मरना सीखा, जीना जाना
मृत्यु को समझ लें तो भय धीरे-धीरे पिघलने लगता है क्योंकि भय का मूल ही भविष्य है। मृत्यु भविष्य की घटना है, पर उसका डर वर्तमान को खा जाता है। जब हम वर्तमान में टिक जाते हैं, मृत्यु केवल एक तथ्य रह जाती है, डर नहीं। मरना सीखना एक क्रांतिकारी शिक्षा है। यह समाज की सिखाई हुई झूठी सुरक्षा को तोड़ता है। यह हमें सिखाता है कि असली सुरक्षा वस्तुओं में नहीं, जागरूकता में है। जो जाग गया, उसके लिए जीवन भी शिक्षक है और मृत्यु भी मित्र। जब यह समझ गहरी हो जाती है, तभी जीवन हमें यह सत्य सिखाता है कि मरना कोई अंत नहीं है। मरना एक शिक्षा है और जिसने यह शिक्षा सीख ली, उसने सच में जीना जान लिया…
मनुष्य जीवन की बात तो बहुत करता है, पर मृत्यु की बात से बचता रहता है। जैसे मृत्यु कोई अशुभ शब्द हो, जैसे उसे याद करने से जीवन कम हो जाएगा, पर वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। मृत्यु को समझे बिना जीवन की गहराई कभी खुलती ही नहीं। जिसने मरना सीख लिया, उसी ने वास्तव में जीना जाना, यह वाक्य कोई काव्यात्मक उक्ति भर नहीं, बल्कि जीवन का एक गहन सत्य है। हम ऐसा करेंगे तो सबसे पहले यह समझ में आएगा कि मृत्यु कोई एक दिन घटने वाली घटना नहीं है। वह जीवन की निरंतर प्रक्रिया है। हर दिन कुछ न कुछ हमारे भीतर मरता है, पुराने विचार, बीती हुई इच्छाएं, बीते हुए रिश्तों की छायाएं, यदि यह आंतरिक मृत्यु न हो, तो नया कभी जन्म ही न ले। इसलिए मृत्यु को जीवन का शत्रु मानना एक बड़ी भूल है। वह तो जीवन का द्वार है, जहां से होकर ही चेतना आगे बढ़ती है। आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो मृत्यु देह की है, चेतना की नहीं। देह बदलती है, नष्ट होती है, पर जो देखने वाला है, जो अनुभव करने वाला है, वह बना रहता है। समस्या तब खड़ी होती है जब हम स्वयं को केवल देह मान लेते हैं। तब देह का नाश हमें अपना अंत लगता है। यहीं से भय जन्म लेता है, यही भय जीवन को संकुचित कर देता है। इसके विपरीत जागरूकता से मृत्यु का स्मरण हमें वर्तमान में लाता है। अतीत अब नहीं रहा, भविष्य अभी आया नहीं। जो है, वह केवल वर्तमान क्षण है। मृत्यु-बोध इस वर्तमान को तीव्र बनाता है, तब हम जीवन को आधे मन से नहीं जीते। जो बदल रहा है, वह हम नहीं हैं, हम तो परिवर्तन के साक्षी हैं। जब यह बोध गहराता है, तब मृत्यु का डर धीरे-धीरे ढीला पडऩे लगता है। मृत्यु तब कोई अंधकार नहीं रहती, बल्कि परिवर्तन की स्वाभाविक अवस्था बन जाती है जैसे दिन ढलता है और रात आती है, न दुख, न भय।
जीवन की अधिकांश उलझनें मृत्यु के इन्कार से पैदा होती हैं। हम चीजों को पकडक़र रखना चाहते हैं, संपत्ति, पद, संबंध, पहचान, क्योंकि भीतर कहीं यह डर बैठा है कि छूट गया तो हम भी खो जाएंगे, पर जिसने मरना सीख लिया, वह जान जाता है कि खोने से ही वास्तविक पाना संभव होता है। छोडऩा ही हल्का करता है, और हल्कापन ही आनंद का द्वार है। यह समझ व्यवहार में भी क्रांति लाती है। तब हम काम तो करते हैं, पर उसमें अपनी पूरी पहचान नहीं बांधते। हम कर्म करते हैं, पर कर्म हमें परिभाषित नहीं करता। यह संतुलन तभी आता है जब मृत्यु-बोध भीतर जागता है। मृत्यु-बोध हमें न तो निराश बनाता है, न पलायनवादी। उलटे, वह हमें अधिक सजग और जीवंत बनाता है। जब हमें पता होता है कि समय सीमित है, तब हम जीवन को टालते नहीं। हम कहते नहीं, कल देखेंगे, कल जीएंगे। हम अभी जीते हैं। अभी की हंसी में पूरी तरह, अभी के काम में पूरी तरह, अभी के संबंध में पूरी तरह। हम ऐसा करेंगे तो प्रेम का स्वरूप भी बदल जाएगा। मृत्यु-बोध के बिना प्रेम अक्सर अधिकार बन जाता है। हम चाहते हैं कि दूसरा हमेशा वैसा ही रहे जैसा हम चाहते हैं। पर मृत्यु की सच्चाई हमें सिखाती है कि कोई भी चीज स्थायी नहीं। तब प्रेम स्वामित्व नहीं रहता, सहभागिता बन जाता है। हम साथ होते हैं, पर बांधते नहीं। यही प्रेम की परिपक्वता है। मनुष्य का सबसे गहरा संघर्ष जीवन से नहीं, मृत्यु से है और विडंबना यह है कि मृत्यु से यह संघर्ष जीवन के विरुद्ध ही खड़ा हो जाता है। जो मृत्यु को शत्रु मान लेता है, वह जीवन को भी भय के घेरे में जीता है। दर्शन का मूल प्रश्न यही रहा है कि क्या मृत्यु जीवन का अंत है, या जीवन की ही एक अनिवार्य कड़ी, और जैसे-जैसे यह प्रश्न स्पष्ट होता जाता है, वैसे-वैसे यह सत्य भी उजागर होता है कि जिसने मरना समझ लिया, वही जीने की कला तक पहुंच सका। आध्यात्मिक दृष्टि कहती है कि ध्यान भी एक प्रकार की मृत्यु है। ध्यान में हम विचारों को मरने देते हैं, पहचान को ढीला छोड़ देते हैं। कुछ क्षण ऐसे आते हैं जब ‘मैं’ नहीं रहता, केवल होना रहता है। वही क्षण हमें यह झलक देते हैं कि मृत्यु के पार भी कुछ है, एक मौन, एक शांति, एक विश्राम। यह अनुभव मृत्यु के भय को जड़ से हिला देता है। ऐसे में नैतिकता भी उपदेश नहीं रहेगी, समझ बन जाएगी। जो व्यक्ति अपनी क्षणिकता को जानता है, क्षणभंगुरता को जानता है वह अनावश्यक हिंसा नहीं करता, न शब्दों से, न कर्मों से।
वह जानता है कि सब नश्वर है, इसलिए करुणा अपने आप बहने लगती है। यह करुणा किसी नियम से नहीं, बोध से आती है। जीवन को नश्वर जान लें तो जीवन की गंभीरता भी बदल जाती है। मृत्यु-बोध जीवन को भारी नहीं बनाता, बल्कि हल्का करता है। जो जानता है कि अंत निश्चित है, वह जीवन को बहुत तूल नहीं देता। वह हंस सकता है, खेल सकता है, स्वयं पर भी मुस्कुरा सकता है। क्योंकि छवि बचाने का बोझ उतर चुका होता है। यदि जीवन अनंत होता, तो हर चीज टलती रहती। ‘अभी नहीं, बाद में’ जीवन का स्थायी मंत्र बन जाता। मृत्यु जीवन को सीमा देती है, और वही सीमा जीवन को मूल्यवान बनाती है। समय सीमित है, यह ज्ञान बहुत कीमती है। समय की सीमा के ज्ञान में ही जागरूकता संभव होती है। मरना सीखना वास्तव में झूठे केंद्र से हटना है। यह समझना कि हम केवल नाम, भूमिका या पहचान नहीं हैं। हम उससे कहीं व्यापक हैं। जब यह बोध स्थिर होता है, तब जीवन अपने आप बदल जाता है।
तब हम जीवन से लड़ते नहीं, उसके साथ बहते हैं, और अंतत:, जब यह समझ भीतर बैठ जाती है, तब जीवन और मृत्यु दो अलग घटनाएं नहीं रह जातीं। वे एक ही प्रवाह के दो छोर बन जाती हैं। तब मरना भी जीवन का हिस्सा लगता है, और जीना भी मृत्यु की छाया में खिलता हुआ उत्सव। मरना सीखने वाला व्यक्ति भविष्य में नहीं जीता। वह ‘कल’ के सहारे नहीं टिकता। उसका जीवन ‘अभी’ में उतर आता है। अभी की चाय में स्वाद होता है, अभी की बातचीत में सजीवता होती है, अभी की चुप्पी में गहराई होती है। जो अभी में जीता है, वही वास्तव में जीवित है। मृत्यु को समझ लें तो भय धीरे-धीरे पिघलने लगता है क्योंकि भय का मूल ही भविष्य है। मृत्यु भविष्य की घटना है, पर उसका डर वर्तमान को खा जाता है। जब हम वर्तमान में टिक जाते हैं, मृत्यु केवल एक तथ्य रह जाती है, डर नहीं। मरना सीखना एक क्रांतिकारी शिक्षा है। यह समाज की सिखाई हुई झूठी सुरक्षा को तोड़ता है। यह हमें सिखाता है कि असली सुरक्षा वस्तुओं में नहीं, जागरूकता में है। जो जाग गया, उसके लिए जीवन भी शिक्षक है और मृत्यु भी मित्र। जब यह समझ गहरी हो जाती है, तभी जीवन हमें यह सत्य सिखाता है कि मरना कोई अंत नहीं है। मरना एक शिक्षा है और जिसने यह शिक्षा सीख ली, उसने सच में जीना जान लिया।
स्पिरिचुअल हीलर
सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक
ई-मेल: indiatotal.features@gmail.com
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