एनसीईआरटी पढ़ाएगी एमरजेंसी का चैप्टर, कक्षा नौवीं के सिलेबस में शामिल
कक्षा नौवीं के सिलेबस में शामिल, इलेक्शंस चैप्टर में चुनाव आयोग की भी तारीफ
दिव्य हिमाचल ब्यूरो—नई दिल्ली
एनसीईआरटी यानी नेशनल काउंसिल फॉर एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग ने पहली बार कक्षा 9 की सामाजिक विज्ञान की किताब में 1975-77 की एमरजेंसी को शामिल किया है। नई किताब ‘अंडरस्टैंडिंग सोसाइटी-इंडिया एंड बियॉन्ड’ में एमरजेंसी को भारतीय लोकतंत्र के सामने आई सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बताया गया है। एनसीईआरटी के एक अधिकारी ने पुष्टि की है कि कक्षा 9 की किताब में पहली बार एमरजेंसी पर अलग सेक्शन जोड़ा गया है। इसके अलावा ‘अंडरस्टैंडिंग सोसाइटी-इंडिया एंड बियॉन्ड- पार्ट 1’ के ‘इलेक्शंस’ चैप्टर में चुनाव आयोग की तारीफ की गई है। किताब में लिखा गया है कि 1970 के दशक की शुरुआत में इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ लोगों में नाराजगी बढ़ रही थी। बेरोजगारी, महंगाई और कुप्रबंधन के आरोपों के कारण कई जगह विरोध प्रदर्शन हुए। इसके बाद जून 1975 में आंतरिक अशांति के आधार पर राष्ट्रीय एमरजेंसी लागू की गई।
किताब के अनुसार, इस दौरान अधिकांश मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए, प्रेस पर सेंसरशिप लगाई गई और कई राजनीतिक नेताओं व कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया। पुस्तक में कहा गया है कि इस दौर में लोकतांत्रिक संस्थाओं पर दबाव बढ़ा और लोगों की स्वतंत्रता सीमित हो गई। किताब में लोकनायक जयप्रकाश नारायण की भूमिका को भी विस्तार से बताया गया है। इसमें कहा गया है कि उन्होंने छात्रों और आम लोगों को संगठित किया और बिहार तथा गुजरात में बड़े जन आंदोलन खड़े हुए। पुस्तक के मुताबिक, 1977 में एमरजेंसी खत्म होने के बाद आम चुनाव कराए गए। जनता ने मतदान के जरिए अपनी राय दी और सत्तारूढ़ सरकार चुनाव हार गई। किताब में इसे भारतीय लोकतंत्र की मजबूती का उदाहरण बताया गया है।
लोकतंत्र के सामने दूसरी चुनौतियां भी
एमरजेंसी के अलावा किताब में लोकतंत्र के सामने मौजूद दूसरी चुनौतियों पर भी चर्चा की गई है। इनमें फेक न्यूज, गलत सूचनाएं, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, नियमों का उल्लंघन, गरीबी, क्षेत्रवाद, सामाजिक भेदभाव और लैंगिक असमानता शामिल हैं। एनसीईआरटी ने पहली बार ‘डेमोक्रेसी एंड यू’ नाम का नया सेक्शन भी जोड़ा है। इसका मकसद छात्रों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अपनी भूमिका समझाना है। किताब में भारत की लोकतांत्रिक परंपराओं और संस्थाओं पर भी खास फोकस किया गया है। इसमें बताया गया है कि भारत में लोकतांत्रिक सोच और भागीदारी की परंपरा काफी पुरानी है।
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