कर्म, विकर्म और अकर्म

By: Jun 5th, 2025 12:06 am

अपना हर काम यह सोच कर करो कि यह काम परमात्मा के निमित्त है। फिर काम का परिणाम जो भी हो, उसे खुले मन से और खुशी से स्वीकार करो। सफलता मिल जाए तो अहंकार मत करो, और यदि किसी भी कारण से असफलता मिली हो तो उदास हुए बिना, निराश हुए बिना फिर से प्रयत्न में लग जाओ और फल की चिंता परमात्मा पर छोड़ दो। कामना के बिना, लालच के बिना, लोभ के बिना, परिणाम की चिंता के बिना किया गया हर कर्म मानो परमात्मा के लिए किया गया काम है, यह ‘अकर्म’ है, क्योंकि इसमें ‘कर्ता का भाव’ या ‘कर्ता का अहंकार’ नहीं है। परमात्मा के निमित्त किया गया हर काम मानो यज्ञ है। हम दिन भर जो भी करें, परमात्मा के निमित्त करें तो हम कर्म से नहीं बंधते, कर्म के परिणाम से नहीं बंधते और यह ‘अकर्म’ है…

जैसे-जैसे मुझे जीवन की कुछ समझ आ रही है, वैसे-वैसे सिर्फ एक बात साफ नजर आनी शुरू हुई है कि अगर हम सचमुच जीवंत जीवन जीना चाहते हैं, तो हमें प्रकृति के नजदीक जाना होगा और प्राकृतिक जीवन जीना होगा, या प्रकृति को अपने जीवन में उतारना होगा। बचपन से ही हम ‘असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मामृतं गमय’ प्रार्थना गाते आए हैं जिसका अर्थ है कि हे प्रभु, हमें असत्य से सत्य की ओर ले चलो, अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो, मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो। आइए, इस प्रार्थना पर थोड़ा गहराई से विचार करें। हम कहीं भी हों, परिवार में, दोस्तों में, नौकरी अथवा व्यवसाय में, या फिर समाज में, समस्याएं तो आती ही हैं। समस्याएं जीवन का शाश्वत सत्य हैं। जीवन है तो समस्याएं हैं, चुनौतियां हैं, फर्क यही है कि उन चुनौतियों के प्रति हमारा दृष्टिकोण क्या है और हम समस्याओं से कैसे निबटते हैं। समस्या आने पर हमारी प्रतिक्रिया हमारे जीवन को परिभाषित करती है। हमारी योग्यता के साथ-साथ हमारा व्यवहार भी हमारे जीवन का पैमाना गढ़ता है। अनुशासन में रहकर अपने काम में मन लगाना, पूरे मनोयोग से काम करना हमारी सफलता का कारण बनता है। जब हम मन लगाकर काम करते हैं तो हमारी कुशलता बढ़ती चलती है और हम एक्सपर्ट बन जाते हैं। इससे हमारा सम्मान बढ़ता है और प्रमोशन अथवा सफलता के अवसर बढ़ जाते हैं। जैसे-जैसे हम वरिष्ठ पदों पर आगे बढ़ते हैं, वैसे-वैसे अपने सहकर्मियों से हमारे संबंधों का महत्त्व बढ़ता चला जाता है। यह समझना आवश्यक है कि सहकर्मियों से सार्थक मेलजोल हमारी सफलता की सीढ़ी है। इससे हमें सफलता ही नहीं, खुशी भी मिलेगी।

खुशी के बिना सफलता अधूरी ही नहीं, अर्थहीन है क्योंकि हमने सफल माने जाने वाले लोगों को, अमीर लोगों को, शक्तिशाली और समर्थवान लोगों को भी आत्महत्याएं करते हुए देखा है। अपने आप में ही सीमित हो जाने वाले लोग अकेले पड़ जाते हैं, पैसा और साधन होने के बावजूद किसी को अपना दुख बता नहीं पाते और सारा जीवन निराशा में बिता देते हैं, यही नहीं कभी-कभी तो आत्महत्या जैसे अतिवादी कदम भी उठा लेते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि हम केवल सफलता की दौड़ का घोड़ा बन कर न रह जाएं, बल्कि अपने आप से भी प्यार करना सीखें, मनचाही हॉबी विकसित करें और खुश रहें। अच्छा स्वास्थ्य, सफल कैरिअर और खुशनुमा जीवन ही हमारी जीवंतता की निशानी हैं, इसलिए हमें सदैव प्रयत्न करना चाहिए कि हम खुद पर भी ध्यान दें, अपने लिए समय निकालें, सैर करें, प्रकृति का आनंद लें, ठीक से भोजन करें और खुश रहें। जीवन में खुशियों और सफलता का यही एकमात्र मंत्र है। अब इसी को एक और नजरिये से भी देखते हैं। हम भारतीय लोग श्रीमद्भगवद्गीता को हर तरह के ज्ञान का सार मानते हैं और आदर्श जीवन की संहिता का-सा सम्मान देते हैं। भगवान श्री कृष्ण ने इसमें भक्ति योग, कर्म योग, राज योग और ज्ञान योग की व्याख्या की है। इसके साथ ही उन्होंने निष्काम कर्म की महत्ता को रेखांकित किया है। सात्विकता की, अध्यात्म की राह कोई भी हो, उन सब में कर्म एक अनिवार्य अंश है। हम कर्म के बिना रह ही नहीं सकते क्योंकि चाहे यह सायास हो या अनायास, पर जीवित रहने के लिए सांस लेना भी तो एक कर्म ही है। सांस लेना एक कर्म है, सोचना एक कर्म है। जीवन भर हम कर्म तो करते ही रहते हैं। कर्म की इसी महत्ता का परिणाम है कि भगवान श्री कृष्ण ने बार-बार जोर देकर अर्जुन को निष्काम कर्म के लिए प्रेरित किया है। निष्काम कर्म को समझना हो तो हमें कर्म, विकर्म और अकर्म के भेद को समझना होगा। हमारे दिमाग में दिन भर में जो विचार चलते रहते हैं, उनमें से कोई विचार हमारी कोई इच्छा बन जाए, कामना बन जाए, चाहत बन जाए तो हम उस पर फोकस हो जाते हैं। अब शुरू होता है इच्छापूर्ति के लिए काम। हम किसी भी तरह से अपनी उस इच्छा को, उस सपने को साकार करना चाहते हैं।

इच्छा साकार हो जाए तो कुछ देर के लिए हम खुश हो जाते हैं और फिर किसी नई इच्छा की पूर्ति में लग जाते हैं। इच्छा पूरी न हो पाए, हमारा सपना साकार न हो पाए तो हम निराश हो जाते हैं, क्रोधित हो जाते हैं, शिकायतें करने लगते हैं, किस्मत को, हालात को या परमात्मा को दोष देने लग जाते हैं। जीवन में दुखों का मूल यही है। कामनापूर्ति के लिए किया गया हर काम हमारा ‘कर्म’ है। हम विद्यार्थी हों, नौकरी में हों, व्यवसाय में हों, वैज्ञानिक हों, खिलाड़ी हों, अभिनेता हों, राजनीतिज्ञ हों या कुछ भी और हों, अगर हम अपनी जिम्मेदारी पूरी न करें, काम न करने के बहाने खोजते रहें, तो यह ‘विकर्म’ है। काम से भाग जाना, काम न करना, अधूरे मन से काम करना, दिखावे का काम करना आदि सब विकर्म के उदाहरण हैं। अर्जुन कुरुक्षेत्र में युद्ध के मैदान में कौरवों की सेना के सामने खड़े हैं और युद्ध से विचलित हो रहे हैं। युद्ध से बचना संभव नहीं है, उस समय युद्ध उनका कत्र्तव्य है, तो भी अर्जुन निराश हैं, और युद्ध के मैदान में होने के बावजूद हथियार छोडक़र अपने रथ के पिछले हिस्से में जा बैठे, अगर वे युद्ध न करते तो यह उनका ‘विकर्म’ होता।

भगवान श्री कृष्ण ने जो असली सीख दी वह यह थी कि जीवन में जो कुछ भी करना पड़े उसे पूरे मन से करो, पूरी काबिलीयत से करो, पूरा जोर लगाकर करो, पूरी खुशी से करो, लेकिन यह मत सोचो कि काम का परिणाम क्या होगा? अपना हर काम यह सोच कर करो कि यह काम परमात्मा के निमित्त है। फिर काम का परिणाम जो भी हो, उसे खुले मन से और खुशी से स्वीकार करो। सफलता मिल जाए तो अहंकार मत करो, और यदि किसी भी कारण से असफलता मिली हो तो उदास हुए बिना, निराश हुए बिना फिर से प्रयत्न में लग जाओ और फल की चिंता परमात्मा पर छोड़ दो। कामना के बिना, लालच के बिना, लोभ के बिना, परिणाम की चिंता के बिना किया गया हर कर्म मानो परमात्मा के लिए किया गया काम है, यह ‘अकर्म’ है, क्योंकि इसमें ‘कर्ता का भाव’ या ‘कर्ता का अहंकार’ नहीं है। परमात्मा के निमित्त किया गया हर काम मानो यज्ञ है। हम दिन भर जो भी करें, परमात्मा के निमित्त करें तो हम कर्म से नहीं बंधते, कर्म के परिणाम से नहीं बंधते और यह ‘अकर्म’ है। इस ‘अकर्म’ को ही प्रभु श्री कृष्ण ने गीता में ‘निष्काम कर्म’ कहा है। सबक यही है कि हम सब कुछ करें, उसमें खुद को पूरा झोंक दें, पूरी काबिलीयत से, पूरी ईमानदारी से अपना कत्र्तव्य निभाएं और फल की चिंता परमात्मा पर छोड़ दें तो यह काम ही पूजा हो जाता है। यह अध्यात्म से सबसे ऊंची अवस्था है, और यही हमारे जीवन का लक्ष्य है।

स्पिरिचुअल हीलर

सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक

ई-मेल: indiatotal.features@gmail.com


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