रावण हैं हम!

By: Oct 16th, 2025 12:06 am

यदि बंद कमरों में बैठे रहकर काम करने पर, सैर न करने पर, स्वास्थ्यकर भोजन न लेने पर, पूरी नींद न लेने पर या ऐसे ही किसी और कारण से ब्लडप्रेशर हो जाए, शूगर हो जाए, किडनी खराब हो जाए, हार्ट की बीमारी हो जाए तो दवाइयां लेकर भी हम जीवन भर के लिए दवाइयों के गुलाम ही रहते हैं और मजबूरन कई सारे परहेज करने पड़ते हैं। डॉक्टरों के चक्कर काटकर, पैसे खर्च करके, जीवन भर के लिए बीमारी मोल लेकर और दवाइयों के गुलाम बनकर अगर हम खुश होते हैं तो यह सुविधा नहीं, हमारी नासमझी है और इस नासमझी पर खुश होने का कोई कारण नहीं है। चुनाव हमारा है कि खुद अपने ही लिए हम रावण बनकर अपना नुकसान खुद करते हैं या आवश्यक सावधानियां बरतते हुए अपनी सेहत का ध्यान रखकर परमात्मा के दिए इस शरीर का पूरा लाभ उठाकर अपना जीवन आनंदमय बनाते हैं…

हम अक्सर अपने आप में ही इतने व्यस्त रहते हैं कि खुद ही खुद से अनजान रहते हैं। हमारी अपनी जरूरत क्या है, इसे भी नहीं समझ पाते। आज के समाज में जितनी भी व्याधियां हैं, इनके मूल में हमारा अज्ञान ही तो है। हम इतने मूढ़ हैं कि अपने ही शरीर की आवश्यकताओं के बारे में अनजान हैं, अपने ही मन की आवश्यकताओं के बारे में अनजान हैं। हमारा शरीर और मन दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। मन खराब हो तो शरीर सुस्त पड़ जाता है और शरीर में दर्द हो या बीमारी हो, तो मन शिथिल हो जाता है। अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए हमें इन दोनों को जानना और समझना हमारी अनिवार्य आवश्यकता है। अलग-अलग वैज्ञानिक शोधों से सिद्ध हुआ है कि हमारी पूरी त्वचा सांस लेती है, ऑक्सीजन भीतर खींचती है और कार्बन डाईऑक्साइड बाहर छोड़ती है, सिर्फ हमारी नाक ही नहीं। अगर हमारे शरीर पर मोटा रंग पोत दिया जाए और भीतर-बाहर सांस लेने की सारी संभावना रोक दी जाए और केवल हमारी नाक खुली रहे तो हम शायद तीन-चार घंटे में ही मर जाएं। सिर्फ नाक से काम नहीं चलता, नाक सबसे जरूरी अंग है, लेकिन खुद अकेला नाक ही पर्याप्त नहीं है। हमारा पूरा शरीर लगभग सात अरब जीवित कोशिकाओं से बना है।

उन सबको ऑक्सीजन चाहिए, उन सबको कार्बन डाइऑक्साइड बाहर निकालनी है। हम यह नहीं समझ पाते कि हमारे कपड़े इस प्रक्रिया में बाधा डालते हैं। हमारे कपड़े हमारे मित्र नहीं हैं। लेकिन हजारों वर्षों से कपड़े पहनने के कारण हमारा शरीर दुर्बल हो गया है, बदलते मौसम की मार बर्दाश्त नहीं कर पाता, इसलिए हमें उन्हें पहनना पड़ता है। सामाजिक वर्जनाओं के कारण भी वस्त्रहीन रहना संभव नहीं है, पर बीच-बीच में, जब मौसम अनुमति दे और आसपास कोई दूसरा ऐसा व्यक्ति न हो हमारे वस्त्रहीन होने से जिसकी भावनाएं आहत होती हों, तब वैसे ही, जैसे भगवान ने हमें भेजा था, पूर्णत: वस्त्ररहित रहकर हम जीवन की, यौवन की और ताजगी की एक नयी मुक्ति का अनुभव कर सकते हैं। सूरज हमारा मित्र है। हवा हमारी मित्र है। वर्षा हमारी मित्र है। हमारे कपड़े हमारे शत्रु हैं। लेकिन अभी क्योंकि हम दुर्बल हो चुके हैं, हमें कपड़े पहनने ही पड़ेंगे। आज का मनुष्य सबसे दुर्बल प्राणी है और कपड़ों को सभ्यता की निशानी मान लिया गया है, इसलिए भी हमें कपड़े पहनने ही पड़ेंगे। कपड़े पहनें मगर बीच-बीच में शरीर को उसके स्वाभाविक अधिकार का आनंद उठाने का अवसर भी दें। हमारे शरीर में कहीं दर्द हो, हमें जुकाम हो जाए या बुखार हो जाए तो हम फटाफट डाक्टर के पास जाकर दवाई लेना शुरू कर देते हैं। हमारे शरीर का दर्द, जुकाम या बुखार तो सिर्फ संदेशवाहक हैं, वे हमें कुछ बताना चाहते हैं, पर हम हैं कि दवा लेकर संदेशवाहक को ही मार डालते हैं। लंका नरेश दशकंधर रावण ने भी यही किया था। दशानन रावण के अपने छोटे भाई विभीषण ने रावण को सीख देनी चाही कि वह जनकसुता वैदेही माता सीता जी को दयानिधि भगवान रामचंद्र जी के पास ससम्मान वापस भेजकर प्रभु की शरण में चला जाए, परंतु अहंकारी रावण ने विभीषण को लात मारकर लंका से बाहर निकाल दिया। वह मानो ऐसा ही था कि शरीर में दर्द हुआ और डाक्टर के पास जाकर कोई पेनकिलर ले लिया।

पवनपुत्र बजरंगबली हनुमान जी ने भी उसे सीख देनी चाही, पर अहंकारी रावण ने क्या किया? दशमुख रावण ने हनुमान जी को साधारण बंदर जानकर उनकी पूंछ में आग लगाने का आदेश दे दिया। मजे की बात यह है कि पूंछ में लपेटने के लिए कपड़ा और रूई रावण के, उस पर लगने वाला घी और तेल रावण का, आग जलाने के लिए अंगार रावण का और लंका जली रावण की। हम भी तो यही करते हैं। बुखार हो जाए तो उसे संदेशवाहक मानने के बजाय हम डाक्टर के पास पहुंच जाते हैं। अब डाक्टर की फीस भी हम देते हैं, दवा का पैसा भी हम खर्च करते हैं, इस सब में समय भी हम लगाते हैं और इससे हमारा इम्यून सिस्टम, हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर होती है, वह भी हमारी ही है, जो भविष्य के लिए हमारी सेहत की खराबी का कारण बनती है। हमारा शरीर एक पूरी फार्मेसी है, दवाखाना है, लेकिन हम अपने ही शरीर पर विश्वास नहीं करते, शरीर की क्षमताओं पर विश्वास नहीं करते और अज्ञानता तथा लापरवाही के कारण डॉक्टर के पास भागे चले आते हैं। इस अर्थ में अगर देखें तो हम सब भी रावण ही हैं जो खुद ही अपना नुकसान करने पर आमादा हैं। अपनी इस अज्ञानता या अहंकार में हम यह भूल जाते हैं कि सेहत हमारा सबसे बड़ा खजाना है। सेहत है तो हम स्वतंत्र हैं और सेहत खराब हुई तो हम अपने परिवार के सदस्यों की सहायता पर निर्भर हो जाएंगे, या छोटी से छोटी बातों के लिए भी डॉक्टर, नर्स, केयरटेकर आदि पर निर्भर हो जाएंगे। हमारी स्वतंत्रता बाधित होगी और पैसा खर्च होगा, सो अलग। सैर करना, घूमना-फिरना, पहाड़ों पर जाना, अच्छे भोजन का स्वाद लेना, ये सब कुछ तभी संभव होता है अगर सेहत अच्छी हो। हमारी सेहत वह चाबी है जो कई ताले खोल सकती है। अपनी सेहत की उपेक्षा करके तो हम जीवन के आनंद की उपेक्षा कर डालते हैं, और फिर भी खुद को शिक्षित, सभ्य और सामथ्र्यवान मानते हैं।

सुविधा होने पर शरीर को आवश्यक रोशनी और हवा का आनंद देना, नियमित सैर अथवा व्यायाम करना, ताजा शुद्ध और स्वास्थ्यकर भोजन लेना हमारी सेहत की गारंटी है। इसके विपरीत यदि बंद कमरों में बैठे रहकर काम करने पर, सैर न करने पर, स्वास्थ्यकर भोजन न लेने पर, पूरी नींद न लेने पर या ऐसे ही किसी और कारण से ब्लडप्रेशर हो जाए, शूगर हो जाए, किडनी खराब हो जाए, हार्ट की बीमारी हो जाए तो दवाइयां लेकर भी हम जीवन भर के लिए दवाइयों के गुलाम ही रहते हैं और मजबूरन कई सारे परहेज करने पड़ते हैं। डॉक्टरों के चक्कर काटकर, पैसे खर्च करके, जीवन भर के लिए बीमारी मोल लेकर और दवाइयों के गुलाम बनकर अगर हम खुश होते हैं तो यह सुविधा नहीं, हमारी नासमझी है और इस नासमझी पर खुश होने का कोई कारण नहीं है। चुनाव हमारा है कि खुद अपने ही लिए हम रावण बनकर अपना नुकसान खुद करते हैं या आवश्यक सावधानियां बरतते हुए अपनी सेहत का ध्यान रखकर परमात्मा के दिए इस शरीर का पूरा लाभ उठाकर अपना जीवन आनंदमय बनाते हैं। यह शिक्षा परिवार से शुरू होनी चाहिए, बचपन से ही शुरू हो जानी चाहिए। यह जिम्मेदारी परिवार के मुखिया मां-बाप की है, परिवार के बड़े बुजुर्गों की है, हमारी है, हम सबकी है। इसी में हमारा भला है।

स्पिरिचुअल हीलर

सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक

ई-मेल: indiatotal.features@gmail.com


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