वैश्विक शांति का रास्ता बताता हिमाचली मंदिर
विभिन्न संस्कृतियां और राजनीतिक प्रणालियां एक साथ फल-फूल सकती हैं, बशर्ते हमारे पास एक साझा उच्च उद्देश्य और एक-दूसरे के प्रति संवेदनशीलता हो। हिमाचल की इस पावन देवभूमि से निकलता यह संदेश आज न्यूयॉर्क से लेकर कीव और तेहरान तक गूंजना चाहिए कि सह-अस्तित्व ही एकमात्र विकल्प है। हमें यह समझना होगा कि आधुनिक युग में सह-अस्तित्व अब अस्तित्व की अनिवार्य शर्त है…
आज की खंडित होती वैश्विक व्यवस्था में, जहां कूटनीति की शालीन भाषा मिसाइलों के भीषण गर्जन और युद्धक विमानों की गूृंज में कहीं खो गई है, शांति की तलाश एक मृगतृष्णा जैसी प्रतीत होती है। यूक्रेन के जलते हुए मैदानों से लेकर मध्य-पूर्व (ईरान-इजरायल संघर्ष) के तनावपूर्ण आसमान तक, आधुनिक सभ्यता एक बार फिर उसी आदिम चौराहे पर खड़ी है जहां ‘शक्ति ही सत्य है’ (माइट इज राइट) का नग्न और क्रूर नारा गूंज रहा है। ऐसे विषम समय में मानवता के लिए सबसे सार्थक समाधान शायद किसी अंतरराष्ट्रीय मंच के जटिल प्रस्तावों में नहीं, बल्कि भारतीय विरासत की जीवंत शिक्षाओं और जीवन-दृष्टि में निहित है। इसका एक सजीव उदाहरण हिमाचल की शांत देवदार वादियों में स्थित एक प्राचीन मंदिर के मौन, किंतु अर्थपूर्ण पत्थरों में संजोया हुआ है। कुल्लू घाटी के नग्गर में स्थित 12वीं शताब्दी का गौरी शंकर मंदिर केवल गुर्जर-प्रतिहार वास्तुकला का अवशेष मात्र नहीं है। वास्तव में, यह भारतीय संस्कृति के उस ‘विरोधाभास’ सिद्धांत का एक सजीव और शाश्वत ग्रंथ है, जो आज के जटिल वैश्विक संघर्षों का एक अत्यंत सटीक समाधान प्रस्तुत करता है। मत्स्यन्याय बनाम शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व : मंदिर के गर्भगृह की नीरवता में, काले पत्थर पर उकेरी गई शिव परिवार की प्रतिमा स्थापित है, जो सर्वोच्च ब्रह्मांडीय संतुलन का प्रतीक है। यहां एक ऐसा सामाजिक और दार्शनिक दृश्य हमारे सामने उभरता है जो मानवीय तर्क को चुनौती देता है। भगवान शिव और माता पार्वती के चरणों में उनके विभिन्न वाहन- सिंह और नंदी (बैल), मोर और सर्प, तथा सर्प और मूषककृपूरी शालीनता के साथ एक साथ विराजमान हैं। यदि हम प्राकृतिक विज्ञान और प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र के चश्मे से देखें, तो यहां ‘मत्स्यन्याय’ (मछलियों का कानून) लागू होना चाहिए था। ‘मत्स्यन्याय’ का अर्थ है वह व्यवस्था जहां शक्तिशाली जीव स्वाभाविक रूप से कमजोर को अपना ग्रास बनाता है। आज का अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य इसी मत्स्यन्याय का आधुनिक संस्करण है।
चाहे वह यूक्रेन में संप्रभुता का संघर्ष हो या मध्य-पूर्व में रणनीतिक वर्चस्व की जंग, राष्ट्र आज अपने हितों के लिए एक-दूसरे के अस्तित्व को मिटाने पर तुले हुए हैं। परंतु, नग्गर की इस पाषाण कला में एक सभ्यतागत चमत्कार विदित होता है। यहां प्रकृति के नियमों को ठेंगा दिखाते हुए शेर बैल पर वार नहीं करता, और नन्हा मूषक बिना किसी भय के विषैले सर्प के समीप बैठा है। भारतीय दर्शन इस विलक्षण अवस्था को ‘विरोधाभास’ कहता है। यह वह उच्च अवस्था है जहां घोर विरोधी तत्व भी अपनी जन्मजात शत्रुता और अहंकार को त्यागकर एक साझे सत्य के सामने नतमस्तक हो जाते हैं। इन जीवों ने अपना मूल स्वभाव नहीं छोड़ा है- शेर अभी भी शेर है, लेकिन एक ‘परम चेतना’ की उपस्थिति ने उनकी हिंसक आक्रामकता को विलीन कर दिया है।
वैश्विक संदर्भ : मतभेदों को साधना ही सामंजस्य है : नग्गर का यह पाषाण दृश्य आधुनिक राष्ट्रों और उनके नेताओं के लिए एक महान सभ्यतागत सबक है। वर्तमान वैश्विक युद्धों का मूल कारण यह है कि हम मतभेदों को स्वीकार करने के बजाय उन्हें बलपूर्वक मिटाकर एकरूपता (यूनिफोरमिटी) थोपना चाहते हैं। इतिहास गवाह है कि जब भी किसी एक विचारधारा या शक्ति ने दुनिया को अपने सांचे में ढालने की कोशिश की, परिणाम केवल विनाश ही रहा। नग्गर का यह मंदिर सिखाता है कि सच्चा सामंजस्य एकरूपता से नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व (को-एक्जीसटेंस) से आता है। प्रकृति विविधतापूर्ण है। हम किसी शेर को घास खाने वाले बैल में तब्दील नहीं कर सकते, और न ही किसी मोर से उसका शिकारी स्वभाव छीन सकते हैं। एक सशक्त वैश्विक समाज की खूबी यही है कि उसमें अलग-अलग विचारधाराओं, विभिन्न आस्थाओं और परस्पर विरोधी हितों वाले राष्ट्र अपनी पहचान खोए बिना एक साझा मानवता के निर्माण में योगदान दें। जिस प्रकार मंदिर में देवताओं के चेहरों पर सजी ‘शांत मुस्कान’ ने प्राकृतिक हिंसा को थाम रखा है, ठीक उसी प्रकार आज विश्व को एक ऐसी ‘उच्च नैतिक और संवैधानिक नैतिकता’ की आवश्यकता है जो राष्ट्रों के अहंकार और हितों के टकराव को नियंत्रित कर सके।
एक मूक चेतावनी और भविष्य का जोखिम : गौरी शंकर मंदिर की यह मूक पाषाण कृति आज के दौर में एक गंभीर चेतावनी भी देती है। पत्थरों में दर्शाया गया यह सामंजस्य तभी तक कायम है जब तक समाज को बांधने वाली ‘एकजुट करने वाली परोपकारी दृष्टि’ मजबूत है। यदि यह नैतिक और आध्यात्मिक शक्ति कमजोर पड़ती है, तो मानवता के पास फिर से उसी ‘मत्स्यन्याय’ वाले दौर में लौटने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। वह दौर, जहां केवल विनाश ही अंतिम सत्य होगा और आधुनिक हथियारों की होड़ पूरी सभ्यता को राख में बदल देगी। भारत की समन्वयवादी संस्कृति ने सदियों से सिखाया है कि शांतिपूर्ण सह-जीवन के लिए हमारा पूरी तरह से एक जैसा होना जरूरी नहीं है। विभिन्न संस्कृतियां और राजनीतिक प्रणालियां एक साथ फल-फूल सकती हैं, बशर्ते हमारे पास एक साझा उच्च उद्देश्य और एक-दूसरे के प्रति संवेदनशीलता हो। हिमाचल की इस पावन देवभूमि से निकलता यह संदेश आज न्यूयॉर्क से लेकर कीव और तेहरान तक गूंजना चाहिए कि सह-अस्तित्व ही एकमात्र विकल्प है। हमें यह समझना होगा कि आधुनिक युग में सह-अस्तित्व अब केवल एक नैतिक विकल्प नहीं, बल्कि अस्तित्व की अनिवार्य शर्त है। यदि हम पत्थरों में अंकित इस सादगी भरे संदेश को समझ लें, तो वैश्विक शांति का जटिल सच स्वत: ही स्पष्ट हो जाएगा। सादगी में छिपा यह सच ही वह पुल है जो हमें युद्ध की विभीषिका से निकालकर साझा समृद्धि के युग में ले जा सकता है।
कुमार रोहित, अपर केंद्रीय भविष्य निधि आयुक्त (मु.)
निदेशक (PDUNASS)
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ईमेल:Ñwrite2kumarrohit@outlook.com
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