इंटरनेट जनता का संवैधानिक अधिकार, उम्र के आधार पर रोक लगाना बेतुका

By: Oct 17th, 2026 10:12 pm

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी; कहा, बच्चों को दूर नहीं रख सकते

ऑनलाइन सुरक्षा और स्वतंत्रता एक-दूसरे के विरोधी नहीं
यौन शोषण वाले कंटेंट हटाने के लिए डाटाबेस बनाने का निर्देश

अदालत ने सोशल मीडिया पर सुरक्षा उपाय सुझाए

– बच्चों के अकाउंट डिफॉल्ट रूप से निजी रखे जा सकते हैं।
– अनजान वयस्कों के संपर्क और संदेशों पर पाबंदियां लगाई जा सकती हैं।
– बच्चों को दिखाई जाने वाली सामग्री और विज्ञापनों को नियंत्रित किया
जा सकता है।
– कम उम्र के बच्चों के मामले में अभिभावकों की सहमति की पुष्टि के लिए उचित उपाय अपनाए जा सकते हैं।

दिव्य हिमाचल ब्यूरो — नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हर व्यक्ति की तरह बच्चों को भी इंटरनेट तक पहुंचने और उसका इस्तेमाल करने का मौलिक अधिकार है। बच्चों की उम्र चाहे जो भी हो, उन्हें इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने आगाह किया कि सुरक्षा के नाम पर बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगाने से उनकी स्वतंत्रता और निजता प्रभावित हो सकती है। इससे ऑनलाइन दुव्र्यवहार का सामना करने वाले बच्चों के लिए मदद मांगना भी मुश्किल हो सकता है। बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह दूर रखना बेतुका होगा। कोर्ट ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा और उनकी आजादी, दोनों जरूरी हैं। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी चंद्रन की पीठ ने यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा और उनकी स्वतंत्रता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। बच्चों को दोनों का अधिकार है। पीठ के मुताबिक, इंटरनेट इस्तेमाल करने का मौलिक अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 19(1) (ए) में दिए गए भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ जुड़ा है।

कोर्ट ने कहा कि इंटरनेट पर गलत कंटेंट होने के कारण इसे बच्चों के लिए बैन करना सही नहीं है। ऐसी पाबंदियों से बच्चे कम सुरक्षित वेबसाइटों और प्लेटफॉर्म पर जा सकते हैं। ऑनलाइन धमकी या शोषण का सामना करने वाले बच्चे शिकायत करने से भी डर सकते हैं। कोर्ट ने बच्चों के यौन शोषण और दुव्र्यवहार से जुड़े ऑनलाइन कंटेंट को पहचानने और हटाने की व्यवस्था मजबूत करने से जुड़े मामले में ये टिप्पणियां कीं। कोर्ट ने कहा कि एक प्लेटफॉर्म से ऐसे कंटेंट हटने के बाद भी वह दूसरे प्लेटफॉर्म पर मौजूद रह सकता है। इससे निपटने के लिए कोर्ट ने केंद्र को ऐसे कंटेंट का नेशनल डेटाबेस बनाने का निर्देश दिया है। सोशल मीडिया कंपनियों को भी कंटेंट हटाने के दो घंटे के भीतर पुलिस या साइबर क्राइम पोर्टल को रिपोर्ट देनी होगी। अदालत ने माना कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर चिंताएं वास्तविक हैं, लेकिन इनके समाधान के तौर पर इंटरनेट तक उनकी पहुंच पूरी तरह बंद करना उचित नहीं होगा। इंटरनेट आज शिक्षा, जानकारी हासिल करने और सामाजिक जुड़ाव का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। अदालत ने कहा कि बच्चों की उम्र के आधार पर सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने जैसे प्रस्ताव प्रभावी साबित होंगे, इस पर भी सवाल हैं। ऐसी पाबंदियों का उलटा असर हो सकता है और बच्चे कम नियंत्रित, ज्यादा खतरनाक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म या वेबसाइटों की ओर जा सकते हैं।

कमाई जब्त करने के निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी अश्लील सामग्री को पेड सब्सक्रिप्शन के जरिए उपलब्ध कराने पर रोक लगाने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने केंद्र से नियम तोडऩे वाले प्लेटफॉर्म पर भारी जुर्माने और प्रतिबंधित सामग्री से हुई कमाई जब्त करने की व्यवस्था पर विचार करने को कहा है। प्रतिबंधित सामग्री की पहचान और उसे हटाने के लिए राष्ट्रीय हैश और यूआरएल डेटाबेस बनाने का भी निर्देश दिया गया है।


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