का असली मतलब समझें। आनंद का अर्थ उच्छृंखल मनोरंजन या क्षणिक मौज-मस्ती नहीं है। आनंद का अर्थ है, वर्तमान क्षण के साथ पूरी सजगता से उपस्थित होना। एक कप चाय को केवल पीना नहीं, उसका स्वाद महसूस करना। वर्षा को केवल मौसम न मानना, बल्कि उसकी बूंदों की धुन सुनना। परिवार के साथ बैठना केवल औपचारिकता न हो, बल्कि आत्मीयता का उत्सव बने।
जीवन का आनंद उन्हीं को मिलता है जो अनुभवों को जीते हैं, केवल घटनाओं को घटित नहीं होने देते। जीवन से संघर्ष करने वाला व्यक्ति थक जाता है, जीवन के साथ सहयोग करने वाला व्यक्ति खिल उठता है। सवाल यह है कि बेशुमार धन, सारी सुविधाओं और सारे सुखों के बावजूद अक्सर हम आनंद से वंचित क्यों रह जाते हैं? इसका उत्तर बाहर नहीं, हमारे मन की संरचना में छिपा है। हम तुलना करते हैं, प्रतिस्पर्धा में उलझते हैं, ईष्र्या पालते हैं, भविष्य की चिंता करते हैं, अतीत का बोझ ढोते हैं और अपने निर्णय भी अक्सर इस आधार पर लेते हैं कि ‘लोग क्या कहेंगे?’ परिणाम यह होता है कि हमारा ध्यान जीवन पर नहीं, दूसरों के जीवन पर अधिक रहने लगता है। जिस क्षण तुलना शुरू होती है, उसी क्षण आनंद समाप्त हो जाता है, क्योंकि तुलना हमें हमारी कमी दिखाती है, जबकि आनंद हमें हमारे पास जो है, उसकी समृद्धि का अनुभव कराता है।
आधुनिक मनोविज्ञान और न्यूरोसाइंस भी अब इसी दिशा में संकेत कर रहे हैं। जब हमें कोई उपलब्धि मिलती है, तो मस्तिष्क में डोपामीन सक्रिय होता है। यह उत्साह देता है, लेकिन थोड़े समय के लिए। इसलिए अगली उपलब्धि की भूख जल्दी ही पैदा हो जाती है। इसके विपरीत सेरोटोनिन संतोष, आत्मविश्वास और मानसिक स्थिरता से जुड़ा है। यही कारण है कि उपलब्धियों से अधिक अर्थपूर्ण जीवन और स्वस्थ संबंध व्यक्ति को दीर्घकालिक प्रसन्नता देते हैं। सकारात्मक मनोविज्ञान के अग्रणी विद्वान मार्टिन सेलिगमैन ने भी अपने शोधों में दिखाया कि खुशी केवल सुखद अनुभवों से नहीं, बल्कि उद्देश्य, संबंध, उपलब्धि और अर्थपूर्ण जीवन से बनती है। सकारात्मक मनोविज्ञान के प्रमुख स्तभों में गिने जाने वाले विश्व प्रसिद्ध हंगेरियन-अमेरिकी मनोवैज्ञानिक मिहाई चिक्सेंटमिहाई ने ‘फ्लो स्टेट’ का सिद्धांत दिया, जिसमें व्यक्ति किसी सार्थक कार्य में इतना डूब जाता है कि समय का बोध भी कम हो जाता है। यही अवस्था आनंद के सबसे प्रामाणिक अनुभवों में से एक मानी जाती है। आज न्यूरोसाइंस यह भी प्रमाणित कर चुका है कि कृतज्ञता का नियमित अभ्यास मस्तिष्क के न्यूरल नेटवर्क को सकारात्मक दिशा में बदल सकता है। इसका अर्थ यह है कि धन्यवाद कहना केवल संस्कार नहीं, मस्तिष्क के लिए भी एक स्वस्थ अभ्यास है। आइये, अब हम खुद से ही पूछते हैं कि दुनिया वास्तव में किसकी है? क्या केवल सबसे अमीर व्यक्ति की? क्या सबसे शक्तिशाली की? क्या सबसे प्रसिद्ध की? यदि ऐसा होता, तो संसार के सभी धनवान सबसे अधिक प्रसन्न होते। वास्तविकता इसके विपरीत है। अगर सबसे अमीर, सबसे प्रसिद्ध और सबसे शक्तिशाली व्यक्ति ही खुशियां बांट सकता तो बिल गेट्स का अपनी पत्नी मेलिंडा गेट्स से अलगाव न होता, मेलिंडा गेट्स दुनिया के इस सर्वाधिक अमीरों में गिने जाने वाले और अत्यंत प्रसिद्ध व्यक्ति को छोडक़र उससे अलग न हो जाती। सच तो यह है कि दुनिया तो उसकी है जो सुबह उगते सूर्य को देखकर मुस्कुरा सकता है।
जिसकी आंखें वर्षा की पहली बूंदों में संगीत सुन लेती हैं। जिसे बच्चों की खिलखिलाहट किसी पुरस्कार से अधिक मूल्यवान लगती है। जिसे हवा का स्पर्श, पेड़ों की हरियाली और पक्षियों का कलरव अभी भी चमत्कार प्रतीत होता है। जिसके भीतर विस्मय जीवित है, उसी के भीतर आनंद भी जीवित है। भारतीय चिंतन सदियों से कहता आया है कि वर्तमान क्षण ही जीवन है। न बीता हुआ कल लौट सकता है, न आने वाला कल अभी अस्तित्व में है। आनंद कोई उपलब्धि नहीं, चेतना की एक अवस्था है। बाहर की परिस्थितियां हमेशा हमारे नियंत्रण में नहीं होंगी, लेकिन उन्हें देखने की दृष्टि अवश्य हमारे हाथ में है। जब दृष्टि बदलती है, तो वही संसार नया दिखाई देने लगता है। इसलिए परिवर्तन की शुरुआत बाहर से नहीं, भीतर से होती है। जीवन का मूल्य उसकी लंबाई में नहीं, बल्कि उसकी जीवंतता में है। सौ वर्ष तक बोझ ढोने से अच्छा है कि कुछ वर्ष पूरे होश, पूरे प्रेम और पूरे उत्साह से जिए जाएं। जीवन किसी दंड का नाम नहीं है। यह एक दुर्लभ अवसर है। उत्सव बाहर आयोजित नहीं होते, उत्सव देखने वाली दृष्टि में जन्म लेते हैं।
अगर हमने अपने भीतर उत्सव जगा लिया है तो हमारे लिए साधारण दिन भी असाधारण हो जाते हैं। कुछ छोटे-छोटे अभ्यास हमारा जीवन बदल सकते हैं। प्रतिदिन खुलकर हंसें। प्रकृति का आनंद लेने के लिए समय निकालें। जीवन के सभी उपहारों के लिए हर रोज शुक्रिया अदा करें। हर रोज कुछ न कुछ अच्छा होता ही है, उसके लिए शुक्रगुजार हों। तुलना को थोड़ा कम करें। कुछ नया सीखते रहें, कुछ नया करते रहें। कभी किसी की निस्वार्थ सहायता कर दें। सबसे बड़ी बात, परिवार के साथ बिना किसी स्क्रीन के बैठें और मोबाइल की स्क्रीन से अधिक जीवन के दृश्य देखें। धीरे-धीरे हम खुद-ब-खुद जान जाएंगे और अनुभव कर लेंगे कि आनंद खरीदा नहीं जाता, वह विकसित किया जाता है। अंतत: जीवन कोई परीक्षा नहीं, जिसमें हर समय स्वयं को सिद्ध करना पड़े। जीवन तो एक नृत्य है, एक संगीत है, एक उत्सव है। जीवन को पकडऩे की नहीं, उसके साथ बहने की आवश्यकता है। जिस दिन हम जीवन को भोग की वस्तु नहीं, बल्कि जीने का अनुपम अवसर समझ लेंगे, उसी दिन यह दुनिया सचमुच हमारी हो जाएगी। तब यह पंक्ति जीवन का शाश्वत सूत्र बन जाएगी और हम आह्लादित होकर आनंद में गा उठेंगे कि ‘ये दुनिया उसी की, जमाना उसी का, जो जी गया जीवन सच्ची खुशी का।’
स्पिरिचुअल हीलर
हैपीनेस गुरु डा. प्रमोद निर्वाण
गिनी•ा विश्व रिकॉर्ड से सम्मानित लेखक
ई-मेल: indiatotal.features@gmail.com
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