जज का निष्पक्ष होना जरूरी, उदासीन नहीं, जस्टिस विक्रम की टिप्पणी, अगले CJI बनने की कतार में सबसे आगे
दिव्य हिमाचल ब्यूरो, नई दिल्ली
देश की अदालतों को न्याय का मंदिर माना जाता है। ऐसे में न्याय की पीठ पर बैठेने वाले जजों के ऊपर बहुत बड़ा दायित्व होता है, न्याय की निष्पक्षता का। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ ने भी न्यायिक प्रक्रिया में निष्पक्षता और मानवीय संवेदना के बीच संतुलन की जरूरत बताई है। जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि जज का निष्पक्ष होना जरूरी है, लेकिन इसका अर्थ मानवीय परिस्थितियों से उदासीन होना नहीं है। नई दिल्ली में दूसरे प्रो. (डा.) एनआर माधव मेनन मेमोरियल लेक्चर में उन्होंने न्यायिक प्रक्रिया में मानवीय संवेदना की भूमिका पर बात की। उन्होंने स्पष्ट किया कि संवेदना का मतलब किसी पक्ष के प्रति पक्षपात या नरमी बरतना नहीं है। जस्टिस विक्रम नाथ के मुताबिक जज को फैसला करते समय यह नहीं देखना चाहिए कि उसके सामने कौन व्यक्ति खड़ा है, लेकिन उसे मामले से जुड़े मानवीय पहलुओं को समझना चाहिए।
उन्होंने लेडी जस्टिस की आंखों पर बंधी पट्टी का उदाहरण देते हुए कहा कि इसका अर्थ यह नहीं है कि न्याय व्यवस्था देख नहीं सकती। उनका संदेश था कि न्यायाधीश को निष्पक्ष रहना चाहिए, लेकिन किसी व्यक्ति की परिस्थितियों के प्रति उदासीन नहीं होना चाहिए। जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि अदालतों को यह भी देखना चाहिए कि न्यायिक प्रक्रिया से गुजरने वाले लोगों को न्याय वास्तव में कैसा महसूस होता है। उन्होंने यौन हिंसा से बचे व्यक्ति के गवाही के दौरान दोबारा ट्रॉमा झेलने और ऐसी भाषा में कार्यवाही होने की स्थिति का उदाहरण दिया, जिसे कोई वादकारी समझ नहीं पाता। इसलिए न्याय मिलने के साथ-साथ न्यायिक प्रक्रिया को समझने योग्य और मानवीय बनाना भी महत्त्वपूर्ण है।
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