कुल्लू में सजता है देव संस्कृति का महाकुंभ, दशहरा उत्सव पर देवमिलन से जीवंत होती हैं सदियों पुरानी परंपराएं
कुल्लू घाटी की पहचान केवल इसकी प्राकृतिक सुंदरता, ऊंचे पर्वतों और बहती नदियों से नहीं है, बल्कि यहां की समृद्ध देव संस्कृति से भी है। यहां देवी-देवता केवल आस्था के प्रतीक नहीं, बल्कि आम जनजीवन, सामाजिक व्यवस्था और सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा हैं। इसी देव परंपरा का सबसे भव्य स्वरूप अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरे में देखने को मिलता है, जब घाटी के विभिन्न क्षेत्रों से देवी-देवता अपने रथों के साथ ढालपुर मैदान में एकत्रित होते हैं। ढोल-नगाड़ों की गूंज, पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन और देवलुओं की आस्था के बीच होने वाला यह देव मिलन कुल्लू की सदियों पुरानी परंपराओं को जीवंत कर देता है। श्रद्धालुओं के लिए यह अपने आराध्य देवता के दर्शन करने का अवसर होता है, जबकि देव समाज के लिए यह अपनी परंपराओं को निभाने और दूसरे देव समाजों से जुडऩे का महत्त्वपूर्ण समय होता है…
ढोल-नगाड़ों का विशेष महत्त्व
कुल्लू दशहरे की रौनक को पारंपरिक वाद्ययंत्रों के बिना पूरा नहीं माना जा सकता। यहां बजने वाले ढोल-नगाड़े, करनाल और नरसिंगे उत्सव के वातावरण को विशेष रूप देते हैं। दशहरा उत्सव पर इनकी गूंज के साथ जब देव रथ ढालपुर मैदान की ओर बढ़ते हैं, तो स्थानीय संस्कृति का जीवंत दृश्य सामने आता है।
कायम है परंपराओं का गौरव
समय के साथ कुल्लू में पर्यटन, यातायात और जीवनशैली में बदलाव आया है, लेकिन देव संस्कृति का महत्व आज भी कायम है। देश-विदेश से आने वाले पर्यटक यहां की प्राकृतिक सुंदरता के साथ देव रथों, पारंपरिक वेशभूषा, लोक वाद्ययंत्रों और धार्मिक परंपराओं को करीब से देखते हैं।
17वीं शताब्दी से शुरुआत
कुल्लू दशहरे का इतिहास 1637-1660 ईस्वी से जुड़ा है। उस समय कुल्लू में राजा जगत सिंह का शासन हुआ करता था और राजा को कुष्ठ रोग से मुक्ति मिलने पर इस मेले के आयोजन का ऐलान किया किया। इसमें राजा जगत सिंह की रियासत के साथ लगती अन्य रियासतों के देवी-देवताओं को भी निमंत्रण दिया गया और उत्सव में 365 देवी-देवताओं ने शिरकत की। उसके बाद यह उत्सव हर साल मनाया जाने लगा। वक्त के साथ उत्सव का स्वरूप बदला, जिसे 1972 में अंतरराष्ट्रीय उत्सव का दर्जा मिला।
देव मिलन, परंपराओं का संगम
कुल्लू दशहरे की सबसे विशिष्ट पहचान यहां होने वाला देव मिलन है। विभिन्न क्षेत्रों के देवी-देवताओं का एक ही स्थान पर एकत्र होना देव संस्कृति की सामूहिक परंपरा को दर्शाता है। हर देवता की अपनी मान्यताएं, परंपरा और अपना अलग देव समाज है। दशहरे में हर दृश्य के पीछे एक सांस्कृतिक अर्थ और हर परंपरा के पीछे सदियों का अनुभव दिखाई देता है। देव मिलन कुल्लू की सांस्कृतिक व्यवस्था का परिचायक है, जिसमें धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक संबंधों को भी विशेष स्थान दिया गया है।
भगवान नरसिंह की जलेब
अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरे में भगवान नरसिंह की जलेब का विशेष धार्मिक और ऐतिहासिक महत्त्व है। ढोल-नगाड़ों, करनाल और पारंपरिक देव वाद्ययंत्रों की गूंज के बीच निकलने वाली यह शोभायात्रा दशहरे के प्रमुख आकर्षणों में शामिल है। इस जलेब को स्थानीय स्तर पर ‘राजा की जलेब’ भी कहा जाता है। परंपरा के अनुसारए यह दशहरे के दूसरे दिन से निकलनी शुरू होती है और उत्सव के अंतिम दिनों तक जारी रहती है।
यह है जलेब का महत्त्व
स्थानीय देव परंपरा के अनुसार भगवान नरसिंह की जलेब को दशहरा उत्सव की सुरक्षा और मंगलकामना से जोडक़र देखा जाता है। मान्यता है कि यह यात्रा उत्सव में शामिल देव समाज और श्रद्धालुओं की रक्षा का प्रतीक है। जलेब में भगवान नरसिंह की घोड़ी का सबसे आगे चलना इसी परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह यात्रा कुल्लू की प्राचीन देव व्यवस्थाए राजपरिवार से जुड़ी परंपराओं और विभिन्न देव समाजों के आपसी जुड़ाव को भी दर्शाती है।
भगवान रघुनाथ की पहचान
कुल्लू दशहरे का धार्मिक केंद्र भगवान रघुनाथ जी हैं। कुल्लू के राजा जगत सिंह के शासनकाल में अयोध्या से भगवान रघुनाथ जी की प्रतिमा लाई गई थी। इसके बाद भगवान रघुनाथ जी को कुल्लू रियासत का प्रमुख आराध्य माना जाने लगा। दशहरे के दौरान भगवान रघुनाथ जी की रथयात्रा प्रमुख आकर्षण होती है। विभिन्न क्षेत्रों से आए देवी-देवता उनके प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करने पहुंचते हैं।
माता हिडिंबा का विशेष स्थान
मनाली के ढुंगरी मंदिर में विराजमान माता हिडिंबा कुल्लू की प्रमुख आराध्य देवी हैं। स्थानीय मान्यताओं में उन्हें कुल्लू राजपरिवार की दादी के रूप में विशेष सम्मान प्राप्त है। कुल्लू दशहरे की परंपराओं में भी माता हिडिंबा की महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है। माता हिडिंबा का महत्त्व उनकी धार्मिक प्रतिष्ठा और राजपरिवार से जुड़े ऐतिहासिक संबंधों के कारण है। दशहरे में माता हिडिंबा की अपनी विशिष्ट भूमिका है।
कुल्लू घाटी के प्रमुख देवताओं में बिजली महादेव की भूमिका
कुल्लू घाटी के प्रमुख देवताओं में बिजली महादेव का नाम भी महत्त्वपूर्ण है। ऊंची पहाड़ी पर स्थित बिजली महादेव का मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र है। बिजली महादेव से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं और स्थानीय देव परंपराएं कुल्लू की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं। दशहरे में शामिल होने वाले अन्य देवी-देवताओं की तरह बिजली महादेव का भी अपना देव समाज और पारंपरिक महत्त्व है। उनके धार्मिक क्षेत्र और मंदिर से जुड़े विषयों पर समय-समय पर स्थानीय स्तर पर चर्चा भी होती रही है।
अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरे में दूर-दूर से आते हैं सैकड़ों देवी-देवता
अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरे में केवल प्रमुख देवता ही नहीं, बल्कि घाटी के अनेक गांवों और क्षेत्रों से देवी-देवता भाग लेने पहुंचते हैं। देवता नरसिंह, आदि ब्रह्मा, विभिन्न नाग देवता, नारायण और स्थानीय देवी-देवताओं की उपस्थिति इस उत्सव को व्यापक स्वरूप देती है। प्रत्येक देवता की अपनी परंपराए मान्यता और धार्मिक प्रतिष्ठा होती है। इसलिए देव संस्कृति में सभी देवी-देवताओं को उनके अपने क्षेत्र और देव समाज की मान्यताओं के अनुसार सम्मान दिया जाता है।
देवभूमि की आत्मा है देव मिलन, दिखती है देव संस्कृति की झलक
अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरे में देवी-देवताओं का महामिलन इस बात का प्रतीक है कि यहां की संस्कृति की जड़ें कितनी गहरी हैं। ढालपुर मैदान में एकत्र होते देव रथ, पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज और श्रद्धालुओं की आस्था मिलकर ऐसा दृश्य प्रस्तुत करते हैं, जिसमें कुल्लू की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत एक साथ दिखाई देती है। कुल्लू दशहरे की असली विशेषता केवल इसकी भव्यता या अंतरराष्ट्रीय पहचान नहीं, बल्कि वह जीवंत देव संस्कृति है, जो गांवों से लेकर घाटी के प्रमुख आयोजनों तक लोगों को जोड़ती है।
घाटी के कई गांवों से ढालपुर पहुंचती है आस्था की यात्रा
कुल्लू घाटी के अनेक क्षेत्रों में देवी-देवताओं के साथ दशहरे में शामिल होने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। कई देव समाज अपने गांवों से पारंपरिक तरीके से यात्रा कर उत्सव में भाग लेने पहुंचते हैं। पहाड़ी रास्तों से होकर आने वाले देव रथ इस आयोजन को और भी विशेष बना देते हैं। इन यात्राओं में देवता के साथ चलने वाले लोगों की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है। दशहरे में शामिल होना कई लोगों के लिए केवल धार्मिक कत्र्तव्य नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान से जुडऩे का अवसर भी है।
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