‘सीमित सरकार’ से जनमानस मजबूत

भानु धमीजा

सीएमडी, ‘दिव्य हिमाचल’
लेखक, चर्चित किताब ‘व्हाई इंडिया नीड्ज दि प्रेजिडेंशियल सिस्टम’ के रचनाकार हैं

वर्ष 1963 में न्यायमूर्ति सरकारिया, जिन्हें केंद्र-राज्य संबंधों के अध्ययन को नियुक्त किया गया था ने रिपोर्ट दी कि ‘‘केंद्र शक्ति के नशे में चूर’’ था। यही समय था कि भारत ‘मजबूत’ केंद्रीकृत सरकार के विचार को निकाल फेंकता। एक छोटी, विकेंद्रीकृत, सीमित सरकार के सिद्धांत उपलब्ध थे और वे सदियों से सफल थे। दरअसल, गांधी ने उनका महत्त्व काफी पहले 1931 में ही समझ लिया था। उन्होंने कहा कि ‘‘[स्व-नियंत्रण के] आदर्श जीवन में कभी पूरी तरह सिद्ध नहीं होते। अतः यह थरो का उत्कृष्ट बयान है कि वही सरकार सर्वोत्तम है जो न्यूनतम शासन करती है।’’

भारत में राजशाही की बढ़त अच्छा लक्षण नहीं है। हमारी सरकारें सत्ता को केंद्रीकृत करने, जांच एजेंसियों का दुरुपयोग करने, कल्याण योजनाओं के बहाने जनता का धन खैरात में बांटने, और निजी जीवन पर नियंत्रण का प्रयास करने में बहुत सक्रिय हो गई हैं। यही समय है कि हम पुनर्मूल्यांकन करें, आखिर हम अपनी सरकारों की क्या भूमिका चाहते हैं। ‘भारत को चलाने के लिए एक मजबूत हाथ की आवश्यकता है’, यह दावा सदैव एक सामान्य स्पष्टीकरण रहा है। परंतु सरकार इस कारण मजबूत नहीं बनती कि इसके पास कितनी शक्तियां हैं, बल्कि इससे कि क्या इसके पास इच्छुक सहभागी हैं। अधिक शक्ति संपन्न सरकार न कभी लोगों का दिल जीत सकती है और न ही उन्हें एक कर सकती है। प्रोत्साहन देकर शासन करने के बजाय, शक्ति के बल पर राज करने का प्रयास उत्साह पैदा करने में विफल रहता है। नागरिक ऐसी सरकार के एजेंडा को कभी अपने एजेंडा के रूप में नहीं अपनाते। और सबसे बुरी बात यह है कि लोग राष्ट्र निर्माण के स्थान पर अपनी ही सरकार से निपटने और बचाव करने में व्यस्त हो जाते हैं।

केंद्रीकरण से मजबूत नहीं होता लोकतंत्र

एक सर्वशक्तिमान, व्यापक सरकार आजादी के बाद के वर्षों में शायद आवश्यक रही होगी, परंतु आज यह एक बाधा बन गई है। अब भारत को ऐसी सरकार चाहिए जो लोगों की रचनात्मकता और महत्त्वाकांक्षाओं को उन्मुक्त होने दे, न कि उन्हें सरकार का मोहताज बनाए रखे। भारत को ऐसी सरकार की आवश्यकता है जो लोगों को उनकी जाति या आर्थिक हालत के बजाय योग्यता और प्रतिभा के आधार पर पहचान दे। सच्चाई यह है कि भारतीय सरकार की भूमिका संबंधी हमारे पूर्वजों की सोच अब वैध नहीं रह गई है। जहां गांधी का विकेंद्रीकृत ग्राम आधारित सरकारों का दृष्टिकोण अपरिपक्व था, नेहरू द्वारा ब्रिटिश केंद्रीकृत प्रणाली की नकल निष्प्रभावी साबित हुई है। गांधी कहते थे कि ‘‘हर गांव… संपूर्ण शक्तियों वाला एक गणतंत्र होना चाहिए,’’ और प्रत्येक नागरिक ‘‘स्व-नियंत्रण’’ या ‘‘प्रबुद्ध अराजकता’’ में जुटा होना चाहिए। नेहरू की सोच थी कि यह सब ‘‘बखूबी अस्पष्ट’’ रूप से कहा गया था। उन्होंने एक संपूर्ण शक्तिशाली, व्यापक सरकार पर जोर दिया। उन्होंने भारत की संविधान सभा को लिखा कि ‘‘सर्वाधिक संतोषजनक’’ व्यवस्था यह है कि ब्रिटिश गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 से सरकार की शासकीय शक्तियों की संपूर्ण सूचियां कापी कर ली जाएं। हालांकि गांधी पहले ही स्पष्ट कर चुके थे कि ‘‘अगर भारत इंग्लैंड की नकल करता है, तो यह मेरा दृढ़ विश्वास है कि वह बरबाद हो जाएगा।’’ यहां तक कि संविधान सभा में भी कइयों ने नेहरू के एक अति शक्तिशाली सरकार के फार्मूले का विरोध किया। अलगू राय शास्त्री की टिप्पणी थी कि  ‘‘अगर ऐसा नियंत्रण जारी रहता है, तो आत्मबल जाता रहेगा।’’ लोकनाथ मिश्रा के अनुसार ‘‘यह संविधान दरअसल लोगों को गैर जिम्मेदार बनाना चाहता है।’’ और टीजेएम विल्सन ने कहा, ‘‘कई लोग गलत रूप से सोचते हैं कि मजबूती केंद्रीकरण और एक शक्तिशाली केंद्र में निहित होती है… मैं दोहराता हूं कि जागृत चेतना वाले नागरिकों का लोकतंत्र अधिक मजबूत होता है।’’

सीमित सरकार की संकल्पना

एक सर्व-शक्तिशाली केंद्रीकृत सरकार स्वतंत्रता के तुरंत बाद ही असफल होने लगी। वर्ष 1957 में सी राजगोपालाचारी ने लिखा कि अत्यधिक केंद्रीकरण ‘‘हास्यास्पद और खतरनाक’’ था। साल 1958 में नेहरू स्वयं मुख्यमंत्रियों को लिख रहे थे कि बिना ‘‘विकेंद्रीकरण और शक्ति बांटने के अलावा कोई अन्य ऐसा लोकतांत्रिक रास्ता नहीं जिससे बढ़ती हुई मुश्किलों से बचा जा सके।’’ परंतु वर्ष 1963 में न्यायमूर्ति सरकारिया, जिन्हें केंद्र-राज्य संबंधों के अध्ययन को नियुक्त किया गया था ने रिपोर्ट दी कि ‘‘केंद्र शक्ति के नशे में चूर’’ था। यही समय था कि भारत ‘मजबूत’ केंद्रीकृत सरकार के विचार को निकाल फेंकता। एक छोटी, विकेंद्रीकृत, सीमित सरकार के सिद्धांत उपलब्ध थे और वे सदियों से सफल थे। दरअसल, गांधी ने उनका महत्त्व काफी पहले 1931 में ही समझ लिया था। उन्होंने कहा कि ‘‘[स्व-नियंत्रण के] आदर्श जीवन में कभी पूरी तरह सिद्ध नहीं होते। अतः यह थरो का उत्कृष्ट बयान है कि वही सरकार सर्वोत्तम है जो न्यूनतम शासन करती है।’’ वह वर्ष 1849 में ‘सिविल डिसओबिडिएंस’ (सत्याग्रह) शीर्षक से प्रकाशित हेनरी डेविड थरो के लेख का हवाला दे रहे थे। परंतु सीमित सरकार  का सिद्धांत थरो से भी लगभग दो पीढि़यां पहले 1787 में अमरीकी संविधान निर्माताओं द्वारा अपनाया जा चुका था। सीमित सरकार के विचार के पीछे आधार ये हैं कि मनुष्य का असल स्वभाव नैतिक व मर्यादित है, और स्व-शासन के लिए उपयुक्त है। यही वे विचार थे जिन्हें ब्रिटिश दार्शनिक जॉन लॉक ने सर्वप्रथम प्रचारित किया, और जिन्होंने वर्ष 1688 की अंग्रेज क्रांति को जन्म दिया। उनका विश्वास था  कि लोग ‘‘प्रयोजन के अनुसार’’ साथ रहते हैं  और सरकार स्वतंत्र व्यक्तियों के मध्य एक समझौते पर आधारित होती है, न कि शासकों और शासितों के बीच। अमरीकनों ने लॉक के विचारों को यह अर्थ दिया कि सरकार को नियंत्रित किया जाना चाहिए, ताकि यह जनता के प्रति अधिक हस्तक्षेप करने वाली या दमनकारी न बन जाए। उन्होंने अपनी सरकार को बहुत चुन-चुनकर, सीमित अधिकार दिए और उन्होंने ‘बिल ऑफ राइट्स’ (अधिकार अधिनियम) के रूप में अपनी सरकार पर इतिहास के सर्वाधिक कठोर प्रतिबंध लगाए।

सरकार की भूमिका में कमी

इसमें संदेह नहीं कि भारतीय भी सीमित सरकारें चाहते हैं। वे नौकरशाहों और राजनेताओं को दी गई असीमित शक्तियों से तंग आ चुके हैं। मोदी के नारे, ‘‘मैक्सिमम गवर्नेंस, मिनिमम गवर्नमेंट’’ की लोकप्रियता के पीछे यही सबसे बड़ा कारण है। लोग यह भी नहीं चाहते कि सरकार ढेर सारे व्यापार चलाने में सक्रिय हो। मोदी के एक अन्य नारे, ‘दि गवर्नमेंट हैज़ नो बिजनेस टू बी इन बिजनेस’ की लोकप्रियता का यही कारण है। असल में, लोग सरकार को उन बहुत सी सेवाओं से बाहर देखना चाहते हैं जो वह वर्तमान में उपलब्ध करवा रही है। वे सरकारी स्कूलों, अस्पतालों, परिवहन सेवाओं, बैंकों, आदि की दयनीय स्थिति से पूरी तरह असंतुष्ट हैं। इस कारण वे तेजी से निजीकरण के समर्थक बन रहे हैं। इसी प्रकार, भारतीय अपनी सरकारों की शक्ति को भी सीमित करना चाहते हैं। वे सीबीआई जैसी जांच एजेंसियों का राजनीतिक हितों के लिए दुरुपयोग, और सुरक्षा के नाम पर लोगों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन, बहुत देख चुके हैं।

अमरीका से संकेत

भारत इस सवाल से शुरुआत कर सकता है कि आखिर सरकार का मुख्य उद्देश्य क्या होना चाहिए। हमारा संविधान कहता है कि उद्देश्य समानता, न्याय, स्वतंत्रता, आदि को ‘‘सुनिश्चित’’ करना है। दूसरी ओर, अमरीकी संविधान मात्र सामान्य कल्याण को ‘‘बढ़ावा’’ देना चाहता है। हमें पूछना चाहिए कि क्या एक भारतीय सरकार ऐसे उन्नत लक्ष्यों को कभी ‘प्रदान’ कर सकती है, या यह केवल लोगों को इन लक्ष्यों की ओर बढ़ने के लिए मदद कर सकती है। उत्तर स्पष्ट तौर पर एक सीमित भूमिका वाली सरकार की ओर इंगित करता है। एक सरकार जिसे उसकी भूमिका के अनुरूप ही शक्तियां दी गई हों। जैसे कि रक्षा, न्यायिक व्यवस्था, मौद्रिक नीति, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, और अंतरराज्यीय मामलों में। परंतु भारत का संविधान केंद्रीय सरकार को 140 से अधिक विशिष्ट शक्तियां प्रदान कर बड़ी छूट देता है। अमरीका में ऐसी मात्र नौ ही शक्तियां हैं, और संविधान शेष समस्त शक्तियां राज्यों के लिए आरक्षित रखता है। एक भारतीय सरकार जितने चाहे नए कार्यक्रम आरंभ कर सकती है और कोई भी उसके अधिकार, या कार्यक्रमों की उपयुक्तता पर प्रश्न नहीं उठा सकता। यही कारण है कि भारतीय सरकारें जनता की सेवक बनने के बजाय उनकी स्वामी बन गई हैं। एक सामान्य व्यक्ति उन्हें ‘सरकार’ कहता है और  मंत्रियों को अपना ‘माई-बाप’ समझता है। यह एक महान राष्ट्र के लिए उपयुक्त नहीं है। अपनी सरकारों को बंधित और सीमित करने का हमारे लिए यही समय है।

साभार : दि क्विंट मीडिया

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