आस्था

पुत्रदा एकादशी का हिंदू धर्म में बड़ा ही महत्त्व है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहा जाता है। इस एकादशी का महत्व पुराणों में भी वर्णित है...

उक्त पंक्तियों से स्पष्ट है कि सौ चांद एवं हजार सूर्य भी उदय होकर संसार को प्रकाशित कर रहे हों परंतु सद्गुरु नहीं है तो घोर अंधकार ही है। सद्गुरु सूर्य की भांति होते हैं। सूर्य के प्रकाश को देखने के लिए किसी मशाल या किसी दीये की आवश्यकता नहीं होती। सूर्योदय होते ही स्वत: प्रकृति में सूर्य की उपस्थिति का आभास हो जाता है। पेड़-पौधे, फूल-कलियां, पशु-पक्षी, जड़-चेतन में स्फुरण हो जाता है अर्थात प्राणों का संचार हो जाता है। इसी प्रकार प्रबल उत्कंठा रखने वाले जिज्ञासु के जीवन में जब सद्गुरु रूपी सूर्य का उदय होता है, तो जन्मों का अज्ञान तिमिर समाप्त होकर ज्ञान उजाला हो जाता है। निर्गुण निराकार का साकार स्वरूप सद्गुरु होता है, जिस प्रकार सूर्य को हम नहीं देख पाते हैं परंतु उसी के प्रकाश से जब चंद्रमा उदय होता है तो हम सभी उसको निहारते हैं, शीतलता का आनंद प्राप्त करते हैं, प्रेमीजन एक भिन्न प्रकार का आनंद प्राप्त करते हैं इसी प्रकार भक्तजन ईश्वर के निराकार रूप में वो आनंद नहीं प्राप्त कर पाते जो कि परब्रह्म के साक्षात स्वरूप सद्गुरु के दिव्य दर्शन करके प्राप्त करते हैं।

मनुष्य का यह हठ कि वह जिस प्रकार की अवस्थाएं एवं परिस्थितियां अपने लिए चाहता है उसके विपरीत स्थिति उसके सामने न आए, उसके दु:खों का एक विशेष कारण है। संसार का निर्माण किसी एक व्यक्ति के लिए तो हुआ नहीं, जिससे वह उसकी इच्छा के अनुसार ही गतिशील रहे। केवल वे ही परिस्थितियां सामने लाए जिन्हें वह चाहता है। संसार का निर्माण तो जीवमात्र के लिए हुआ है। सभी प्राणी समान रूप से सुख के अधिकारी हैं। आज की जो परिस्थिति हमारे लिए सुखदायक है, वह किसी अन्य के लिए दु:खदायक हो सकती है। ऐसी अवस्था में उसका बदलना अनिवार्य है। क्योंकि जब तक वह बदलेगी नहीं, दु:खी रहने वाला व्यक्ति सुखी न हो सकेगा। हो सकता है कि जिस परिस्थिति में हमें दु:ख का अनुभव होता है वह किसी दूसरे के लिए सुख देने वाली हो। ऐसी दशा में उसका आना बहुत आवश्यक है। सुख-दु:ख का क्रमिक आवागमन संसार का शाश्वत विधान है। ऐसी दशा में केवल अपने मनोनुकूल परिस्थितियों का आग्रह न केवल स्वार्थ अपितु ईश्वरीय विधान के प्रति अस्वीकृति है, जो एक प्रकार से नास्तिकता, ईश्वर द्रोह एवं भयंकर पाप है। सुख-दु:ख के प्रति यदि मनुष्य का दृष्टिकोण

बुद्धिमान व्यक्ति इस ब्रह्मांड, इस संसार से परे चले जाते हैं और अमरत्व को प्राप्त कर लेते हैं। लेकिन कैसे? वस्तुत: हमारे भीतर कुछ ऐसा होता है, जो कभी नहीं मरता, जो कभी बूढ़ा नहीं होता। इस बारे में प्रत्येक व्यक्ति अपने ढंग से सोचता है। अगर आप देखें तो छोटे बच्चे बड़े हो रहे हैं और स्थितियां भी बदल रही हैं, लेकिन कई बार आप महसूस करते हैं कि आप नहीं बदल रहे हैं। कुछ लोग कहते हैं, मैं तो बूढ़ा हुआ ही नहीं/ हुई ही नहीं। भीतर से आपको महसूस होता है कि सिर्फ समय बीता है, आपमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। यह सच भी है, क्योंकि आपके भीतर एक ऐसा अंश है, जो न तो बदलता है और न ही मरता है। यही एक दूसरी दुनिया है, जहां अमरत्व है। मृत्युलोक वह है, जहां सब कुछ बदल जाता है।

नरेंद्र अपनी आलोचना सुनकर कभी विचलित न होते थे, बल्कि लापरवाही से हंसकर टाल देते थे। उस बात को हंसी में उड़ाने के अलावा और किसी बात का प्रतिवाद नहीं करते थे। नरेंद्र की तीव्र बुद्धि इतनी तेज चलती कि थोड़े ही वक्त में वह अपना पूरा पाठ याद कर लिया करते थे। यही वजह थी कि हंसी-मजाक, संगीत व खेल के लिए वह समय आसानी से निकाल लेते थे। बुद्धिहीन अनेक लडक़े जब उनका अनुसरण करने की चेष्टा करते, तो समझो वे अपना ही बुरा कर डालते थे। रसिक और वाक्पटु नरेंद्र नाथ के सिर्फ बाहरी आचरण को देखकर जिन लोगों ने उनके संबंध में किसी प्रकार की धारणा बना ली थी, यहां यह कहना गलत न होगा कि वे चाहे उनके बहुत नजदीक भले ही रहे हों, मगर फिर भी इस अद्भुत युवक का यथार्थ परिचय वे नहीं पा सके। जनरल असेंबली कालेज के अध्यक्ष हेस्टी साहब बड़े पंडित, कवि और दार्शनिक थे। नरेंद्र और बजेंद्र आदि कुछ शिष्य उन्हें बेहद अजीज थे। ये दोनों हेस्टी साहिब के पास नियमित रूप से दर्शनशास्त्र पढऩे के लिए जाते थे। नरेंद्र को हेस्टी साहब बहुत प्यार करते थे। एक दिन कालेज की आलोचना सभा में नरेंद्र के दार्शनिक मत विशेष के विश£ेषण से विशेष संतुष्ट होकर उन्होंने कहा था, नरेंद्र नाथ दर्शनशास्त्र के उत्तम छात्र हैं।

नागौर शहर के काठडिय़ों का चौक स्थित प्रसिद्ध नगर सेठ श्री बंशीवाला मंदिर में वार्षिक झूलोत्सव का भव्य शुभारंभ हो गया है। रोजाना भगवान नगर सेठ का विशेष शृंगार किया जाता है।

केला, सेब, पपीता तथा संतरे को मिलाकर इस मिश्रण को आधा घंटा चेहरे पर लगाने के बाद धो लें। इससे त्वचा के दाग-धब्बे दूर होते हैं।

रक्षाबंधन हिंदुओं का प्रमुख त्योहार है जो श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। यह भाई-बहन को स्नेह की डोर से बांधने वाला त्योहार है। यह त्योहार भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक है… रक्षाबंधन का अर्थ रक्षाबंधन का अर्थ है किसी को अपनी रक्षा के लिए बांध लेना। इसीलिए राखी बांधते समय

सुप्रसिद्ध शक्तिपीठ माता श्री चिंतपूर्णी जी के दरबार में श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का एक और सुंदर उदाहरण सामने आया है। पंजाब के संगरूर से आए एक श्रद्धालु परिवार ने माता रानी के चरणों में एक किलो 100 ग्राम वजन का चांदी का छत्र अर्पित किया है। मौजूदा बाजार दरों के अनुसार, इस चांदी के छत्र की अनुमानित कीमत लगभग 2,60,000 से 2,75,000 के बीच आंकी जा रही है।