ज्ञान का अहंकार
जब एक बार हम किसी बात के लिए बहाना गढ़ लेते हें तो बहाने गढऩा हमारी रुटीन में शामिल हो जाता है और हम जीवन के हर क्षेत्र में बहाने गढऩे की आदत पाल लेते हैं। जीवन में उतारे बिना हर ज्ञान बेकार है। बहुत-सी और भी ऐसी बातें होती हैं, घटनाएं होती हैं, जिन्हें हम परखने की कोशिश नहीं करते, उन पर विचार करने की कोशिश नहीं करते, सवाल नहीं उठाते। कभी वह अज्ञान के कारण होता है, कभी आलस्य के कारण और कभी आस्था के कारण। ऐसा ज्ञान हमेशा अहंकार ही होता है और इसका निराकरण ही ज्ञान का असली उद्देश्य है। ज्ञान पाने की कोशिश होनी चाहिए, होनी ही चाहिए, उसका विश्लेषण होना चाहिए, होना ही चाहिए, यदि वह किसी क्रिया से, किसी एक्शन से जुड़ा हो तो उसे जीवन में उतारना चाहिए, लेकिन कुछ नहीं कहा जा सकता कि वह ज्ञान कब छोटा साबित हो जाए, अधूरा साबित हो जाए, गलत साबित हो जाए। इसलिए ज्ञान के अहंकार से बचना चाहिए। जीवन का असली ज्ञान बस इतना सा ही है…
पढ़ी, सुनी, जानी बातें हमारे ज्ञान का हिस्सा बन जाती हैं। हमारे अनुभव हमारे ज्ञान का हिस्सा बन जाते हैं। फिर भी हम अक्सर यह नहीं समझ पाते कि ज्ञान का भंडार एक महासागर है जिसका ओर-छोर हमारी समझ से बाहर है। हमारा अज्ञान इतना बड़ा है कि अक्सर हम अपने अज्ञान को ही ज्ञान मान लेते हैं। सच तो यह है कि इस सच को समझने में मुझे काफी देर लगी। मैंने इसे बहुत बाद में समझा, पर जब समझ आ गई तो मेरा सारा अहंकार छूमंतर हो गया, गाल बजाना बंद हो गया, ज्ञान बघारना बंद हो गया और आत्मा में एक अजब सी चुप्पी छा गई। हम पढक़र, सुनकर, समझ कर, कल्पनाशक्ति से, ज्ञान की नई बातें सीखते हैं, प्रयोग करते हैं, फिर प्रयोग करते हैं और जब तसल्ली हो जाती है उस ज्ञान को ‘तथ्य’ के रूप, सत्य के रूप में, स्वीकार कर लेते हैं। विज्ञान के क्षेत्र में तो तब तक किसी बात को तथ्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता जब तक कि यह सिद्ध न हो जाए कि दुनिया के किसी भी कोने में, किसी भी व्यक्ति द्वारा उस तथ्य का, उस सत्य का अनुभव किया जा सकता है, बार-बार किया जा सकता है, हर बार किया जा सकता है। हम सब यही मानते हैं कि विज्ञान के क्षेत्र के तथ्य सार्वभौमिक सत्य हैं। पर सच क्या है? सच इसके विपरीत है। कारण यह है कि सारी प्रगति, सारे आविष्कारों और सारी घोषणाओं के बावजूद हमारा ज्ञान अभी बहुत शुरुआती स्तर का है। हम दरअसल अभी भी बहुत कम जानते हैं। अभी तो हम अपने शरीर को ही पूरी तरह से नहीं जान पाये हैं, ब्रह्मांड की समझ तो बहुत दूर की बात है। विज्ञान से संबंधित हमारे ज्ञान का हाल भी कुछ अलग नहीं है। हम भौतिक शास्त्र, यानी फिजिक्स की बात करें तो सर आइजैक न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत का प्रतिपादन किया और सन् 1687 में गति के नियम की खोज प्रकाशित की, जिससे कालांतर में क्लासिकल मकैनिक्स की नींव पड़ी।
न्यूटन के इन नियमों पर खूब बहस हुई और अंतत: उन्हें सार्वभौमिक सत्य के रूप में स्वीकार कर लिया गया। जब एक बार उन्हें सिद्ध हो चुका मान लिया गया तो दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने उन्हें अपना लिया, वैसे ही जैसे सेब का पेड़ से नीचे गिरना और ग्रहों का अपनी-अपनी कक्षा में, अपनी ऑर्बिट में चक्कर लगाना। अगर कोई व्यक्ति इन नियमों पर सवाल उठाता तो उसे अज्ञानी मान लिया जाता था। सार्वभौमिक सत्य के ज्ञान का यह अहंकार लंबे समय तक बना रहा, लेकिन बाद में सिद्ध हो गया कि न्यूटन के इन नियमों में बहुत सी कमियां थीं क्योंकि तब तक बहुत सी सच्चाइयां उद्घाटित नहीं हो पाई थीं, हमें उनकी जानकारी ही नहीं थी, उनकी खोज ही बाद में हुई। सन् 1861 में जेम्स क्लार्क मैक्सवैल की क्लासिकल थर्मोडायनामिक्स ने सिद्ध कर दिया कि न्यूटन के बताए नियम सार्वभौमिक सत्य नहीं थे। सन् 1905 में अलबर्ट आइंस्टीन ने समय के बारे में न्यूटन की अवधारणा को गलत सिद्ध कर दिया। सन् 1920 के मध्य में क्वांटम फिजिक्स की यह भी खोज हुई कि छोटे कण वैसा व्यवहार नहीं करते जैसा न्यूटन ने उम्मीद की थी। 1960 के दशक में स्ट्रिंग थ्योरी के प्रादुर्भाव से फिर यह सिद्ध हुआ कि क्वांटम थ्योरी अधूरी है, लेकिन 1990 के दशक में एम. थ्योरी की खोज ने स्ट्रिंग थ्योरी को भी अधूरा साबित कर दिया। अब शायद कभी यह भी हो जाए कि कोई नयी अवधारणा एम. थ्योरी को भी गलत या अधूरा साबित कर दे। आइंस्टीन बहुत सूझबूझ वाले और ज्ञानवान थे। उन्होंने कभी भी अपने मन में ज्ञान का अहंकार नहीं आने दिया। उन्होंने एक बार कहा था कि सिद्धांतत:, सिद्धांत और व्यवहार में कोई फर्क नहीं होता, लेकिन जब उसी सिद्धांत को व्यवहार में उतारा जाए तो यह संभव है कि दोनों में फर्क नजर आए। जब गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत के प्रतिपादन के लिए उन्होंने इक्वेशन बनाई, समीकरण बनाया तो इस समीकरण को, इस इक्वेशन को पूरा करने के लिए उन्होंने उसमें एक स्थायी अंक जोडऩे की बड़ी गलती कर डाली। बाद में उन्होंने खुद स्वीकार किया कि यह गलती थी। मजे की बात यह है कि बाद में वैज्ञानिकों ने पाया कि यह ‘गलती’ गलती थी ही नहीं, क्योंकि यह स्थायी अंक ब्रह्मांड का आधारभूत सत्य है। जब विज्ञान के क्षेत्र में ज्ञान को लेकर इतना असमंजस हो तो फिर आम आदमी के ज्ञान की क्या बात की जाए, क्या अहंकार किया जाए? असल ज्ञान, ज्ञान नहीं है, बल्कि यह जानना है कि हम कितने अज्ञानी हैं। सार्वभौमिक सत्य तो असल में यही है कि हमें अपने अज्ञान की थाह नहीं है और अपने अज्ञान को स्वीकार करने के अलावा और कोई ज्ञान नहीं है। बाकी सब तो अज्ञान ही है। ज्ञान का हाल ऐसा ही है। हम इस खुशफहमी में रहते हैं कि हम ‘जानते’ हैं। जहां यह भावना आ जाती है कि हम जानते हैं, वहां सीखने की इच्छा खत्म हो जाती है, नया दृष्टिकोण समझने की इच्छा खत्म हो जाती है और हम अपने ज्ञान के अधूरेपन में ही मस्त रहते हैं।
हमारे पास ज्ञान का जितना भी अंश है, यदि हम उसे जीवन में न उतारें तो हमारा दिमाग नये बहाने गढ़ लेता है कि हम इतने व्यस्त हैं कि उस ज्ञान का लाभ नहीं ले पा रहे, इस तरह से हम अपने ज्ञान के उस अंश को भी खुद ही नकार देते हैं। यह स्वीकार करने के बजाय कि हम आर्गेनाइज्ड नहीं हैं, हम अपने समय का सदुपयोग नहीं कर रहे, हम बहाने गढऩे लगते हैं। जब एक बार हम किसी बात के लिए बहाना गढ़ लेते हें तो बहाने गढऩा हमारी रुटीन में शामिल हो जाता है और हम जीवन के हर क्षेत्र में बहाने गढऩे की आदत पाल लेते हैं। जीवन में उतारे बिना हर ज्ञान बेकार है। बहुत-सी और भी ऐसी बातें होती हैं, घटनाएं होती हैं, जिन्हें हम परखने की कोशिश नहीं करते, उन पर विचार करने की कोशिश नहीं करते, सवाल नहीं उठाते। कभी वह अज्ञान के कारण होता है, कभी आलस्य के कारण और कभी आस्था के कारण। ऐसा ज्ञान हमेशा अहंकार ही होता है और इसका निराकरण ही ज्ञान का असली उद्देश्य है। ज्ञान पाने की कोशिश होनी चाहिए, होनी ही चाहिए, उसका विश्लेषण होना चाहिए, होना ही चाहिए, यदि वह किसी क्रिया से, किसी एक्शन से जुड़ा हो तो उसे जीवन में उतारना चाहिए, लेकिन कुछ नहीं कहा जा सकता कि वह ज्ञान कब छोटा साबित हो जाए, अधूरा साबित हो जाए, गलत साबित हो जाए। इसलिए ज्ञान के अहंकार से बचना चाहिए। जीवन का असली ज्ञान बस इतना सा ही है।
स्पिरिचुअल हीलर
सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक
ई-मेल: indiatotal.features@gmail.com
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