…तो ऐसे निकलेंगे चैंपियन खिलाड़ी?

By: Oct 16th, 2026 12:05 am

जब चिट्टे जैसे नशे ने युवाओं को अपनी पकड़ में ले लिया है, ऐसे में खेल ही नशे से विद्यार्थियों को दूर रख सकता है…

हिमाचल प्रदेश में अभी तक वह वातावरण ही नहीं बन पा रहा है जिससे हम अपने स्टार खिलाडिय़ों का पलायन रोक सकें। जब खिलाड़ी को सुविधा नहीं मिलेगी तो उसे फिर कैसे रोका जा सकता है। कोई भी पढ़ाई या परीक्षा पहले अपने लिए, फिर देश के लिए, मगर खेल केवल व केवल देश के लिए होता है। वहां जब खिलाड़ी जीतता है तो उस देश का झंडा सबसे ऊपर उठता है और उस देश की धुन पूरा विश्व आदर के साथ सुनता है। हिमाचल में ओलंपियन व एशियाई पदक विजेता मुक्केबाज आशीष चौधरी को उसका विभाग प्रशिक्षण के लिए फ्री नहीं रख रहा था। बहुत प्रयास करने बाद ही उसे प्रशिक्षण के लिए भेजा। खेल में अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने के लिए आठ से दस साल का लगातार प्रशिक्षण कार्यक्रम चाहिए होता है।

अगर हम एक सप्ताह भी खेल प्रशिक्षण में बाधा डालते हैं तो फिर हम उसे बहुत ही कठिनाई से पूरा कर पाते हैं। इसलिए केंद्र व राज्य सरकारों के विभाग अपने राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय खिलाडिय़ों के प्रशिक्षण समय को आन ड्यूटी मानते हैं, चाहे खिलाड़ी कैंप हो या किसी भी ट्रेनिंग सेंटर में। ऐसा प्रावधान सेवा नियमों में भी प्रेजिडेंट महोदय ने रखा है। हिमाचल प्रदेश के विभिन्न विभागों के कई मुखिया पता नहीं किस पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं जो देश के झंडे से जुड़े हुए इस विषय में भी नकारात्मक सोच रखते हैं। जो खिलाड़ी राष्ट्रीय, एशियाई प्रतियोगिताओं में पदक जीत कर ओलम्पिक तक भारत का प्रतिनिधित्व कर चुका है, अगर उसे ही अपना प्रशिक्षण जारी रखने के लिए सरकार व विभाग की मिन्नतें करनी पड़ रही हैं तो फिर आम खिलाड़ी का क्या होगा? हिमाचल सरकार को चाहिए कि ओलंपिक, एशियाई व राष्ट्रमंडल खेलों को देखते हुए खिलाडिय़ों को ट्रेनिंग के लिए फ्री रखा जाए, जैसा केंद्र व राज्यों के विभाग अपने अंतरराष्ट्रीय खिलाडिय़ों को रखते हैं।

हिमाचल में महिला कबड्डी, हैंडबाल व अन्य कई खेलों में अच्छे राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी हैं। उन्हें भी प्रशिक्षण के लिए फ्री रखा जाए। हिमाचल प्रदेश में सैंकड़ों खिलाड़ी खेल आरक्षण के अंतर्गत विभिन्न विभागों में नौकरी कर रहे हैं। दर्जन भर खिलाडिय़ों को छोड़ कर न तो कोई खेल कर रहा है और न ही प्रशिक्षण व अन्य खेल प्रबंधन से जुड़ा है। इसका प्रमुख कारण हिमाचल में खेल संस्कृति का न होना है। जो खिलाड़ी कर्मचारी को खेल करने व करवाने से रोकती है और यह राज्य में खेलों के लिए शुभ संकेत नहीं है। वैसे तो देश के केंद्रीय व राज्यों के विभिन्न विभागों में खेल आरक्षण से नौकरी प्राप्त खिलाड़ी कर्मचारी को नौकरी के पहले पांच वर्षों तक खेल करना अनिवार्य होता है, मगर हिमाचल में इक्का दुक्का खिलाड़ी कर्मचारियों ने ही खेल किया है। हिमाचल प्रदेश सरकार राज्य के विभिन्न विभागों में खेल आरक्षण के अंतर्गत तीन प्रतिशत पदों पर भर्ती करती है। शिक्षा विभाग में अब तक सैंकड़ों प्रवक्ता, प्रशिक्षित स्नातक व अन्य पदों पर खेल आरक्षण से शिक्षक नियुक्त हैं। हिमाचल प्रदेश का हर बच्चा विद्यालय जा रहा है। वैसे तो विद्यालय में विद्यार्थियों की फिटनेस व खेलों के लिए शारीरिक शिक्षा का शिक्षक नियुक्त होता है मगर वह हर खेल के लिए प्रशिक्षण नहीं दे सकता है। भविष्य के अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी तैयार करने के लिए किशोरावस्था से ही सही तकनीक के साथ प्रशिक्षण कार्यक्रम का महत्व बढ़ जाता है। अरबों की आबादी में किसी खेल विशेष में सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए क्षमतावान प्रशिक्षक का प्रारंभिक स्तर से होना बेहद अनिवार्य हो जाता है जो सही उम्र में सही तकनीक सिखा कर भविष्य में खिलाड़ी उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकें। हिमाचल प्रदेश में खेल प्रशिक्षण के लिए शुरू से वह वातावरण ही नहीं बन पा रहा है जिस से बाद में प्रशिक्षक खिलाड़ी से राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर श्रेष्ठतम परिणाम दिला सके। हम पहले भी लिख चुके हैं कि खेल प्रशिक्षण दस साल से भी अधिक समय तक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। इतने लंबे खेल प्रशिक्षण को प्राप्त कर कुछ एक खिलाड़ी ही अपने प्रदेश व देश को गौरव दिला पाते हैंं। हिमाचल प्रदेश में विद्यालय स्तर पर शारीरिक शिक्षकों की कमी सबके सामने है।

विद्यालय जीवन ही वह समय है जब खिलाड़ी तकनीक को सीख रहा होता है। हिमाचल प्रदेश में लगातार प्रशिक्षण के लिए विद्यालय खुलने से पहले व बंद होने के बाद हिमाचल प्रदेश में शारीरिक शिक्षकों को छोड़ कर अन्य विषयों के शिक्षक जो पूर्व में अच्छे खिलाड़ी रहे हैं, अपने पढ़ाई के कार्य के साथ साथ विभिन्न खेलों के लिए प्रशिक्षण करवा रहे हैं। विद्यालय के प्रधानाचार्यों व शारीरिक शिक्षा के अध्यापकों को चाहिए कि वे खेल सुविधा व प्रतिभा के अनुसार अपने विद्यालय में अच्छे प्रशिक्षकों के साथ प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाएं ताकि हिमाचल के खिलाडिय़ों को विद्यालय में उच्च स्तरीय प्रशिक्षण सुविधा उपलब्ध हो सके। आज हिमाचल प्रदेश के कई विद्यालयों में विभिन्न प्रकार की खेलों के लिए स्तरीय प्ले फील्ड उपलब्ध है, मगर हिमाचल सरकार के शिक्षा विभाग ने तो यह फरमान जारी कर दिया है कि कोई भी अध्यापक जो शारीरिक शिक्षा का नहीं है, वह खेल नहीं करवा सकता है और न ही खेल गतिविधियों से जुड़ेगा। ऐसी नकारात्मक सोच क्यों? जब कि हर अध्यापक को किसी न किसी खेल व अन्य गतिविधियों में विद्यार्थियों को सिखाना उनकी सेवा शर्तों का हिस्सा है।

पिछले वर्ष राजकीय महाविद्यालय हमीरपुर के वार्षिक ईनाम बांट समारोह में खिलाडिय़ों को ईनाम स्टेज पर न देकर कमरे में शिक्षकों से दिलाए गए। खिलाड़ी विद्यार्थी व उनके साथ आए अभिभावक अपने बच्चों को स्टेज पर जाने का इंतजार ही करते रहे और दूसरी ओर कालेज प्रशासन व शिक्षक चमचागीरी में इतने खो गए कि राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर पोजीशन लाने वालों को ईनाम कमरे में और हाऊस टैस्ट वालों को स्टेज पर, फिर बताओ हिमाचल में रह कर कौन खेल करेगा। आज खेल भी एक विषय है। क्या शारीरिक प्राध्यापक को फिजिक्स वाले प्राध्यापक से कम वेतन व पदोन्नति मिलती है, जब सब विषय बराबर हैं तो यह भेद भाव किस लिए। सरकार इस बात को समझें जब चिट्टे जैसे नशे ने किशोरों व युवाओं को अपनी पकड़ में ले लिया है ऐसे में खेल ही एक ऐसा माध्यम है जो नशे से विद्यार्थियों को दूर रख सकता है। फिट विद्यार्थियों में से ही भविष्य के अच्छे नागरिक व उत्कृष्ट प्रदर्शन वाले खिलाड़ी भी निकलते हैं। इसलिए स्कूल स्तर से ही प्रशिक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए।

भूपिंद्र सिंह

अंतरराष्ट्रीय एथलेटिक्स प्रशिक्षक

ईमेल: bhupindersinghhmr@gmail.com


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