स्वास्थ्य मानकों के साथ

By: Nov 7th, 2026 12:01 am

शुक्र है कि खाद्य सुरक्षा विभाग अपनी चौकसी में इजाफा कर रहा है, वरना यहां तो शहद में भी कीड़े पल जाते हैं। हिमाचल के त्योहारी सीजन में खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता के मानदंड गिर जाते हैं और मांग-आपूर्ति के बीच नकली सामान इधर से उधर हो जाता है। मंडी शहर में कॉकरोच अगर किसी किचन की सामग्री में मिले, तो ऐसी लापरवाही का लेखा जोखा साल भर होना चाहिए। हिमाचल में पर्यटकों की आवाजाही साल भर होती है, इसलिए केवल एक उत्सव की चौकसी से काम नहीं चलेगा। सब्जियां, पनीर, खोया, दही, दूध व घी जैसी सामग्री का इस्तेमाल मानकों के अनुसार होना चाहिए, लेकिन बढ़ती मांग के दौरान अकसर जांच परख नहीं होती। प्रदेश में कमोबेश साल भर सडक़ों के किनारे रेहडिय़ों पर बिकता खाद्य सामान कई आशंकाएं पैदा करता है। खुले में टिक्की, समोसा और बर्गर बेचने की केवल मार्गदर्शिका नहीं, बल्कि इन रेहडिय़ों की नियमित जांंच होनी चाहिए। सबसे अधिक बिक्री वाले मोमो व सिड्डू की बिक्री को निरीक्षण की जरूरत है। अब यह हिसाब तो है नहीं और न ही जागरूकता दिखाई जाती है कि फास्ट फूड हर साल कितने मरीज बढ़ा रहा है, फिर भी कम से कम जांचना यह चाहिए कि पूरे वर्ष पत्ता गोभी, शिमला मिर्च या गाजर की आपूर्ति कहां और किस स्थिति में हो रही है। स्वास्थ्य मानकों के साथ यह तय करना जरूरी है कि किसी भी पर्यटक को हम ऐसा कुछ न खिलाएं जो सेहत के खिलाफ हो। कई तरह सॉल्ट और फूड अनुपूरकों का इस्तेमाल लापरवाही से भी हो रहा है। फॉस्ट फूड ने कुकिंग के मायनों को चंद मिनट में समेट दिया है। ओवर हीटिड तथा शीघ्र अति शीघ्रता से बन रहा स्वाद अकसर अमाशय से आंतडिय़ों तक विषाद पैदा कर रहा है।

बेशक इस दौरान डाक्टरों के पास लग रही लंबी कतार केवल खाद्य पदार्थ जनित रोगों से ताल्लुक रखते हंै। हिमाचल में मैदा, पत्ता गोभी, शिमला मिर्च, खोया, पनीर, दूध-दही, चिकन, ब्रेड तथा बेकरी की मांग तीव्रता से बढ़ रही है। दैनिक रूप से देखें तो कई वाहन सुबह सवेरे ऐसी आपूर्ति से अटे आते हैं, लेकिन कहीं कोई चैकिंग का बंदोबस्त नहीं। होना तो यह चाहिए कि खाद्य सुरक्षा के पहरे रात से सुबह तक चलें। किसी दुकानदार के किचन की जांच होनी चाहिए, लेकिन रात से सुबह तक हजारों टन आ रहे खाद्य पदार्थों का भी तो निरीक्षण हो। यह दीगर है कि दिवाली व अन्य त्योहारों के समय खाद्य सुरक्षा के नाम पर कुछ रस्में हो जाती हैं, जबकि एक टूरिस्ट स्टेट की हैसियत में रोजाना खाद्य पदार्थों की आपूर्ति से इनके अंतिम उत्पाद तक की प्रक्रिया को जांचने की पूर्ण व्यवस्था होनी चाहिए। इस संबंध में प्रयोगशालाओं को स्तरोन्नत जरूर किया जा रहा है, लेकिन इसे भी चिट्टे की रोकथाम की तरह, अभियान का रूप देना होगा। दूसरी ओर स्वास्थ्य विभाग एवं मेडिकल यूनिवर्सिटी को अनुसंधान करते हुए हिमाचल की बदलती खाने पीने की आदतों पर विस्तृत सर्वेक्षण रिपोर्ट लानी चाहिए। मसलन मोमो की एक रेहड़ी के हिसाब से पूरे प्रदेश में स्वास्थ्य के कितने खतरे पनप रहे हैं। शिक्षा विभाग को स्कूली पाठ्यक्रम के साथ-साथ खान पान के तौर तरीके, फॉस्ट फूड और बाजार में उपलब्ध हर प्रकार के पैकेजिंग सामान के खतरों से छात्रों में जागरूकता लानी चाहिए। बहरहाल दिवाली की शुभकामनाओं में व्यापार खोजता बाजार जहां खड़ा है, वहां नकली पदार्थों की आमद को रोकने के प्रयास शीघ्रता से होने चाहिए। हिमाचल में निर्मित दवाइयां पहले ही यह साबित कर रही हैं कि प्रदेश का ड्रग कंट्रोल सिस्टम पूरी तरह सक्षम नहीं है। इसी तरह खाद्य सुरक्षा व नियंत्रण के इंतजाम को सशक्त करते हुए विभागीय सुदृढ़ता चाहिए। आम जनता से भी गुजारिश है कि इस बार दिवाली को स्वास्थ्य व पर्यावरणीय मानकों के साथ मनाएं।


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