छिलकों की छाबड़ी : ट्रंप जी मंथन कर रहे हैं…

By: Nov 7th, 2026 12:01 am

देखिए ट्रंप साहब हारे नहीं हैं। उनकी कुर्सी को कोई खतरा भी नहीं है। सभी नौ ग्रह मिलकर भी उनके बाल बांका नहीं कर सकते। जो रिजल्ट अभी सामने आए हैं, वे बता रहे हैं कि ट्रंप साहब के खिलाफ जबरदस्त साजिश हुई है। वहां के इलेक्शन कमीशन ने नेगेटिव रोल अदा किया है। चुनाव में जनता का मत इतना महत्व नहीं रखता जितना इलेक्शन कमीशन की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। वहां इलेक्शन कमीशन की भूमिका संदिग्ध रही है। इलेक्शन कमीशन को चाहिए था कि जो लोग हुकूमत के खिलाफ थे, उनके वोट कट जाने चाहिए थे। क्योंकि इलेक्शन कमीशन ने ऐसा नहीं किया, इसलिए हार के लिए इलेक्शन कमीशन दोषी है। दूसरी बात मतदाताओं ने जिन मतों पर अपनी मोहर लगाई, उनमें ट्रंप साहब की फोटो नहीं थी। अगर मतों पर फोटो होती तो पहले मतदाता ट्रंप साहब को सैल्यूट मारते और उसके बाद उस वोट पर अपना ठप्पा लगाते। इसलिए यह हार ट्रंप साहब की हार नहीं है। इसे जनादेश भी नहीं कहा जा सकता। क्योंकि ट्रंप साहब ने हार नहीं मानी है, वह आत्म मंथन कर रहे हैं। जो व्यक्ति आत्म मंथन करता है, वह बहुत दूरदर्शी होता है। आत्म मंथन से अमृत निकलता है और उसे पीकर नेता अजेय हो जाता है।

ट्रंप साहब का आत्म मंथन अब दुनिया को हिला कर रख देगा। अब देखना यह है कि इस मंथन से कौन सा अमृत निकलता है और किसके हिस्से में विष आता है। वैसे राजनीति में मंथन की परंपरा बहुत पुरानी है। जब भी कोई नेता हारता है तो वह जनता की नब्ज टटोलने के बजाय अपने सलाहकारों की नब्ज टटोलने लगता है। उसे जनता की गलती तो साफ दिखाई देती है, लेकिन अपनी गलती देखने के लिए उसे दूरबीन की जरूरत पड़ती है। ट्रंप साहब के आसपास भी इस समय सलाहकारों की पूरी फौज होगी। कोई कह रहा होगा कि सर, आपकी लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई, बस जनता को समझने में थोड़ी भूल हो गई। कोई कह रहा होगा कि आपके विरोधियों ने सोशल मीडिया पर साजिश की है। कोई यह भी सुझाव दे सकता है कि अगली बार मतदान केंद्रों पर आपके बड़े-बड़े कटआउट लगाए जाएं, ताकि मतदाता वोट डालने से पहले आपकी महानता का दर्शन कर सकें। संभव है मंथन के दौरान यह निष्कर्ष भी निकले कि जनता को चुनाव में अपनी पसंद बताने की इतनी आजादी नहीं मिलनी चाहिए कि वह नेता की पसंद के खिलाफ ही मतदान कर दे। लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि जरूर है, लेकिन उसकी सर्वोच्चता की भी कुछ मर्यादाएं होनी चाहिए। कम से कम तब तो होनी ही चाहिए जब कोई महान नेता चुनाव मैदान में हो! वैसे हार के बाद आत्ममंथन करना अच्छी बात है, लेकिन आत्ममंथन और आत्ममुग्धता में फर्क होता है। आत्ममंथन में आदमी अपने भीतर झांकता है और आत्ममुग्धता में अपने ही चेहरे को देखकर मुग्ध होता रहता है। ट्रंप साहब के मामले में दुनिया यह समझने की कोशिश कर रही है कि आखिर उनका मंथन किस श्रेणी में आता है।

राजनीति में एक खास किस्म का जादू होता है। यहां हारने वाला भी खुद को विजेता बताता है और जीतने वाले को अपनी जीत का प्रमाण देना पड़ता है। जनता अपना फैसला सुना देती है, लेकिन नेता जी उस फैसले की समीक्षा में जुट जाते हैं। कभी ईवीएम पर सवाल उठते हैं, कभी चुनाव आयोग पर, कभी मीडिया पर और कभी मतदाताओं की बुद्धिमत्ता पर। बस, एक सवाल है जो अक्सर नहीं उठता कि कहीं गलती खुद नेता जी से तो नहीं हुई? फिलहाल ट्रंप साहब मंथन कर रहे हैं। दुनिया सांस रोके इंतजार कर रही है कि इस मंथन से अमृत निकलेगा, विष निकलेगा या फिर कोई नया चुनावी सिद्धांत पैदा होगा। लेकिन एक बात तय है कि जब तक नेता अपनी हार को हार मानने के लिए तैयार नहीं होता, तब तक लोकतंत्र को भी अपनी जीत का जश्न मनाने के लिए थोड़ा इंतजार करना पड़ता है। आखिर लोकतंत्र में जनता का फैसला अंतिम जरूर होता है, लेकिन नेता जी की सहमति मिलना भी अब एक संवैधानिक औपचारिकता जैसा होता जा रहा है।

गुरमीत बेदी

साहित्यकार


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