दीपावली में आगजनी : परंपरा बनाम प्रदूषण
दीपावली के सच्चे अर्थ में ‘प्रकाश’ तभी होगा जब वह किसी के जीवन में अंधकार न फैलाए। प्रदेश की सुंदरता और हरियाली हमारी सांस्कृतिक पूंजी है…
हमारे देश में दीपावली केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक उत्सव है। यह अवसर अंधकार पर प्रकाश और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है, लेकिन आधुनिक समय में इस पर्व का स्वरूप अत्यधिक भौतिकतावादी और उपभोगवादी हो गया है। पारंपरिक दीयों और दीपदान की जगह वर्तमान में पटाखों की चमक-दमक, शोरगुल और धुआं ले चुका है। दीपावली के इस आधुनिक स्वरूप से न केवल पर्यावरणीय संकट गहराया है, बल्कि आगजनी की घटनाओं में भी साल दर साल वृद्धि हुई है। विशेष रूप से हिमाचल प्रदेश जैसे पर्वतीय और पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील प्रदेश में दीपावली के बाद पटाखों के कारण होने वाले प्रदूषण और आगजनी की घटनाएं गंभीर चिंता का विषय बन चुकी हैं। प्राचीन भारत में दीपावली का अर्थ दीयों से घर और समाज को आलोकित करना था। लेकिन ब्रिटिश शासनकाल में जब चीन निर्मित आतिशबाजी भारतीय बाजारों में आई, तब दीपावली का सांस्कृतिक स्वरूप बदलने लगा। धीरे-धीरे यह परंपरा आनंद और सौहार्द के बजाय प्रतिस्पर्धा और प्रदर्शन में बदल गई। आज स्थिति यह है कि दीपावली का नाम आते ही मन में दीपों की शांत रोशनी से अधिक पटाखों के शोर, धुएं और प्रदूषण की छवि उभरती है। यह परिवर्तन केवल सांस्कृतिक नहीं बल्कि पर्यावरणीय असंतुलन और सामाजिक असंवेदनशीलता का भी संकेत है। दीपावली के दौरान और उसके बाद हिमाचल में आगजनी की घटनाएं सामने आना अत्यंत चिंता का विषय है।
आंकड़ों की बात करें तो वर्ष 2022 में प्रदेश में दीपावली के समय आगजनी के पचास से अधिक हादसे हुए जिनमें कई घर जल गए और करोड़ों की संपत्ति नष्ट हुई। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और अग्निशमन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2023 में केवल तीन दिनों में प्रदेश में 72 अग्निकांड हुए जिनमें से अधिकांश पटाखों की चिंगारी से शुरू हुए थे। पटाखों के उपयोग से वायु प्रदूषण भी हिमाचल के वातावरण को गंभीर रूप से प्रभावित करता है। सामान्य दिनों में यहां की हवा शुद्ध और स्वच्छ होती है, परंतु दीपावली के समय वायु गुणवत्ता सूचकांक खतरनाक स्तर तक पहुंच जाता है। शिमला में 2024 की दीपावली के बाद एक्यूआई 148 तक पहुंच गया था, जो सामान्य स्तर से लगभग दोगुना था। वर्ष 2025 की दीपावली के बाद की अखबार के पहले पन्ने की खबर ही पटाखों से जलने वाले भवनों पर आधारित थी, जिसमें 45 भवन प्रदेश में आग की आगोश में आ गए तथा एक ही रात में लगभग ढेड़ करोड़ रुपए की संपत्ति स्वाहा हो गई। वहीं प्रदेश में एक्यूआई की स्थिति भी गंभीर बताई गई।
इसके अतिरिक्त पटाखों से निकलने वाली गैसें व धातुएं फेफड़ों और श्वसन तंत्र के लिए अत्यंत हानिकारक बताई जाती हंै, जिसका प्रभाव बच्चों, बुजुर्गों तथा अस्थमा के रोगियों के लिए जानलेवा साबित माना जाता है। इसके साथ-साथ ध्वनि प्रदूषण भी मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर विपरीत असर डालता है। पटाखों का शोर कभी-कभी 140 डेसिबल तक पहुंच जाता है, जो न केवल मनुष्य बल्कि पशु-पक्षियों के लिए भी असहनीय होता है। पटाखों से उत्पन्न चिंगारी केवल बस्तियों तक सीमित नहीं रहती बल्कि जंगलों तक फैल जाती है। हिमाचल के चीड़ के जंगल अत्यधिक ज्वलनशील होते हैं। दीपावली के समय इन जंगलों में आग लगने की घटनाएं आम हैं। वन विभाग के अनुसार हर वर्ष दीपावली के आसपास लगभग 150 से 200 हेक्टेयर वन क्षेत्र जलकर नष्ट हो जाता है। यह केवल पेड़ों की हानि नहीं बल्कि जैव विविधता के विनाश का भी कारण है। हालांकि सरकार और न्यायपालिका समय-समय पर इस बाबत प्रयासरत है, किंतु इनका क्रियान्वयन अभी तक चुनौती बना हुआ है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने प्रदेश में पर्यावरण-अनुकूल पटाखे निश्चित समय सीमा में जलाने के नियम बनाए हैं। साथ ही स्कूलों तथा सामाजिक स्थलों में हरित दीपावली अभियान के तहत जागरूकता फैलाने का काम किया जाता आ रहा है। परंतु इन आदेशों का पालन व्यवहार में बहुत सीमित दिखाई देता है। पर्व की खुशी में नियमों की अनदेखी आम बात बन गई है, जिसमें समाज के जिम्मेदार नागरिक भी कभी-कभी सोशल मीडिया पर पटाखे जलाते हुए दिखते हंै। देखा-देखी में आतिशबाजी की मानो होड़ सी लग जाती है। इसमें मीडिया, सामाजिक संगठन तथा सोशल मीडिया इंफ्लूएन्सर के जनजागरूकता बढ़ाने में खासे प्रयत्न देखने को भी मिलते हैं। किन्तु जब तक हरेक व्यक्ति अपनी अंतरात्मा से सजग व समझदार नहीं बनता, तब तक सभी प्रयत्न धरे के धरे रह जाएंगे। समाचारपत्र और टीवी चैनलों पर दीपावली के बाद प्रदूषण और आगजनी पर खबरें भी प्रकाशित होती हैं, लेकिन शायद इनसानी फितरत है कि ‘जब तक मेरी बारी नहीं आती तब तक मैं तो सुरक्षित हूं’ वाली सोच इन प्रयत्नों को अमलीजामा नहीं पहना सकती। ऐसी मानसिकता व्यक्ति के स्वयं के साथ समाज के लिए भी घातक है। यद्यपि कई व्यक्तिगत एवं संस्थागत प्रयास भी सराहनीय हैं जिसमें ‘धुएं नहीं, दीयों की दीपावली’ तथा ‘एक दीप धरती मां के नाम’ जैसी पहलें समाज को पर्यावरण-मित्र उत्सव की दिशा में अपने आप में अतुलनीय कदम है। यदि जरूरत है तो उपरोक्त प्रयासों में कदम से कदम मिलाने की।
इसके अलावा अब हरित दीपावली की अवधारणा जो केवल मात्र कागजों तक सीमित है, को व्यापक रूप से व्यावहारिकता में अपनाने का उपयुक्त समय है। मिट्टी के दीयों, प्राकृतिक तेलों और सौर ऊर्जा आधारित रोशनी का उपयोग किया जाना इस ओर एक और सार्थक प्रयास सिद्ध हो सकता है। इसके साथ-साथ सामूहिक दीपदान और सांस्कृतिक कार्यक्रम पटाखों के विकल्प हो सकते हैं। इन उपायों के बावजूद वास्तविक परिवर्तन तभी संभव होगा जब समाज की मानसिकता बदलेगी। हमें यह समझना होगा कि पर्व का उद्देश्य प्रतिस्पर्धा या प्रदर्शन नहीं, बल्कि आनंद और आत्मिक संतुलन है। दीपावली के सच्चे अर्थ में ‘प्रकाश’ तभी होगा जब वह किसी के जीवन में अंधकार न फैलाए। एक दीया यदि हमारे घर में शांति और सौहार्द का संदेश दे सकता है तो सैकड़ों पटाखों की आवश्यकता नहीं होती। हिमाचल की सुंदरता, इसकी स्वच्छ हवा और हरियाली हमारी सांस्कृतिक पूंजी है। इसे सुरक्षित रखना होगा।
प्रो. सतपाल
शिक्षाविद
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