कालीबाड़ी मंदिर में 108 कमल के फूलों से मां दुर्गा की आराधना

By: Oct 20th, 2026 12:02 am

महाअष्टमी और महानवमी पर उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़, 108 दीप जलाकर की सुख-समृद्धि की कामना

स्टाफ रिपोर्टर-शिमला
राजधानी के प्रसिद्ध कालीबाड़ी मंदिर में सोमवार को महाअष्टमी और महानवमी का पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। पंचांग के अनुसार अष्टमी और नवमी एक ही दिन होने के चलते सुबह से ही मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिली। माता के दर्शन के लिए श्रद्धालु सुबह से ही मंदिर पहुंचना शुरू हो गए थे और दोपहर तक मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देखने को मिली। श्रद्धालु हाथों में पूजा की सामग्री लेकर अपनी भारी का इंतजार कते नजर आए। मां काली के दर्शन करने के लिए बड़ी संख्या में भक्त मंदिर पहुंचे और परिवार की सुख-समृद्धि, खुशहाली तथा शांति की कामना की। मंदिर परिसर मां के जयकारों से गूंजता रहा, जिससे दिनभर भक्तिमय माहौल बना रहा। मंदिर में दोपहर की आरती के समय खासी भीड़ देखने को मिली। इस विशेष अवसर पर मंदिर में स्थापित पांच मूर्तियों की विशेष पूजा-अर्चना की गई। सुबह 7:25 बजे संधि पूजा आयोजित की गई, जोकि 48 मिनट तक चली। इसमें मां दुर्गा को 108 कमल के फूल अर्पित किए गए। इसमें बंगाल से आए श्रद्धालुओं सहित स्थानीय लोगों ने भी बढ़-चढकऱ भाग लिया। इसके बाद 108 दीप प्रज्वलित कर विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की गई। कालीबाड़ी मंदिर के पुजारी मुक्ति चक्रवर्ती ने प्रदेशवासियों को महाअष्टमी की शुभकामनाएं देते हुए बताया कि मंदिर में पंचांग के अनुसार पूजा-पाठ की परंपरा निभाई जाती है। इस बार तिथियों के क्रम के अनुसार महाअष्टमी और महानवमी की पूजा एक ही दिन संपन्न हुई। इसके साथ ही तारादेवी में भी श्रद्धालु की भारी भीड़ देखने को मिली। मंदिर के कपाट खुलने के पहले से ही श्रद्धालु मां के दर्शन के लिए मंदिर पहुंचना शुरू हो गए थे।

कल होगा प्रतिमा का विसर्जन

कालीबाड़ी मंदिर कमेटी के सचिव डाक्टर कल्लोल प्रमाणिक ने बताया कि मां काली की प्रतिमा का विसर्जन 21 अक्तूबर को शिमला के नजदीक तारादेवी स्थित आईटीबीपी के तालाब में किया जाएगा। विसर्जन से पहले मंदिर में बंगाली परंपरा के अनुसार विशेष रस्म निभाई जाएगी। बंगाली समुदाय में दुर्गा पूजा के समापन पर सिंदूर खेला की विशेष परंपरा है। इस रस्म में सुहागिन महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर चढ़ाने के बाद एक-दूसरे के माथे पर सिंदूर लगाती हैं और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं। श्रद्धालु मां दुर्गा से अगले वर्ष फिर आने की प्रार्थना करते हैं।


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