रब दा की पाणा?
जब हम बार-बार उसी एक पर ध्यान लगाते हैं, तो हमारा मन शांत होने लगता है, क्योंकि अब वह इधर-उधर भटक नहीं रहा होता। यही एकाग्रता की शुरुआत है, यही ध्यान की पहली सीढ़ी है। बाबा बुल्ले शाह के भीतर जो परिवर्तन आया, वह किसी किताब से नहीं आया, वह अनुभव से आया। यह अनुभव तब जन्म लेता है जब हमारा अहंकार टूटता है। हमने अपने पूरे व्यक्तित्व को उसी के इर्द-गिर्द बना रखा है। हम जो भी करते हैं, उसमें हमेशा ‘मैं’ छिपा होता है- मैं जानता हूं, मैं कर सकता हूं, मैं श्रेष्ठ हूं। लेकिन आध्यात्मिक मार्ग पर यही ‘मैं’ सबसे बड़ी दीवार बन जाता है। ‘रब दा की पाणा? एधरों पुट्टणा ते ओधर लाणा।’ यह वाक्य अपने आप में पूरा अध्यात्म है। हम यदि इसे गहराई से समझें, तो पाएंगे कि इसमें कोई जटिल साधना नहीं है, कोई कठिन तपस्या नहीं है। केवल एक बात कही गई है, अपना ध्यान जहां अभी लगा हुआ है, वहां से हटाकर उस एक पर लगा दो…
‘रब दा की पाणा’- यह केवल एक वाक्य नहीं है, यह पूरी आध्यात्मिक यात्रा का सार है। जब हम इस वाक्य को सुनते हैं तो लगता है जैसे कोई बहुत सरल बात कही जा रही है, लेकिन जब हम इसके भीतर उतरते हैं, तो पता चलता है कि यह सरलता ही सबसे गहरा ज्ञान है। हम जीवन भर पाने में लगे रहते हैं- ज्ञान पाना, पद पाना, सम्मान पाना, संपत्ति पाना, लेकिन इन सबके बावजूद हमें कभी शांति नहीं मिल पाती। हम जितना बाहर इक_ा करते हैं, भीतर उतना ही अशांत होते जाते हैं। यही वह बिंदु है जहां से आध्यात्मिकता की यात्रा शुरू होती है। जब हम इन इक_ा की गई चीजों, डिग्रियों, सम्मान आदि की निस्सारता समझ जाते हैं तो परमात्मा की ओर मुड़ जाते हैं और तब लगता है कि परमात्मा को पाना कोई क्रिया नहीं है, कोई जप, तप, यज्ञ नहीं है, बस खुद को पहचानना ही है। परमात्मा की खोज कहीं बाहर है ही नहीं, परमात्मा को खोजा ही नहीं जा सकता। ‘रब दा की पाणा?’ इसी का खुलासा है जो हमें सूफी संत बाबा बुल्ले शाह के जीवन की एक घटना में मिलता है। ज्ञान का अहंकार बहुत सूक्ष्म होता है। हम सोचते हैं कि हम जितना अधिक पढ़ेंगे, जितना अधिक जानेंगे, उतने ही अधिक ज्ञानी हो जाएंगे। लेकिन यह जानना ही कई बार सबसे बड़ा पर्दा बन जाता है। बुल्ले शाह जी ने बहुत से ग्रंथ पढ़ लिए थे, उन्हें शास्त्रों का गहरा ज्ञान था, लेकिन भीतर शांति नहीं थी। यह वही स्थिति है जिसमें आज का मनुष्य भी जी रहा है।
हमारे पास जानकारी बहुत है, लेकिन अनुभूति नहीं है। हमारे पास शब्द बहुत हैं, लेकिन मौन नहीं है। जब हम इस अवस्था में अपने भीतर देखते हैं, तो पाते हैं कि हमारा सारा ज्ञान केवल संग्रह है, अनुभव नहीं। और संग्रह कभी भी संतोष नहीं देता, क्योंकि संग्रह में ‘मैं’ बचा रहता है और यही ‘मैं’ सबसे बड़ा अवरोध है। जब बुल्ले शाह अपने गुरु शाह इनायत कादरी के पास पहुंचे, तो उन्होंने वही किया जो हर नया साधक करता है- अपनी उपलब्धियों का प्रदर्शन। यह स्वाभाविक है, क्योंकि हमारा मन हमेशा यह चाहता है कि हमें मान्यता मिले। लेकिन गुरु की दृष्टि अलग होती है। गुरु को यह नहीं देखना होता कि हमने क्या इक_ा किया है, बल्कि यह देखना होता है कि हम भीतर से कितने खाली हुए हैं। इसलिए शाह इनायत मुस्कुराए और उन्होंने बुल्ले शाह को एक कोने में बैठकर अरबी वर्णमाला के पहले अक्षर ‘अलिफ’ लिखते रहने को कहा। बुल्ले शाह कई दिनों तक केवल ‘अलिफ’ ही लिखते रहे। पहले तो उन्हें बहुत अजीब लगा, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें समझ आने लगा कि ‘अलिफ’ का अर्थ है ‘एक’, यानी वह एक ईश्वर, जो हर जगह मौजूद है। जब शाह इनायत ने बुल्ले शाह को केवल ‘अलिफ’ लिखने को कहा, तो यह कोई साधारण निर्देश नहीं था, यह उनके पूरे ज्ञान को शून्य करने की प्रक्रिया थी। ‘अलिफ’ केवल एक अक्षर नहीं था, वह एक संकेत था- एकता का, एकत्व का, उस एक परम सत्य का, जो हर जगह व्याप्त है। ‘अलिफ’ के इस ज्ञान के बाद जब बुल्ले शाह वापस अपने गुरु के पास आए, तो शाह इनायत ने उन्हें गले लगा लिया और कहा- ‘बुल्लेया, रब दा की पाणा? एधरों पुट्टणा ते ओधर लाणा।’ सारी आध्यात्मिक यात्रा का सार बस इन्हीं कुछ शब्दों में सिमटा हुआ है। इसका अर्थ था कि ईश्वर को पाना कोई कठिन काम नहीं है, बस अपना ध्यान दुनिया की मोह-माया से हटाकर उस एक ‘अलिफ’ यानी परमात्मा की ओर लगाना है।
इस अनुभव की पहली सीख है सादगी। आध्यात्मिक मार्ग पर किताबी ज्ञान से बड़ा ‘अनुभव’ और ‘सादगी’ है। इसकी अगली सीख है एकाग्रता। जब हम बिखरना छोडक़र उस एक परमात्मा पर ध्यान लगाते हैं, तभी हमें शांति मिलती है, और इसकी सबसे बड़ी सीख है अहंकार का त्याग। परमात्मा की शरण में शून्य होकर जाने से ही ज्ञान की प्राप्ति होती है। हम यदि इस ‘अलिफ’ को अपने जीवन में उतारें, तो देखेंगे कि हमारी सारी जटिलताएं धीरे-धीरे समाप्त होने लगती हैं। ‘अलिफ’ हमें सिखाता है कि सब कुछ उसी एक से उत्पन्न हुआ है और उसी में विलीन हो जाता है। लेकिन समस्या यह है कि हमारा मन विभाजन में जीता है- यह अच्छा, यह बुरा, यह मेरा, यह तेरा, यह ऊंचा, यह नीचा। जब तक यह द्वैत बना रहता है, तब तक हम उस एक को नहीं देख पाते। ‘अलिफ’ का अभ्यास हमें धीरे-धीरे इस द्वैत से ऊपर उठाता है। जब हम बार-बार उसी एक पर ध्यान लगाते हैं, तो हमारा मन शांत होने लगता है, क्योंकि अब वह इधर-उधर भटक नहीं रहा होता। यही एकाग्रता की शुरुआत है, यही ध्यान की पहली सीढ़ी है। बाबा बुल्ले शाह के भीतर जो परिवर्तन आया, वह किसी किताब से नहीं आया, वह अनुभव से आया। यह अनुभव तब जन्म लेता है जब हमारा अहंकार टूटता है।
हमने अपने पूरे व्यक्तित्व को उसी के इर्द-गिर्द बना रखा है। हम जो भी करते हैं, उसमें हमेशा ‘मैं’ छिपा होता है- मैं जानता हूं, मैं कर सकता हूं, मैं श्रेष्ठ हूं। लेकिन आध्यात्मिक मार्ग पर यही ‘मैं’ सबसे बड़ी दीवार बन जाता है। ‘रब दा की पाणा? एधरों पुट्टणा ते ओधर लाणा।’ यह वाक्य अपने आप में पूरा अध्यात्म है। हम यदि इसे गहराई से समझें, तो पाएंगे कि इसमें कोई जटिल साधना नहीं है, कोई कठिन तपस्या नहीं है। केवल एक बात कही गई है, अपना ध्यान जहां अभी लगा हुआ है, वहां से हटाकर उस एक पर लगा दो। आध्यात्मिकता हमें सिखाती है कि हम इस दौड़ को देखें, इसे समझें, और धीरे-धीरे इससे मुक्त हों। जब हम यह करना शुरू करते हैं, तो हमें अनुभव होता है कि शांति कहीं बाहर नहीं है, वह तो हमेशा हमारे भीतर ही थी। अंतत: ‘रब दा की पाणा’ का उत्तर यही है कि रब को पाने के लिए कुछ पाना नहीं, बल्कि बहुत कुछ छोडऩा होता है। हमें अपने भीतर के शोर को छोडऩा होगा, अपने अहंकार को छोडऩा होगा, अपनी झूठी पहचान को छोडऩा होगा। जब हम यह छोडऩा सीख जाते हैं, तो पाते हैं कि जिसे हम खोज रहे थे, वह कभी हमसे दूर था ही नहीं। वह हमेशा हमारे भीतर था, हमारे चारों ओर था, हर श्वास में था। बस हमारा ध्यान इधर-उधर भटक रहा था। जब वह ध्यान उस एक पर स्थिर हो जाता है, तब जीवन में एक अद्भुत शांति उतरती है, ऐसी शांति, जो किसी भी बाहरी परिस्थिति से प्रभावित नहीं होती। यही सच्चा पाना है, यही ‘रब दा की पाणा’ का रहस्य है।
स्पिरिचुअल हीलर
सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक
ई-मेल: indiatotal.features@gmail.com
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