ट्रम्प की वापसी अमेरिकी प्रणाली की सफलता
इसमें कोई संदेह नहीं है कि ट्रम्प की जीत निर्णायक है। उनको श्रेय मिलना चाहिए, लेकिन अमेरिकी मतदाता ने लोकतंत्र के लिए उनके खतरे को कैसे नजरअंदाज कर दिया? सच्चाई यह है कि ज्यादातर अमेरिकियों ने कभी नहीं माना कि ट्रम्प लोकतंत्र के लिए खतरा थे। वे दो कारण बताते हैं … वे ट्रम्प को इस तरह से चित्रित करने के सभी प्रयासों को राजनीतिक रूप में देखते हैं, और उन्हें देश की संवैधानिक जांच और संतुलन व्यवस्था पर भरोसा है। ट्रम्प के पुनरुत्थान और जीत से पता चलता है कि अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था मजबूत है…
चार साल पहले, डोनाल्ड ट्रम्प को राजनीतिक रूप से मृत समझा गया था। उन पर दो बार महाभियोग लगाया गया, राज विद्रोह के उच्च अपराध के लिए दोषी ठहराया गया, कई अपराधों के लिए अदालतों में मुकदमा चलाया गया, मीडिया द्वारा उपहास किया गया, और उनका पुन: चुनाव जीतने का प्रयास विफल हो गया। हाल के राष्ट्रपति चुनाव में उनके आश्चर्यजनक पुनरुत्थान ने इसलिए कई राजनीतिक पंडितों और सर्वेक्षण कर्ताओं को चौंका दिया है। ट्रम्प के विरोधी लंबे समय से कहते रहे हैं कि वह अमेरिकी लोकतंत्र के लिए खतरा हैं और उन्हें राष्ट्रपति पद के आसपास भी नहीं जाने दिया जाना चाहिए। वे उनके निरंकुश व्यवहार, सार्वजनिक प्रवचन में अभद्रता और गैरकानूनी कार्यों की ओर इशारा करते हैं। उन्हें यह भी डर है कि अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट ट्रम्प की जेब में है।इन शं
काओं के चलते प्रश्न यह है कि अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था ने ट्रम्प को फिर से जीतने कैसे दिया? इसका जवाब वहां के राष्ट्रपति चुनाव के तंत्र में निहित है, मुख्यत: उनकी ‘खुली पार्टी’ प्रणाली, प्राथमिक चुनाव व्यवस्था, और इलेक्टोरल कॉलेज।
अमेरिका की ‘खुली पार्टी’ प्रणाली ने ट्रम्प को उनकी 2020 की हार के बावजूद विभिन्न राज्य और स्थानीय चुनावों में उम्मीदवारों को चुनकर और समर्थन करके प्रासंगिक बने रहने की अनुमति दी। यदि अमेरिकी राजनीतिक दलों को पोलित ब्यूरो या पार्टी के आकाओं द्वारा चलाया जाता, तो ट्रम्प को गुमनामी में भेज दिया जाता। परंतु पार्टियों की खुली व्यवस्था होने के कारण वह अपने एजेंडे को अपने उम्मीदवारों के माध्यम से आगे बढ़ाने में सक्षम रहे। ट्रम्प के कई उम्मीदवार बिल्कुल नए चेहरे थे, जैसे एरिजोना में ब्लेक मास्टर्स, जॉर्जिया में हर्शल वॉकर और पेंसिल्वेनिया में मेहमेट ओज। यदि अमेरिका में ‘बंद पार्टी’ प्रणाली होती, जैसी भारत में है, जहां पार्टी के आका तय करते हैं कि पार्टी लेबल किसे मिलेगा, ट्रम्प पार्टी में उच्च पद के बिना उम्मीदवारों को नहीं चुन पाते।
ट्रम्प समर्थित उम्मीदवारों को अमेरिकी प्राथमिक चुनावों की प्रणाली ने उनके ‘मैगा’ एजेंडे को टेस्ट करने की अनुमति दी। वर्ष 2022 आते, ट्रम्प का ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ नारा लोकलुभावन नीतियों का पर्याय बन गया, जैसे कि सीमा नियंत्रण, कर कटौती, टैरिफ और एंटी-वोक (अत्यंत उदार) सामाजिक नीतियां। ट्रम्प के कुछ निजी मुद्दे, जैसे कि 2020 की चुनावी हार से इनकार, अलोकप्रिय साबित हुए और सुर्खियों से हटते गए। उदाहरण के लिए, एरिजोना में एक ट्रम्प समर्थित उम्मीदवार, कैरी लेक, जिन्होंने चुनावी हार से इनकार को भुनाने की कोशिश की, अपने गवर्नर और फिर सीनेट दोनों चुनावों में हार गयीं।
इस सब ने ट्रम्प को राष्ट्रपति के प्राथमिक चुनावों में एक ऐसे ‘मैगा’ प्लेटफार्म को सामने रखने की अनुमति दी जो पहले से भी अधिक लोकप्रिय था। वह अपनी उम्मीदवारी की घोषणा करने वाले पहले रिपब्लिकन थे, हालांकि फिर भी उन्होंने 12 विरोधियों की भीड़ का सामना किया। उनमें उनके पूर्व उपराष्ट्रपति (माइक पेंस), पांच गवर्नर (निक्की हेली, रॉन डेसेंटिस, आसा हचिंसन, क्रिस क्रिस्टी, डग बर्गम), एक सीनेटर (टिम स्कॉट), एक हाउस प्रतिनिधि (विल हर्ड), और विवेक रामास्वामी जैसी उच्च स्तरीय हस्तियां शामिल थीं। ट्रम्प का एजेंडा इतना लोकप्रिय था कि प्राइमरी शुरू होने से पहले ही आठ विरोधी बाहर हो गए। हचिंसन और रामास्वामी ने एक प्रतिशत से भी कम वोट हासिल किए और अपनी मुहिम समाप्त कर दी। फ्लोरिडा के गवर्नरशिप आसानी से जीतने वाले डेसांटिस भी केवल 1.6 फीसदी वोट के साथ बाहर हो गए। हेली लगभग 20 फीसदी वोट प्राप्त करने में कामयाब रही, लेकिन वह ट्रम्प की लोकप्रियता का सामना नहीं कर सकीं और अंतत: उसका समर्थन किया।
आम चुनाव के दौरान, ट्रम्प ने इलेक्टोरल कॉलेज पर ध्यान केंद्रित किया और अपने ‘मैगा’ एजेंडा को सात ‘स्विंग’ राज्यों में से प्रत्येक के अनुरूप बनाया। उदाहरण के लिए, पेंसिल्वेनिया में, जहां ज्यादातर कामकाजी वर्ग के लोग रहते हैं, ट्रम्प ने रोजगार वापस लाने के बारे में बात की, जबकि कमला हैरिस प्रजनन अधिकारों पर केंद्रित रहीं। विस्कॉन्सिन, एक ड्रग ओवरडोज से होने वाली मौतों से तबाह राज्य, में ट्रम्प ने अफोर्डेबल केयर एक्ट का विकल्प खोजने पर अभियान चलाया, जबकि हैरिस ने दवाओं की कीमत कम करने के बारे में बात की। ट्रम्प ने इन सभी सात राज्यों को 0.9 प्रतिशत (विस्कॉन्सिन) से 5.7 प्रतिशत (एरिजोना) के अंतर से जीता।
अंत में, ट्रम्प के ‘मैगा’ एजेंडे ने कई पारंपरिक रूप से डेमोक्रेटिक मतदाताओं से समर्थन प्राप्त किया। उदाहरण के लिए, शहरी काउंटियों ने रिपब्लिकन पक्ष में 5.8 प्रतिशत, हिस्पैनिक-बहुमत वाली काउंटियों ने 13.3 प्रतिशत और काले-बहुमत वाली काउंटियों ने 2.7 प्रतिशत की ओर रुख किया। ट्रम्प ने अश्वेत पुरुषों के अपने हिस्से को लगभग दोगुना कर दिया, और अपने 2020 अभियान की तुलना में महिलाओं से 3 फीसदी अधिक वोट प्राप्त किए। दो साल के लंबे चुनाव में, ट्रम्प ने राष्ट्रीय स्तर पर दो बार टेलीविजन बहस कीं, और उन्हें तीन हत्या की धमकियों और अपने मुकदमों के लिए विभिन्न अदालत की तारीखों का सामना करना पड़ा। लेकिन उन्होंने देश भर में 100 से अधिक रैलियां कीं।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि ट्रम्प की जीत निर्णायक है। उनको श्रेय मिलना चाहिए, लेकिन अमेरिकी मतदाता ने लोकतंत्र के लिए उनके खतरे को कैसे नजरअंदाज कर दिया?
सच्चाई यह है कि ज्यादातर अमेरिकियों ने कभी नहीं माना कि ट्रम्प लोकतंत्र के लिए खतरा थे। वे दो कारण बताते हैं … वे ट्रम्प को इस तरह से चित्रित करने के सभी प्रयासों को राजनीतिक रूप में देखते हैं, और उन्हें देश की संवैधानिक जांच और संतुलन व्यवस्था पर भरोसा है। मेरे हाल के लेख, ‘क्यों ट्रम्प कोशिशों के बावजूद एक तानाशाह नहीं बन सकते’, में मैंने अमेरिका की इस व्यवस्था के कई तरीकों को रेखांकित किया जिनके द्वारा ट्रम्प को रोका जा सकता है। जैसे कि अमेरिकी संविधान में संशोधनों के लिए सख्त शर्तें, शक्तियों का पृथक्करण, सीनेट का फिलिबस्टर नियम, उनकी अनूठी संघीय संरचना जहां राज्य सरकारों को भंग नहीं किया जा सकता, और संघीय और राज्य न्यायपालिकाओं की स्वतंत्रता और उनका पृथक्करण। उस संविधान के तहत 235 वर्षों में कोई भी राष्ट्रपति निरंकुश रूप से कार्य करने में सक्षम नहीं रहा है, क्योंकि अमेरिका के समझदार संस्थापकों ने ऐसा करने के लिए कोई तंत्र नहीं छोड़ा था। ट्रम्प के पुनरुत्थान और जीत से पता चलता है कि अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था मजबूत है। इसने विरोधियों द्वारा ट्रम्प के राजनीतिक भविष्य को खत्म करने के एक ठोस अभियान के बावजूद जनता की पसंद को उभरने की अनुमति दी।
-‘दि क्विंट’ में प्रकाशित
(15 नवंबर, 2024)
भानु धमीजा
सीएमडी, दिव्य हिमाचल
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