फोबिया के मनोमस्तिष्क पर दुष्प्रभाव
जे.पी. शर्मा, मनोवैज्ञानिक
नीलकंठ, मेन बाजार ऊना मो. 9816168952
इनसानी मूल प्रवृत्तियों व फितरती मनोमानसिकताओं में एक डर की भावना भी होती है जिसमें प्रत्यक्ष व परोक्ष दोनों किस्म की भावनाएंं होती हैं। समक्ष नजर आने वाले डर प्रत्यक्ष होते हैं, अनजाने डर परोक्ष रहते हैं, जो सर्वाधिक असुरक्षा भावना पैदा करते हैं। यही डर लगातार विचलित करते रहें तो फोबिया के रूप में गंभीर शक्ल में अर्धचेतन मन में स्थापित हो ताउम्र परेशान किए रहते हैं। विशेषतया बचपन काल से ही उत्पन्न व जनित भय भावनाएं ज्यादा उद्वेलित करती रहती हैं, बाल्यकाल में घटी परेशानीकुन घटनाएं स्थायी रूप से मानस पटल पर हावी हो फोबियाज बन जाती हंै, जिनमें पानी में डूबना, आग से झुलसना, पीड़ादायक चोट, दुर्घटना, कामुक दुव्र्यवहार (अकसर लड़कियों में) सर्जरी पीड़ा, दबाव, कथित आरोपित तांत्रिक दुष्प्रभाव क्रिया, विशेष चोटवश नाक, कान आदि संवेदनबाधिकता आदि शामिल हैं। इसके अलावा बच्चों की शरारतों पर अंकुश लगाने हेतु माता-पिता, अभिभावकों, बड़े बहन-भाइयों, मित्रों संबंधियों द्वारा उन्हें भूतों, अंधेरे कमरे, अलमारी या संदूक में बंद करने का डर, इन्जेक्शन या सूई का डर बाबाओं का पकड़ कर बोरी में बंद कर ले जाना आदि का डर दिखाना भी शामिल है। इनसे बच्चों के अबोध, मासूम, अविकसित मन में अनावश्यक डर समा जाता है, जो जिंदगीभर उनका पीछा नहीं छोड़ता। यह घर-घर की स्वाभाविक, नियमित क्रियाएं हैं जो बच्चों को अनुुशासित करने के नाम पर या अतिरेकवश की जाती है, जो अत्यंत विनाशकारी परिणाम देती हैं।
बच्चा व्यस्क होने पर बेशक चेतनमन में परिपक्व हो जाता है, परंतु अर्धचेतन मन में बरसों से स्थापित डर ज्यों का त्यों बना रह कर फोबिया का रूप धारण करके सदा डरता रहता है। अकसर देखने में आता है कि ऐसे बच्चे बड़े होकर जब शिक्षाकाल समय होस्टल में अकेले रहते हैं या रोजगारी कार्यकाल टूअर पर अकेले होटलों में रहते हैं, तो एकाकीपन व असुरक्षा भावना ग्रस्त दुविधा में पड़े रहते हैं। जरा सी आहट उन्हें अंधेरे के अस्तित्वहीन भूतों व आत्माओं के डर से सोने नहीं देती, दरवाजे में अव्यवस्थित, वेशभूषा धारण किए कोई मांगने वाला भी अजनबी दिखाई दे, तो वे किसी अनहोनी के डर से भयभीत हो जाते हैं। बंद कमरे की चिटखनी खुलने में देरी हो जाए, तो किसी अकेले कमरे में बंद हो जाने की भयभावना से विचलित हो जाते हैं।
आग के फोबिया ग्रस्त बच्चे बड़े होकर दिवाली के सुरक्षित पटाखे तक भी नहीं चला पाते, पानी के डर से भ्रमण टूर पर जा जलप्रयंत व झरनों तक का भी दूर से ही नजारा कर काम चला लेते हैं। नौकाभ्रमण से तो कोसों दूर रहते हैं, कई व्यक्तियों को उंचाई से नीचे देखने तक पर कयामत ही लगती है। बचपन में गिर कर चोट खाई होती है या मांओ ने छत से नीचे गिरा देने का डर दिखाया होता है। शिक्षा काल में अपनी या सहयोगी मित्रों की लापरवाही से आंख, कान या नाक में पेंसिल आदि चली जाने की पीड़ा जीवनभर नुकीले उपकरणों से भयभीत रखती है। कई अच्छे भले लोग कभी पूर्व में करंट लगने का स्मरण करते हुए साधारण स्विच तक भी बड़ी सावधानी से ही चला पाते हैं। बल्ब बदलना तक उन्हें गंवारा नहीं होता।
ऐसी असंख्य घटनाएं व प्रमाण हैं जो सामान्य भय से फोबिया तक की शक्ल में सदैव असुरक्षा भावना से ग्रस्त रखकर आजीवन व्यक्ति को विचलित करती रहती हैं। लेखक स्वयं भी ऐसी भय भावनाओं का भुक्तभोगी रहा है। बाल्यकाल में एक गलत टीकाकरण उपरांत हुई असहनीय पीड़ा आज तक उसे इन्जेक्शन लगवाने से यथासंभव दूर रखती है। अत: मांओ व बड़ों को मनोपरामर्श है कि बच्चों पर अंकुश लगाने हेतु या अतिरेक भावनावश उन्हें डराना बंद करें जो बच्चों की भावी सुखद मनोसेहत के लिए ठीक नहीं है। यदि सामान्यता संयोगवश किसी दुर्घटनावश उन्हें पीड़ा भी पहुंचे, तो उन्हें तर्कपूर्ण ढंग से समझा कर प्यार से सहज अनुभव करवाएं ताकि वे ऐसी पीड़ाओं का फोबिया न पालें, सहज रहकर सरल जीवन जिएं।
आम व्यस्क जनमानस को भी मनोपरामर्श है कि यथासंभव असामान्य पीड़ाओं, वेदनाओं, घटनाओं को तर्कसंगततानिहित सामान्य सहजता से देखें, कोई भी भय, असुरक्षा भावना या अवांछित, अनावश्यक, अनर्गल फोबिया का शिकार न बनें। इस अकाट्य सत्य को स्वीकार करें कि जीवन में सभी सहज, सुखद, सरल, सुगम, सुलभ सामान्य नहीं रहता। विषय परिस्थितियां भी अपरिहार्य होती हैं। उन्हें भी संघर्ष, संयमित, संतुलित रहकर स्वीकार कर सक्षमता से सामना करें। निमूर्ल अनहोनी आशंकाओं की कल्पना से असुरक्षा भावना न पालें। जीवन चक्र के सभी उतार-चढ़ावों पर सहजता व संतुलन बना कर रखें, विचलित न हों, सुखद आशाएं बनाए रखें। हर विपरीत हालात को बिना भय, चुनौती के रूप में लें।
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