Hamirpur News : हमीरपुर में गरीब और बेघरों के लिए बने थे फ्लैट, आज डाक्टरों के आ रहे काम
आईएचएसडीपी के तहत केंद्र से साढ़े चार करोड़ का आया था प्रोजेक्ट, योजना सिरे नहीं चढ़ी, तो मेडिकल कालेज के हवाले किए
नीलकांत भारद्वाज-हमीरपुर
जिला मुख्यालय हमीरपुर के पास बहती हथली खड्ड के किनारे गरीबों और बेघर लोगों को छत मुहैया करवाने के उद्देश्य से बनाई गई योजना का अजीबों-गरीब अंत हुआ। जिन फ्लैटों का निर्माण शहर के स्लम क्षेत्रों में रहने वालों या बेघर परिवारों के लिए किया गया था, आज उनमें ‘डाक्टर’ रह रहे हैं। करोड़ों रुपए खर्च कर तैयार की गई चार मंजिला इमारत के ज्यादातर फ्लैट खाली पड़े हैं। हालत यह है कि इमारत में जाले जम चुके हैं और छत पर घास उग आई है। जानकारी के मुताबिक लगभग 15 साल पहले इन फ्लैटों का निर्माण केंद्र सरकार की इंटीग्रेटेड हाउसिंग एंड स्लम डिवलपमेंट प्रोग्राम (आईएचएसडीपी) योजना के तहत किया गया था। हमीरपुर की तत्कालीन नगर परिषद ने इसके लिए जमीन मुहैया करवाई थी और हिमुडा ने ये फ्लैट बनाए थे। केंद्र सरकार से इस प्रोजेक्ट के लिए करीब साढ़े चार करोड़ रुपए जारी किए गए थे।
योजना के तहत कुल लागत का 80 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार, 10 प्रतिशत नगर परिषद और शेष 10 प्रतिशत लाभार्थियों को देना था। प्रत्येक लैट करीब दो लाख 80 हजार रुपए में आबंटित करने की योजना थी। इसका मकसद आर्थिक रूप से कमजोर और बेघर लोगों को अपना आशियाना उपलब्ध करवाना था। बताते चलें कि वर्ष 2005 में केंद्र सरकार द्वारा इंटीग्रेटेड हाउसिंग एंड स्लम डिवेलपमेंट प्रोग्राम लॉन्च किया गया था। इस प्रोजेक्ट में बाद में प्रदेश से जिला हमीरपुर को भी शामिल किया गया। -एचडीएम
सर्वे में नहीं मिला था कोई स्लम और बेघर
फ्लैट बनकर तैयार हो गए लेकिन योजना के सामने सबसे बड़ी समस्या उस समय खड़ी हो गई, जब नगर परिषद के सर्वे में शहर में कोई भी ऐसा परिवार नहीं मिला, जिसे स्लम क्षेत्र में रहने वाला या बेघर श्रेणी में रखा जा सके। ऐसे में सवाल उठा कि आखिर इन फ्लैटों का आबंटन किसे किया जाए। अधिकारियों के सामने यह चिंता भी थी कि यदि फ्लैट बाहरी लोगों को दिए गए, तो वे भविष्य में इन्हें अधिक कीमत पर बेच सकते हैं। इसी असमंजस के चलते योजना अपने मूल उद्देश्य के अनुरूप सिरे नहीं चढ़ पाई।
श्मशानघाट के पास होने से भी खाली रहते हैं फ्लैट
स्थानीय स्तर पर इन लैटों के फ्रंट पोर्शन के खाली रहने की एक वजह पास में श्मशानघाट का होना भी बताई जाती है। दरअसल लैटों के ठीक सामने हथली खड्ड पर शहर का एकमात्र और सबसे बड़ा शमशानघाट भी है।
मेडिकल कालेज को सौंपने पड़े फ्लैट
जब 2018 में यहां मेडिकल कालेज शुरू हुआ तो नगर परिषद ने इन लैटों को उनके हवाले कर दिया। इसके बाद यहां हैल्थ डिपार्टमेंट के जूनियर डाक्टरों और अन्य स्टाफ को रहने की सुविधा मिली। हालांकि, कुल 70 लैटों में से करीब आधे ही आबाद हो पाए हैं, जबकि बाकी लैट खाली पड़े हैं।
बेहतर उपयोग के लिए क्या कदम उठाए जाएं
यह मामला सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत को सामने लाता है। जिस परियोजना का उद्देश्य गरीबों और बेघर परिवारों को सुरक्षित छत देना था, उसका लाभ जरूरतमंदों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाया। अब सवाल यह है कि करोड़ों रुपए खर्च करने के बावजूद जब फ्लैटों का पूरा इस्तेमाल नहीं हो रहा, तो खाली पड़े आवासों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे?
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