हिमाचल की रसोई से
नितिका कुठियाला
पाकशास्त्री व शोधकर्ता
सफर खुद में एक मंजिल है! मैं हमेशा से मानती आई हूं कि यात्रा इस बात पर निर्भर नहीं करती कि आप कितनी दूर जाते हैं या कितना खर्च करते हैं। सफर दूरी या बजट से शुरू नहीं होता, वह जिज्ञासा से शुरू होता है। आज हर व्यक्ति अपनी जेब और अपनी सुविधा के अनुसार यात्रा कर सकता है। कभी-कभी तो अपने शहर से बाहर निकलने की भी जरूरत नहीं होती। अपने घर से महज 50 किलोमीटर के दायरे में यात्रा करके भी आप कुछ नया सीखकर, कुछ नया जानकर और कुछ नई यादें लेकर लौट सकते हैं। चाहे कोई जगह आपको कितनी भी परिचित क्यों न लगे, उसमें हमेशा कोई न कोई नई कहानी छिपी होती है, वहां के लोगों में, उनकी यात्राओं में, खान-पान में, शिल्प में, परंपराओं में, बदलते परिवेश में और उन छोटी-छोटी चीजों में, जिन्हें हम अकसर नजरअंदाज कर देते हैं। मैं यह अपने व्यक्तिगत अनुभव से कह रही हूं। जहां मैं रहती हूं, वहां से ताजमहल तक पहुंचने में मुश्किल से तीन घंटे लगते हैं। नजदीक होने के कारण मैं कई बार आगरा जा चुकी हूं, लेकिन हर बार वहां जाकर उतनी ही मंत्रमुग्ध होती हूं। दुनिया के सात अजूबों में शामिल ताजमहल अपने आप में आगरा आने की एक बड़ी वजह है, लेकिन आगरा में रुकने की वजह सिर्फ ताजमहल नहीं है। स्मारक से थोड़ा आगे बढक़र देखिए, तो आपको एक ऐसा शहर दिखाई देता है जो अपने शिल्प और खान-पान की समृद्ध परंपराओं से भरा हुआ है। संगमरमर पर की जाने वाली पच्चीकारी और उस पर की गई बारीक नक्काशी, आगरा की अद्भुत कारीगरी का खूबसूरत उदाहरण हैं। ताजमहल में जब भी जाती हूं मेरी नजर किसी न किसी ऐसी बारीकी पर टिक जाती है, जिसे शायद पिछली यात्रा में मैंने देखा ही नहीं था। उसकी भव्यता कभी पुरानी नहीं लगती।
लेकिन मेरे लिए आगरा की असली खूबसूरती ताजमहल के बाहर शुरू होती है। यहां के लोग, उनकी कहानियां और सबसे बढक़र, यहां का खाना आपको थोड़ी देर और रुकने या बार-बार लौटकर आने के लिए मजबूर करता है। यह लिखते हुए भी मैं अपने मन में आगरा की गलियों से गुजर रही हूं, वहां खाए हुए खाने को फिर से याद कर रही हूं और सच कहूं तो मुंह में पानी आ रहा है। अगर आगरा के खाने को अनुभव करना है तो पहला नियम है, सुबह जल्दी शुरुआत कीजिए। सुबह की शुरुआत गरमागर्म बेड़ई और तीखे आलू से कीजिए और अगली जगह जाने की जल्दी मत कीजिए। दो प्लेट खाइए, साथ में एक गिलास लस्सी लीजिए और आराम से बैठिए। यह कॉम्बिनेशन किसी नींद की दवा से कम नहीं! और अगर आप आगरा आए और यहां की चाट नहीं खाई, तो क्या सच में आगरा आए? मेरे जैसे चटोरे के लिए चाट का आकर्षण छोड़ पाना मुश्किल है। कुरकुरे, तले हुए आलू, ऊपर से मसालों की भरपूर परत, इससे भला कौन बच सकता है! इसके बाद गर्मी के दिनों में आइसक्रीम फालूदा किसी रेगिस्तान में नखलिस्तान जैसा लगता है। आगरा का बन मस्का और चाय भी कुछ अलग ही स्वाद देता है। और यहां के भरवां पराठों को भी आपकी फूड ट्रेल में अपनी खास जगह मिलनी चाहिए। और अगर आप मांसाहारी हैं, तो आगरा का मुगलई खाना जरूर चखिए। यह अपने आप में एक पूरा अनुभव है। बेशक, मैंने यह सब एक ही दिन में नहीं खाया और आपको भी ऐसा नहीं करना चाहिए! आगरा को महसूस करने के लिए कम से कम दो-तीन दिन निकालिए। तभी आप इस शहर को सिर्फ देखेंगे नहीं, बल्कि इसे महसूस भी कर पाएंगे। अपनी एक यात्रा के दौरान हमें ‘ट्राइडेंट-आगरा’ में ठहरने का बेहद आरामदायक और शानदार अनुभव मिला।
उनकी मेहमाननवाजी, खाना और खूबसूरत प्राकृतिक वातावरण ने हमारे प्रवास को अपने आप में एक अनुभव बना दिया। बच्चों के साथ यात्रा कर रहे परिवारों के लिए भी यहां उन्हें व्यस्त और खुश रखने वाली कई गतिविधियां हैं। इसलिए अगर आप आगरा जाने की योजना बना रहे हैं, तो सिर्फ ताजमहल देखने मत जाइए। थोड़ा और रुकिए। शहर को उसके सबसे प्रसिद्ध स्मारक से आगे जाकर महसूस कीजिए। गलियों में घूमिए, लोगों से मिलिए। उनकी कहानियां सुनिए। भरपूर खाइए। यहां के शिल्प को देखिए। छोटी-छोटी बारीकियों पर ध्यान दीजिए। और जब लौटें तो खाली हाथ वापस मत आइए। अपने साथ आगरा की खूबसूरत पच्चीकारी संगमरमर पर की जाने वाली प्रसिद्ध जड़ाऊ कला, कुछ पैकेट दालमोठ और जाहिर है, शहर का विश्वप्रसिद्ध आगरा का पेठा जरूर लेकर आइए। क्योंकि शायद यही तो असली यात्रा है सिर्फ जगहों को अपनी यात्रा सूची में जोडऩा नहीं, बल्कि रास्ते में कहानियां, स्वाद, मुलाकातें, बातचीत और यादें इक_ी करना। और इसी मीठे नोट के साथ, अगले सप्ताह फिर मिलेंगे, एक नई कहानी के साथ। तब तक सफर करते रहिए, चाहे वह सफर आपके घर से सिर्फ 50 किलोमीटर दूर से ही क्यों न शुरू हो।
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